श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३५)

साईनाथ, मैं तो केवल चरणों का दास। मत कीजिए मुझे उदास।
जब तक है इस देह में साँस। अपना कार्य करवा लीजिए मुझ से॥

हेमाडपंत ने मन:पूर्वक यह माँग साईनाथ से की है। साईनाथ के चरणों का पूर्ण रूप से दास बनने के लिए हेमाडपंत तैयार हैं और इस माँग के अनुसार ही उनके जीवन में सब कुछ घटित हुआ। बावन अध्याय यानी साईसच्चरित लिखकर पूरा हो जाते ही अपनी कलम एवं माथा साईचरणों में अर्पण करके, अंतिम साँस तक साईनाथ का निजकार्य स्वयं की पूर्ण क्षमता के अनुसार करके इस दुनिया से विदा ले ली। उनके जीवित रहने का उद्देश्य केवल साईनाथ का निजकार्य संपादन करना इतना ही था। इसी के अनुसार साईसच्चरित की रचना पूरी हो जाते ही उन्होंने शरीर छोड़ दिया। सचमुच उन्होंने एक आदर्श भगवद्दास का जीवन यापन किया। हेमाडपंत ने अंतिम पंक्ति लिखी और वही उनके जीवन की अंतिम पंक्ति साबित हुई।

अंतत: जो जगत्-चालक। सद्गुरु प्रबुद्धिप्रेरक।
उसी के चरणों में अमितपूर्वक। कलम माथा अर्पण करता हूँ॥

साईनाथ का निजकार्य संपादन करने हेतु साईनाथ ने उनके हाथों में कलम सौंपी थी और हेमाडपंत ने अंतिम साँस तक निरंतर अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभायी। अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभाने के लिए और कर्ता साईनाथ ही हैं इस बात का सदैव स्मरण बना रहे इसके लिए उन्होंने अपना माथा सदैव साईनाथ के चरणों पर ही रखा था, वे सदैव लोटांगण स्थिति में ही थे। साईबाबा ही निजकार्य हेतु साध रहे हैं, मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ, इस बात का अहसास हेमाडपंत के मन में निरंतर बना रहता था।

साई ही लिखने लिखवाने वाले स्वयं। भक्तकल्याणहेतु से॥

यह बात हेमाडपंत के मन में ओतप्रोत भरी हुई थी। मैं साईसच्चरित का रचनाकार नहीं हूँ, बल्कि बाबा ही भक्त-कल्याण-हेतु यह सब कुछ लिख रहे हैं, यह हेमाडपंत की धारणा थी। हम भी जब भक्ति-सेवा-कार्य करते हैं, उस वक्त हमें भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। ‘मैं कितनी सेवा करता हूँ, मैं इस कार्य हेतु स्वयं को कितना व्यस्त रखता हूँ आदि बातों का अहंकार किए बगैर ‘यह सब कुछ साईनाथ ही करवा रहे हैं, वे ही शक्तिदाता, बुद्धीदाता हैं, उन्होंने ही मुझे सन्मार्ग पर रखा है’, यही हमारा भाव होना चाहिए।

हेमाडपंत हमारी भूमिका सुस्पष्ट हो इसी खातिर अत्यन्त सुंदर उदाहरण देते हैं। प्रथम उदाहरण देते हैं, वह हार्मोनियम का। इस उदाहरण का खुलासा उन्होंने बड़ी ही सुन्दरता से किया है, अपनी भूमिका को स्पष्ट करने के लिए।

कैसे बजेगी वह पेटी (हार्मोनियम) या बंसी। चिन्ता नहीं इसकी उस पेटी या बंसी को।
यह तो उस बजानेवाले की इच्छा। पेटी या बंसी को चिन्ता करने की क्या जरूरत॥

बंसी यानी बांसुरी और पेटी यानी हार्मोनियम। बांसुरी अथवा हार्मोनियम स्वयं स्वर निर्माण नहीं करते। बांसुरी बजानेवाला एवं हार्मोनियम बजानेवाला अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उनमें से से वे स्वर का निर्माण करते रहते हैं। हम जब किसी बासुरी की मधुर धुन सुनते हैं, तब क्या हम प्रशंसा बासुरी की करते हैं कि वाह, बांसुरी तुमने कितना सुंदर मधुर स्वर बजाया? नहीं। हम उस बासुरी-वादक की पीठ थपथपाते हैं। यदि कोई बड़ी ही खूबसुरती से हार्मोनियम बजाता है, तब हम उस हार्मोनियम बजानेवाले को उसका श्रेय देते हैं ना कि हार्मोनियम को। बंसी और हार्मोनियम इनका काम क्या है, तो बजानेवाले की इच्छा के अनुसार ही बजना और यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाईइन दोनों वाद्यों का नामनिर्देश हेमाडपंत करते हैं, परन्तु यह सभी प्रकार के वाद्यों के बारे में सच है। हर एक वाद्य उसी समय मधुर स्वर का निर्माण कर सकता है, जब वह अपना स्वयं का भिन्न सुर नहीं लगाता है और पूर्णरूपेण वादक के आधीन रहता है। वह वाद्य अपना संपूर्ण अधिकार, अपना ‘सर्व-स्व’ वादक को अर्पण कर देता है और इसीलिए उस वाद्य से मधुर स्वर निर्माण होते हैं।

