श्रीसाईसच्चरित : अध्याय- २ (भाग- ४९)

हेमाडपंत की शिरडी में श्री साईनाथ से हुई पहली मुलाकात यह उनके जीवन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। इस पहली मुलाकात में ही उन्होंने भक्तिमार्ग का बहुत महत्त्वपूर्ण मकाम प्राप्त कर लिया। शिरडी में कदम रखते ही सर्वप्रथम उन्हें इस तत्त्व का अनुभव हो गया कि भक्तिमार्ग में भक्त यह भगवान के पास नहीं जाता बल्कि भगवान ही भक्त के पास आते हैं। भगवान जब मेरे पास आते हैं, उस समय ‘उठकर बैठने में’ देर नहीं करनी चाहिए। जो भगवान की दिशा में प्रथम कदम उठाता है, उसके कदम उठते ही भगवान सौ कदम चलकर उसके पास आ पहुँचते हैं। बाबा स्वयं वाडे के कोने तक हेमाडपंत के प्रेम से खींचे चले आये, यही साईनाथ की भक्तवात्सल्य हेतु घटित होनेवाली लीला है।

मेरे भगवान मेरे लिए स्वयं तकलीफ़ उठाकर मुझसे मिलने के लिए आ पहुँचते हैं। इस बात का पता चलते ही हेमाडपंत भी पलभर का भी विलंब न करते हुए तुरन्त ही उतनी ही उत्कटता से बाबा के दर्शन हेतु दौड़ पड़ते हैं। बाबा को सामने देखते ही बाबा के दर्शन से ही हेमाडपंत का दिल भर आता हैं, अंत:करण में प्रेम उमड़ पड़ता है और वे बाबा के चरणों पर सिर रखकर वे बाबा की चरणधूल में लोटांगण करते हैं। एक पल के लिए भी जिनकी झलक पा लेने के लिए योगीजन, ऋषिगण हजारों वर्ष, जन्म-जन्मातरों तक तपश्‍चर्या करते रहते हैं, ज्ञानी ज्ञानमार्ग का मुश्किल प्रवास करते हैं, वे भगवान स्वयं अपने ही अकारण कारुण्य के कारण मुझे दर्शन दे रहे हैं, यह जानकर हेमाडपंत के मन में बाबा के इस प्रेम के प्रति, परिश्रम के प्रति कृतज्ञता का भाव उमड़ पड़ता है।

‘साईनाथ के दर्शन करने का योग केवल बाबा के अकारण कारुण्य से ही आया है, बाबा के चरण देखने का अमृतयोग बाबा की ही कृपा के कारण आया है। इस घटना के पीछे मेरा अपना कोई कर्तृत्व न होकर ये सब साईनाथ की ही भक्तवत्सलता है। बस! अब तो बस यही एक! मेरे भगवान! मेरे सखा! यही मेरे सर्वस्व!’ इसी दृढ़भाव के साथ हेमाडपंत बाबा के प्रति अनन्य-शरण हो जाते हैं। इस भगवान के दर्शन कैसे करने चाहिए, यही हमें हेमाडपंत के आचरण से पता चलता है। हेमाडपंत अपनी उस प्रथम मुलाकात में ही साई का दर्शन लेते समय अपनी आँखों के रास्ते भगवान के इस सगुण साकार रूप को अपने दिल में उतार लेते हैं, दृढ़ कर लेते हैं, वह भी हमेशा के लिए!

सचमुच साई के इस दर्शन से हेमाडपंत की स्थिति उन्मनी हो चुकी है। अब बाबा सामने हों या ना हों परन्तु हेमाडपंत को अब अपनी आँखों के सामने सदैव ये साई ही नज़र आने लगते हैं। ‘जहाँ देखे वहाँ पूरणकाम।’ संत एकनाथजी के अभंग की इस पंक्ति के अनुसार अब हेमाडपंत के लिए संपूर्ण सृष्टि ही साईमय हो चुकी है। सभी रूपों में ये साईनाथ ही विराजमान है। ‘सर्व विष्णुमयं जगत्’ यह सिद्धान्त हम ग्रंथ में ही पढ़ते हैं। परन्तु इस बात का अनुभव लेना अत्यावश्यक है। हेमाडपंत की तो प्रथम साई मुलाकात में ही यह स्थिति हो चुकी है। आगे चलकर वे १४९ वी ओवी (मराठी भाषा की चौपाई) में कहते हैं- ये साईनाथ, एकमात्र केवल ये मेरे बाबा ही मेरी आँखों में समा जायेंगे तो फ़िर यह संपूर्ण सृष्टि ही साईमय बन जायेगी।

हा साई एक मिनलिया दृष्टि। सकल सृष्टि साईरूप॥
(एकमात्र ये साई ही जब दृष्टि में समा जायेंगे। फ़िर सारी सृष्टि साईमय बन जायेगी।)

हेमाडपंत यहाँ पर हमें यही बताना चाहते हैं कि साईनाथ का दर्शन करते समय हम जितना भी बाबा का सगुण साकार रूप अपने अन्तर्मन में उतार सकते हैं, उसे दृढ़ कर सकते हैं, उतना ही उसे दृढ़ करने का प्रयास करना चाहिए। साई का दर्शन करते समय कम से कम उतने समय तक के लिए तो सब कुछ भूल जाना चाहिए, यहाँ तक कि स्वयं को भी भूल जाना चाहिए, केवल सामने इस साईनाथ को ही जी भरकर निहारते रहना चाहिए। नज़र से मन में उतारने की अधिक से अधिक कोशिश करनी चाहिए।

साई के पास जब तुम आते हो, तब तुम्हारे जीवन में उस व़क्त चाहे अनेक प्रॉब्लेम्स् क्यों न हों, तुम यदि कुछ माँगना भी चाहते हो, तुम्हें कुछ मन्नत माँगनी हो; जो कुछ भी है, वह सब कुछ बाद में, सबसे पहले कहना चाहिए- हे साईनाथ! मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है। हमें कुछ न कुछ माँगना तो अवश्य पड़ता है, लेकिन बाबा के समक्ष खड़े रहने पर, उनका दर्शन करते समय पहले जी भर कर उन्हें निहारना है, उन्हें अपनी आँखों में उतारना है और कम से कम उतनी देर के लिए सब कुछ भूलकर हमें बाबा को ही बाबा से माँगने आना चाहिए। हे साईनाथ, मुझे तुम्हें ही तुमसे माँगना है!

