तिरुचिरापल्ली भाग-४

‘श्रीरंगम्’ द्वीप पर ही बसने का तय कर चुके महाविष्णु यहाँ शेषशायी स्वरूप में विराजमान हुए और उसके बाद श्रीरंगनाथजी का मंदिर साकार हुआ और उसका विस्तार होता ही रहा। यहाँ के सात प्राकार (चहारदीवारी) और उनमें से सबसे भीतरी सातवें प्राकार में बसा यह श्रीरंगनाथजी का मंदिर, इन सब का निर्माण एक रात में तो नहीं किया गया है। व़क़्त के विभिन्न पड़ावों पर इनका निर्माण किया गया।

हमें भी श्रीरंगनाथजी के दर्शन करने हैं। तो चलिए, फिर एक के बाद एक प्राकार को पार करते हुए और साथ ही श्रीरंगम् के अन्तरंग से परिचित होते हुए प्रमुख मन्दिर में दर्शन करने चलते हैं।

बिभीषणजी ने जब कावेरी के तट पर रंगविमान को रख दिया, तब भगवान अपनी मर्ज़ी से यहाँ रहे। आगे चलकर ‘धर्मवर्मा’ नाम के राजा का जब यहाँ पर शासन था, तब उन्होंने इस रंगविमान के देवालय का निर्माण किया और उनके नित्य पूजा-अर्चा की भी व्यवस्था कर दी। साथ ही प्रमुख मंदिर के चारों ओर जिस चहारदीवारी का उन्होंने निर्माण किया, उसे ‘धर्मवर्मा विधि’ कहा जाने लगा।

फिर कितनी सदियाँ बीतीं यह तो श्रीरंगनाथजी ही जानें, लेकिन आगे चलकर एक दिन चोळ राजवंश के एक राजा शिकार करने जंगल में आये थे और तब उन्होंने किसी तोते के मुख से एक श्लोक सुना, जिसमें श्रीरंगनाथजी के मंदिर के वर्णन के साथ उनकी महिमा को भी बयान किया गया था। राजा ने उसके अनुसार जंगल में खोज करना शुरू कर दिया। उस समय तक श्रीरंगनाथजी का प्राचीन काल में बनाया गया मन्दिर पेड़-पौधों से ढक चुका था। ज़ाहिर है कि यह था, काल का प्रभाव। आख़िर चोळ राजा खोज अभियान में कामयाब हो गये और आख़िर उन्होंने ‘रंगविमान’ को ढूँढ़ ही लिया। ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान ने उन्हें सपने में दृष्टान्त देकर रंगविमान के निश्‍चित स्थान के बारे में बताया।

रंगविमान की खोज करते ही इन राजा ने देवालय का पुनर्निमाण किया और साथ ही इर्दगिर्द फैले हुए जंगल की भी कटाई कर दी, जिससे कि भाविकों को प्रभु के दर्शन करने में सुविधा हो। राजा ने मंदिर के आसपास फूलों के बग़ीचें भी बनवाये और ईश्‍वर की पूजा-अर्चना की भी व्यवस्था की।

आगे चलकर विभिन्न वैष्णव सन्तों का उदय हुआ, जो ‘आळ्वार’ इस नाम से जाने जाते हैं। फिर ‘श्रीरंगनाथजी का मन्दिर’ यह जनसामान्यों मे भक्ति का प्रचार एवं प्रसार करनेवाला केन्द्रवर्ती स्थल बन गया।

भगवान की प्रशंसा करनेवाले विभिन्न काव्यों की रचना इन सन्तों ने की और इसी प्रक्रिया में आगे चलकर ‘नालयिर दिव्य प्रबन्धम्’ रचा गया। यही था वह दौर, जब भारत पर धार्मिक आक्रमण हो रहे थे। इस मुश्किल दौर में जनसामान्यों में शुद्ध भक्तिमार्ग को जतन करने के कार्य में इन आळ्वार सन्तों का बहुत बड़ा योगदान रहा।

सभी आळ्वार सन्तों ने श्रीरंगनाथजी की महिमा का गायन किया है। कुल मिलाकर उन्होंने २४७ स्तोत्रों में श्रीरंगनाथजी की महिमा गायी है। इन आळ्वारों का श्रीरंगनाथजी के साथ इतना गहरा रिश्ता है कि आज हज़ारों वर्ष बीतने के बाद भी उनकी स्मृतियों को यहाँ मन्दिरों तथा समाधिस्थलों के रूप में जतन किया गया है।

श्रीरंगनाथजी के मंदिर का विस्तार कब और कैसे होता रहा, यह बयान करनेवाले कुछ शिलालेख मंदिर के आसपास पाये जाते हैं। वहीं, कई जगह की गयी खुदाई में मिले ताम्रपट भी मंदिर के विस्तार की कहानी बयान करते हैं।