हमारा जीवन भी एक प्रकार का वाद्य ही होता है, परन्तु यह वाद्य स्वयं का अलग ही सुर लगाते रहने के कारण कर्कश बन जाता है, उसमें माधुर्य नहीं आता। इसके लिए कारणीभूत होता है, हमारा अपना स्वयं का अहंकार। दास बनना यानी वाद्य के समान बनना, इसी सच्चाई को हेमाडपंत यहाँ पर उजागर कर रहे हैं। हमारा जीवनरूपी वाद्य मधुर स्वर कब निर्माण कर सकेगा? जब हम अपना सर्वस्व साईनाथ के हाथों सौंप देंगे, तब ही। ‘हमारे जीवन में रूक्षता, कर्कशता, बेसुरापन क्यों है’, इस बात का उत्तर प्रस्तुत पंक्ति हमें दे रही है।

हमें निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए।

१) स्वयं के वाद्यत्व को मान्य करना।
मैं वादक नहीं हूँ, बल्कि मैं तो केवल वाद्य ही हूँ और वादक साईनाथ है। मैं साईश्याम के हाथों की मुरली हूँ और उनकी इच्छा के अनुसार ही मैं बजूँगा, इस बात का ध्यान मुझे रखना चाहिए। एक बार यदि स्वयं की इस भूमिका को मैं समझ लेता हूँ, तो फिर सब कुछ बिलकुल आसान हो जाता है।

२) वादक के स्वामित्व को मान्य कर लेना:
इसका अर्थ है, स्वयं के कर्मस्वातंत्र्य को साईचरणों में समर्पित करके ‘बाबा, आप जैसा चाहते हैं वैसा ही हो’ इस भूमिका का स्वीकार करना। मुझ पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, मेरा जीवन भगवान का है और इस जीवन को वे जैसा चाहते हैं वैसा आकार दें। बाबा ने उसे हार्मिनियम बना दिया और मुझे बासुरी क्यों बनाया? मुझे हार्मोनियम क्यों नहीं बनाया? इस प्रकार के प्रश्‍न ही ङ्गिर खड़े नहीं होंगे और यदि तुलना नहीं होगी तो मत्सर की भावना कहाँ से आयेगी?

३) स्वयं को सुधारने की निरंतर कोशिश:
वाद्य उचित आकार का, उचित रचना का एवं उचित रूप में क्रिया करनेवाला होगा तो हीवह माधुर स्वर निर्माण करने में सक्षम होगा। मुझे अपने अंदर की त्रुटि को दूर करने का स्वयं को सुधारने का प्रयास निरंतर करते रहना चाहिए। मैं जितना भी अधिकाधिक निर्दोष बनता जाऊँगा, उतना ही मेरे जीवन में मधुर स्वर निर्माण होनेवाला है।

४) स्वयं का अलग ही सुर न लगाना:
‘बाबा, मेरी इच्छा ऐसी होने पर भी आप मुझ से ऐसा करने को क्यों कह रहे हैं? मुझे ही यह क्यों करने को कह रहे हैं? बाबा, मैं जो चाहता हूँ वह कार्य करने के लिए आप इनकार क्यों कर रहे हैं?’ इस प्रकार की स्वयं की अलग इच्छा रखना यानी स्वयं का अलग सुर लगाना। साईनाथ की इच्छा ही मेरी इच्छा होनी चाहिए।

५) जीवन में मधुर स्वर निर्माण होने का संपूर्ण श्रेय साईनाथ का ही है:
मेरे जीवन में मधुर स्वर निर्माण हुआ, इसका श्रेय मुझे न होकर यह सब कुछ मेरे बाबा के कारण ही हुआ है, इस बात का अहसास मुझे होना आवश्यक है। मेरे कारण मधुर स्वर निर्माण हुआ, ऐसा यदि मैं मानता हूँ तो वह सर्वथा गलत ही है।

६) स्वर उत्पन्न करनेवाला (बुलवानेवाला) मालिक साईनाथ ही:
सुर यदि वाद्य से उत्पन्न होता दिखाई देता है, ङ्गिर भी वह वाद्य सुर निर्माण नहीं करता यही सच्चाई है, उसे बुलवानेवाला (बजानेवाला) धनी कोई और ही होता हैं, बजानेवाला ही होता है, बिलकुल वैसे ही मुझ से जो कुछ भी अच्छे कार्य हो रहे हैं, उसके कर्ता करवानेवाले साईनाथ ही हैं, इस बात का दृढ़ विश्‍वास होना चाहिए।

हेमाडपंत हम से यही कह रहे हैं कि बोलते समय, लिखते समय तुम्हें यदि हेमाडपंत दिखायी दे रहे हैं, तब भी मैं केवल साईनाथ के हाथों की मुरली ही हूँ, कर्ता और करवानेवाले तो केवल साईनाथ ही हैं। ‘बाबा आप मुझे अपनी इच्छा के अनुसार ही चलाइए, आप जैसा चाहते हैं, वही सुर दीजिए।’

हेमाडपंत ने इसी दासत्व की भूमिका में अपना जीवन यापन किया। हमें भी वाद्य की इस भूमिका को समझ लेना चाहिए, क्योंकि यह भूमिका समझ लेना और उसे पूरी ईमानदारी से पूरा कर लेने से ही हमारे जीवन में मधुर स्वर गूँजेगा।