समय की करवट (भाग १०) – हॅरी को चाहिए – ‘मेड इन (भारत को छोड़कर कुछ भी)’

समय की करवट (भाग १०) – हॅरी को चाहिए – ‘मेड इन (भारत को छोड़कर कुछ भी)’

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। ग्लोबलायझेशन में हालाँकि दोनो पार्टियों के अच्छे उत्पादों का लेनदेन होकर दोनों पार्टियों का फ़ायदा होगा ऐसी उम्मीद होती है; लेकिन वास्तव में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ ऐसी स्थिति होती है। अमीर देशों में रहनेवालीं बड़ीं बहुराष्ट्रीय […]

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समय की करवट (भाग ९ ) – ग्लोबलायझेशन – तब और अब….

समय की करवट (भाग ९ ) – ग्लोबलायझेशन – तब और अब….

‘समय ने करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। अमरीका शुरू से ही मुक्त व्यापार के पक्ष में थी। ‘सर्व्हायवल ऑफ द फ़िटेस्ट’, ‘प्रायव्हेटायझेशन’, ‘ग्लोबलायझेशन’ ये अमरीका के मूलमंत्र थे, जो अपनी ताकत के बलबूते पर उन्होंने सारी दुनिया के माथे पर थोंप दिये थे। उसके […]

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समय की करवट (भाग ८ ) – मैं ही हॅरी….मैं ही हरी

समय की करवट (भाग ८ ) – मैं ही हॅरी….मैं ही हरी

‘समय ने करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका हमारे भारत के विषय में अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। गरीब ग्रामीण भारत अभी कुछ साल पहले तक अमीर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए किसी महत्त्व का ही नहीं था। पॅरिस, लंडन, मिलान, न्यूयॉर्क इनके बाहर न जानेवालीं कई कंपनियाँ तो ८-१० साल […]

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समय की करवट (भाग ७ ) – ‘गाँव की ओर चलो’

समय की करवट (भाग ७ ) – ‘गाँव की ओर चलो’

‘समय ने करवट’ बदलने पर क्या क्या हो सकता है, इसके परिणाम देखते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। कल के ग़रीब आज के अमीर बनते हुए दिखायी दे रहे हैं और कल के अमीर आज के ग़रीब; और आज जो ग़रीब बनते जा रहे हैं, उन्हें अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए, उन्हीं लोगों […]

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समय की करवट (भाग ६) – कठिनाई में फँसा ‘हॅरी’

समय की करवट (भाग ६) – कठिनाई में फँसा ‘हॅरी’

‘समय ने करवट बदलने के’ भारत पर हो रहे परिणाम देखते हुए हम आगे जा रहे हैं। हमारा देश, आज़ाद हो जाने पर ‘शहरी’ तथा ‘ग्रामीण’ अर्थात् कई विश्‍लेषकों की राय में ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ इनमें किस तरह विभाजित हुआ है, इसका हम अध्ययन कर रहे हैं। उसमें हमने इस तरह विभाजन होने के पीछे […]

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समय की करवट (भाग ५) – माय भारत इज द बेस्ट!

समय की करवट (भाग ५) – माय भारत इज द बेस्ट!

समय जब करवट बदलता है, तब घटित होनेवाले स्थित्यंतर, हम हमारे देश के विषय में देखते जा रहे हैं। सबसे अहम बात, हमारा देश यह शहरी ‘इंडिया’ और ग्रामीण ‘भारत’ इन दो भागों में किस तरह विभाजित होता जा रहा है और यह बात किस तरह, भारत के महासत्ता बनने के आड़े आ रही है, […]

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समय की करवट (भाग ४) – ‘हरी पुत्तर’

समय की करवट (भाग ४) – ‘हरी पुत्तर’

हमारे देश पर डेढ़सौ साल शासन करते हुए अँग्रेज़ों ने जो फूट के बीज हमारे बीच बोये थे, उनका, अँग्रेज़ यहाँ से चले जाने तक वृक्ष बन चुका था।इसीलिए हमारे देश को बँटवारे का दुख सहना पड़ा। अब आज़ादी पाकर साठ से भी अधिक साल बीत चुके हैं। लेकिन वह बँटवारा बहुत ही छोटा प्रतीत […]

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समय की करवट (भाग ३) – पुनः ‘इंडिया’

समय की करवट (भाग ३) – पुनः ‘इंडिया’

समय करवट बदलते समय दुनिया में, ख़ासकर भारत में क्या स्थित्यन्तर हो रहे हैं, यह हम देख रहे हैं। हमारा देश ‘इंडिया’ बनाम ‘भारत’ इनमें कैसे विभाजित हुआ है, यह जानने की हम कोशिश कर रहे हैं। खुली हवा में रपट करने की अपेक्षा नेट पर के ‘फ़ार्मव्हिले’ में अपना जी रिझानेवाली, वक़्त आने पर […]

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समय की करवट (भाग २) – ‘इंडिया’ या ‘भारत’?

समय की करवट (भाग २) – ‘इंडिया’ या ‘भारत’?

….तो समय करवट बदल रहा है! खूब….बहुत खूब! इस सारे घटनाक्रम में डेढ़सौ वर्ष की गुलामी और पच्चास-साठ वर्ष की गरीबी सहन करनेवाला भारत, समय की करवट के नीचे से मुक्त होते हुए दिखायी दे रहा है। यह हुई ‘मॅक्रो लेव्हल’। लेकिन ‘मायक्रो लेव्हल’ का क्या? जैसे कहावत है – ‘दूर के ढोल सुहावने’ (‘दुरून […]

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समय की करवट (भाग १)

समय की करवट (भाग १)

नींद में हम कई बार करवटें बदलते हैं। कई बार किसी कारणवश यदि नींद न आ रही हो, तो करवटें बदलते हुए सारी रात निकल जाती है, मगर नींद तो आती ही नहीं। इसी पर आधारित एक वाक्प्रचार भी हमने कई बार कथाओं-उपन्यासों में पढ़ा होगा – ‘समय ने करवट बदली’। समाजजीवन में, वैश्विक/राष्ट्रीय स्तर […]

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