तिरुमलिशयी नाम के आळ्वार संत उनके द्वारा रचे गये स्तोत्र में श्रीरंगनाथजी की महिमा तो गाते ही हैं, साथ ही कावेरी, कोल्लिडम् इनके साथ साथ तिरुवरंगम् की यानि कि श्रीरंगम् की खूबसूरत पुष्पवाटिकाओं का वर्णन भी करते हैं और यहाँ के आठ तीर्थस्थलों की महिमा भी गाते हैं।

तिरुमंगै नाम के आळ्वार संत ने भी इस मंदिर के साथ कई छोटे मन्दिरों, प्राकारों तथा गोपुरों के पुनर्निमाण का उल्लेख भी किया है।

आळ्वार सन्तों द्वारा की जा रही मन्दिर की देखभाल के साथ साथ उस समय के शासक भी देवालय की व्यवस्था के प्रति चौकन्ने थे। चोळ, पल्लव, पांड्य, होयसाळ, विजयनगर के सम्राट और मदुराई के नायक शासकों ने भी इस मंदिर का ध्यान रखा और मंदिर के विस्तार कार्य में अपना योगदान भी दिया।

हमें यह पढ़कर ताज्जुब होगा, लेकिन इतिहास यह बयान करता है कि सात प्राकारों में बसे श्रीरंगम् को कई महत्त्वपूर्ण युद्धों में क़िले का स्वरूप प्राप्त हुआ था।

लगभग ६०० शिलालेखों तथा ताम्रपटों में से श्रीरंगनाथ मन्दिर के इतिहास के पन्ने खुलते जाते हैं। इनमें से कुछ शिलालेखों को हम आज भी मंदिर के आसपास के प्राकारों मे देख सकते हैं।

विभिन्न शासकों ने उनके शासनकाल में मंदिर को उपहारस्वरूप कई वस्तुएँ प्रदान कीं। इनमें सोना-चाँदी आदि से निर्मित पूजा के कई उपकरण, पात्र तथा गोदान एवं भूमिदान भी उपहारस्वरूप दिये हैं, ऐसा उल्लेख मिलता है।

श्रीरंगनाथ के मंदिर में विशिष्ट पध्दति से नित्य अर्चना आदि तो की ही जाती थी और साथ ही भगवान की महिमा का गायन भी यहाँ भजनों के माध्यम से किया जाता था।

इस मंदिर को उपहार देनेवालों में राज राजा-१, परान्तक इन शासकों के साथ साथ उनके मन्त्रियों तथा सरदारों के भी नाम आते हैं।

अभी अभी हमने जिस दूसरे प्राकार को पार किया, उसका नाम है – ‘राजमहेन्द्रन् विधि’। राजमहेन्द्रन् नामक शासक ने मंदिर के खज़ाने में कई बहुमूल्य रत्न अर्पण कियें। विभिन्न शासकों द्वारा यहाँ पर अन्य देवताओं के मंदिर भी बनवाये गये, ऐसा भी कहा जाता है।

हम जिस पहली दीवार को पार कर भीतर प्रवेश करते हैं, उसपर बना गोपुर ‘रायगोपुर’ इस नाम से जाना जाता है। दूसरे प्राकार पर चार गोपुर हैं। उनमें से पूर्वी गोपुर विशेष उल्लेखनीय है।

तिरुचिरापल्ली, इतिहास, अतुलनिय भारत, श्रीरंगनाथजी, तमिलनाडू, भारत, भाग-४चौथे प्राकार का नाम है – ‘अलिन्दन तिरुविधि’, वहीं पाँचवाँ प्राकार ‘अकलंकन तिरुविधि’ इस नाम से जाना जाता है। इन प्राकारों के बारे में यह भी जानकारी प्राप्त हुई है कि इन सातों प्राकारों की एकत्रित लंबाई ३२,५९२ फीट यानि लगभग छह मील है।

राज राजा और कुलोत्तुंग नाम के राजाओं ने उनके शासन काल में मंदिर प्रशासन की सहायता करने के लिए अपने कुछ अफ़सरों को भी ‘श्री-कार्यम्’ इस नाम से नियुक्त किया था।

श्रीरंगनाथ मंदिर के साथ अटूट नाम जुड़ा है, ‘श्रीरामानुजाचार्यजी’ का। विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट अद्वैत) सिद्धान्त के वे संस्थापक थे। उन्होंने श्रीरंगनाथजी के मंदिर की पूजाविधियों तथा मन्दिर व्यवस्था को सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने इसके जरिये मन्दिर के नित्य धार्मिक कार्यों तथा व्यवस्थापन (अ‍ॅडमिनिस्ट्रेशन) को सुसूत्रता एवं योजनाबद्धता प्रदान की। इसीके एक हिस्से के तहत उन्होंने ‘सेनापति धुरंधर’ नामक कार्यप्रणालि की स्थापना की, जो लगभग यहाँ दो सदियों तक कार्यरत थी, ऐसा कहा जाता है।

