श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६१

जिसे हरिनाम का आलस। बाबा भी उनका साथ टालते।
कहते क्यों व्यर्थ ही रोहिले को परेशान करते हो। जो भजन में ही रहता व्यस्त॥
(जयासी हरिनामाचा कंटाळा। बाबा भीती तयाच्या विटाळा। म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें॥)

रोहिले की इस कथा से बाबा एक सबसे बड़ी सच्चाई को, हर एक श्रद्धावान के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं कि, जो हरि का नाम लेता है वही मुझे प्रिय होता है। संक्षेप में यदि देखा जाए तो बाबा को सबसे अधिक प्रिय क्या होता है तो ‘नामस्मरण’।

नाम का महत्त्व क्या है यह बात ग्रंथराज श्रीमद्पुरुषार्थ का तृतीय खंड ‘आनंदसाधना’ हमें बतलाता है।

नाम एवं नामी अर्थात हम जिस परमात्मा का नाम लेते हैं वे परमात्मा और उनका नाम ये अभिन्न हैं।

नामस्मरण कोई भी कभी भी और कैसे भी करे इसके लिए उसे कोई बंधन नहीं। मात्र यही नाम हर किसी को उस परमात्मा से जोड़नेवाला ही होता है।

‘ॐकार’ यह जो विश्‍व का मूल है वह नाम तो है ही परन्तु इसके साथ ही वह नाद भी है।

नाम लेना अर्थात क्या, मुख से लेना अथवा मन ही मन उसका उच्चारण करना। जब हम उच्चारण करते हैं। उस वक्त ध्वनि लहरें उत्पन्न होती हैं और ये ध्वनि लहरें बिलकुल किसी भी रुकावट बगैर ही प्रवास करती हैं। ध्वनि लहरे, अर्थात साऊंड वेव्हज्। ये ध्वनीलहरें सहज ही दूर तक प्रवास करती हैं।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईहम अकसर देखते हैं कि रेकॉर्डिंग स्टुडियो में ध्वनि लहरों के मार्ग को रोकने के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। जिसमें उन विशिष्ट स्थानों की ध्वनिलहरों को बाहर जाने के साथ ही वहाँ से बाहर के स्थानों की ध्वनिलहरों को अंदर आने से रोका जाता है। इसके लिए विशिष्ट प्रकार के साऊंडप्रुफ सिस्टम का उपयोग करना पड़ता है। संक्षेप में यदि देखा जाए तो ध्वनि लहरों को रोकने के लिए अर्थात उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करने के लिए विशेष तौर पर कुछ भिन्न प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ती है। तात्पर्य यह है कि ध्वनि लहरे ‘अनिरुद्ध’ होती हैं। क्योंकि ग्रंथराज श्रीमद्पुरुषार्थ ने स्पष्ट प्रतिपादन किया है कि ‘इस विश्‍व के नियमानुसार कोई भी पदार्थ अथवा शक्ति नष्ट नहीं होती बल्कि रूपांतरित होती हैं।’ अर्थात इससे यह स्पष्ट होता है कि ध्वनि लहरें भी कभी नष्ट नहीं होती।

अंतत: नाम अर्थात क्या? तो केवल ध्वनि लहरें ही और ध्वनि लहरें ये अकसर ‘अनिरुद्ध’ होती हैं। अर्थात उन्हें कोई भी अवरोध नहीं कर सकता इससे निष्कर्ष क्या निकलता है, तो नाम अर्थात ‘अनिरुद्ध’।

ग्रंथराज श्रीमद्पुरुषार्थ के प्रतिपादन से भगवान का लिया जानेवाला नाम कभी भी भूतकाल में नहीं जाता है। वह सदैव उन विशेष जीवात्माओं के साथ उनके वर्तमानकाल में ही तथा उनके साथ ही रहता है।

ऊपर हमने देखा कि नाम और नामी यें दोनों एक ही हैं। अर्थात हर एक जीवात्मा द्वारा उच्चारण किया गया, उसके द्वारा लिया जानेवाला नाम उसके साथ वर्तमानकाल में होता ही है और उसके साथ ही होता है। अर्थात जीवात्मा द्वारा लिया जानेवाला परमात्मा का कोई भी नाम सदैव उसके साथ ही रहता है। तात्पर्य यह है कि परमात्मा सदैव नाम लेनेवाले हर एक जीव के साथ होते ही हैं।

अर्थात हम जितना अधिक नामस्मरण करते रहेंगे उतना ही अधिकाधिक परमात्मा का सामीप्य हम प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए भक्ति करने के लिए ‘नामस्मरण’ यह सहज एवं आसानमार्ग बतलाया गया है।

इस विश्‍व में दृश्य सृष्टि हो अथवा ना हो परमात्मा मात्र सदैव होते ही है और इसीलिए हर एक जीव के साथ ही वे जीव के किसी भी अवस्था में होते ही हैं।

कृतयुग, त्रेतायुग एवं द्वापारयुग में मनुष्यों के लिए भगवत् प्राप्ति हेतु विविध साधन बतलाये गए थे। परन्तु कलियुग में परिस्थिती को ध्यान में रखते हुए तथा कलियुग के मनुष्य की स्थिती को ध्यान में लेते हुए ‘उस’ परमात्मा ने ही मानवों के लिए ‘नामकथाकीर्तन’ यह भक्ति का आसन साधन दिया है।

कथा कीर्तन अर्थात क्या तो भगवान का ही नाम लेना। भगवान का नमा लेना, नाम का उच्चारण करना, नाम का जप करना, नामस्मरण करना यह सब हर किसी के लिए आवश्यक ही है। इस बात का पता हमेम चल जाता है। क्योंकि नाम अर्थात क्या तो ‘जो अनिरुद्ध हैं वे’ और अनिरुद्ध के होने के कारण वह किसी भी रूकावट बगैर भगवान तक पहुँचने ही वाला है।

इसीलिए फिर बाबा कहते हैं कि उन्हें नाम लेनेवाला प्रिय होता है। अर्थात नाम ही उन्हें पसंद है। क्योंकि नाम से ही उनका हर एक भक्त उनके साथ बंधता चला जानेवाला है। और इसी लिए परमात्मा और उनके भक्तों के बीच कोई भी बिचौलिया (मध्यस्थ) नहीं होता, केवल नाम ही एकमात्र साधन है उस परमात्मा तक पहुँचने के लिए।

मुझे केवल ‘नाम’ ही लेते रहना चाहिए। क्योंकि वे साईनाथ परमात्मा सदैव मेरे साथ होते ही है।