१३वीं सदी के ‘जयवर्मन्’ नाम के पांड्य राजा ने रंगविमान के शिखर को स्वर्ण के पत्रे से आच्छादित किया। कहा जाता है कि उन्होंने प्रभु के नौकाविहार के लिए एक स्वर्ण से बनी नौका भी प्रभु के चरणों में अर्पण की थी। उन्होंने ही श्रीरंगनाथजी के चरणों में विभिन्न हीरेजवाहरात और रत्न आभूषण भी अर्पण किये थे।

इतने बड़े दौर में तिरुचिरापल्ली पर विदेशी आक्रमण भी हुए और इन हमलों में श्रीरंगम् का काफ़ी नुकसान भी हुआ। इन विदेशी हमलों के बारें में एक कथा कही जाती है। साधारणत: १४वीं सदी के पूवार्ध में श्रीरंगम् पर विदेशी आक्रमण हुआ। दोनों बार एक ही हमलावर ने हमला किया था। इस हमले में उसने मन्दिर के खज़ाने को बेतहाशा लूट लिया और ज़ाहिर है कि इस लूट में उसने काफ़ी दौलत भी हासिल की। वह आक्रमक इस हमले में यहाँ की एक मूर्ति को भी अपने साथ ले गया। लेकिन श्रीरंगम् के सभी भगवद्भक्त इकट्ठा हो गये और ठेंठ उसके राज्य में दाखिल होकर उससे इस मूर्ति को उन्होंने पुन: प्राप्त कर लिया। यह कथा भक्तों की संघशक्ति की ताकत बयान करती है।

दूसरे विदेशी हमले के दौरान हमले की तीव्रता को ध्यान में रखकर देवालय की मूर्तियों को सम्मानपूर्वक सुरक्षित स्थल ले जाया गया। श्रीरंगनाथजी की तथा श्रीरंगनायकीजी की मूर्तियों को सम्मनापूर्वक अन्य जगह ले जाकर रखा गया और प्रमुख गर्भगृह को ही पूरी तरह बंद कर दिया गया।

मग़र इस आक्रमण में मन्दिर का काफ़ी नुकसान किया गया।

इस अंदाधुंद के ख़त्म हो जाने के बाद पुन: प्रमुख मूर्तियों को उनके स्थान पर यानि देवालय में सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया। इस गड़बड़ी में छह दशक का समय बीत गया, ऐसा कहा जाता है। साठ वर्ष पूर्व यहाँ के बन्द कर दिये गये गर्भगृह को पुन: खोल दिया गया और एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी कही जाती है कि इन मूर्तियों को अन्य स्थल ले जाते हुए जिस व्यक्ति ने इन गर्भगृहों को बन्द किया था, उसीने उन्हें पुन: खोल दिया। गर्भगृह को बंद करना और पुन: खोलना इसका मतलब महज़ दरवाज़ों को बन्द करना और खोलना यह नहीं था; बल्कि उसका उद्देश्य था, गर्भगृह की पवित्रता को क़ायम रखने के लिए यानि कि दुश्मन को वहाँ प्रवेश करने से रोकने के लिए उसके आगे पत्थर की दीवार बनाना, जिससे कि दुश्मन को गर्भगृह का पता ही न चले और वह वहाँ प्रवेश ही न कर सके।

जब मन्दिर की मूल मूर्तियों को पुन: यहाँ लाया गया, तब गर्भगृह की बनी इस दीवार को तोड़ दिया गया और गर्भगृह में मूर्ति की प्रतिष्ठापना की गयी।

पाँचवे प्राकार को पार करते ही हमें दिखायी देती है – ‘चन्द्रपुष्करिणी’। अपने नाम की तरह ही गोल आकार की। इसमें प्रवेश करने के लिए सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं। इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है।

साँवले रंग के शेषशायी श्रीरंगनाथजी, जो भक्तों को अभय देते हैं और भक्तों का दुखड़ा सुनकर उनकी व्यथा का निवारण करते हैं, वे अब हमारे समक्ष हैं। देखिए, बातों बातों में हम सातों प्राकारों को पार करके गर्भगृह तक आ भी गये और सामने विराजमान श्रीरंगनाथजी के दर्शन भी कर रहे हैं।

अब भगवान के दर्शन करके सुकून मिली नज़र को आस लगी है, संपूर्ण मन्दिर को देखने की। तो आइए, जब तक हमारी यह उत्सुकता अपनी चरमसीमा तक पहुँच नहीं जाती; तब तक हम थोड़ा सा विश्राम कर लेते हैं।