बाबा से बाबा को ही माँगना चाहिए। किसी और से नहीं माँगना है, क्योंकि बाबा के पास कोई भी दलाल नहीं हैं, एजंट नहीं हैं। साथ ही केवल बाबा ही स्वयं ही स्वयं को पूर्णत: भक्त को दे देनेवाले हैं, अन्य कोई भी मुझे साई नहीं दे सकता। इसीलिए अन्य किसी से कहकर, अन्य कोई एजंट ढूँढ़कर भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। भक्त और भगवान के बीच कोई भी दलाल नहीं होता है। भक्त और भगवान का रिश्ता सदैव प्रत्यक्ष ठेंठ सीधा रिश्ता होता है। इसीलिए जब हम बाबा के समक्ष उनके दर्शन करने के लिए खड़े रहते हैं, उस समय हमें संपूर्णत: बाबा को ही माँगना चाहिए। और उस क्षण बाकी सब कुछ एक तरफ़ रखकर, स्वयं को भी भुलाकर ‘मेरे बाबा ही केवल मुझे चाहिए, जो मेरे सामने हैं, मेरे साईबाबा पूरे के पूरे मुझे ही चाहिए’, इस प्रेमभाव के साथ जी भरकर केवल बाबा को ही देखते रहना चाहिए।

‘मैं केवल आप ही को चाहता हूँ’ यह भाव जब मन में उठता है, तब यह अनन्य रूप में देखना अपने आप ही घटित होता है। साईनाथ के अलावा मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए। मुझे केवल मेरे साईनाथ ही चाहिए, इस भाव के साथ जो कछुए के बच्चों की तरह बाबा को निहारता है, बाबा उसके हो ही जाते हैं। बाबा उस भक्त के अधीन हो जाते हैं। इस तरह वे हर एक अनन्य-शरण होनेवाले श्रद्धावान के पूरी तरह होकर भी पुन: वे साईनाथ पूर्ण ही रहते हैं और इस तरह हर एक श्रद्धावान के होकर भी पुन: वे अपने मूल रूप में भी पूर्ण होते ही है। यह कार्य केवल वे ही कर सकते हैं और इसीलिए वे ही केवल एकमात्र पूर्णपुरुष हैं।

ये साई दृष्टि में समा जाने चाहिए। हमारी आँखों के समक्ष ही हेमाडपंत के नातीबहू का अर्थात मीनावैनी का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उन्होंने इस साईनाथ को मन की दृष्टि में घोल लिया था और इसीलिए उन्होंने स्वयं का जीवन सार्थक कर लिया था और ये साईनाथ पूरे के पूरे उन्हीं के बनकर रह गये थे। इस साईनाथ को दृष्टि में कैसे बसा लेना है, इसका सीधा-सादा सरल उपाय है, मीनावैनी के स्वानुभवों की सुंदर रचनाएँ। उन रचनाओं का अध्ययन करने पर हमारे लिए यह समझना आसान हो जायेगा कि इस साईनाथ को दृष्टि में कैसे घोलना चाहिए। मीनावैनी कहती हैं- ‘सुई की नोक के बराबर भी दुख मेरे साईनाथ को मेरे कारण न होने पाये। मैं कितनी भी पीड़ा सहने के लिए तैयार हूँ।’ भक्ति की ऐसी ताकत रखनेवाली इस भक्तश्रेष्ठ तपस्विनी के अभंग हमारे लिए साक्षात् प्रमाण हैं। ‘साई के चरण ही हमारे वेदशास्त्रपुराण हैं।’ हेमाडपंत कहते हैं कि ये जो साईनाथ के चरण हैं, वे हमारे वेद, शास्त्र और पुराण हैं। हमारे लिए उन चरणों के बत्तीस के बत्तीस लक्षणों का अनुभव प्राप्त करने वाली मीनावैनी के अभंग वेद ही हैं।

मीनावैनी ने साईरूप को प्रत्यक्ष में अनुभव किया, उस साईदर्शन के समय का उनका अभंग ही इस सगुण साकार साईनाथ को दृष्टि में कैसे घोलना चाहिए, इस बात का परिचय करवाता है। मीनावैनी कहती हैं- ‘सद्गुरु को देखते ही आँख भर गयी, मन का नमन हो गया, हृदय ठिठक गया’।

‘इन आँखों में अब उस साईनाथ के अलावा अन्य कोई भी नहीं है’ यही ‘आँखें भर गई’ इसका एक अर्थ है और ‘बाबा को देखते ही प्रेमवश आँख भर आयी’ यह दूसरा अर्थ है। मन अपने आप ही साई के प्रेम से ‘बेभान’ हो गया अर्थात मुझे मेरी ही विस्मृति हो गई। मन का ‘बेभान’ हो जाना अर्थात मुझे मेरी ही विस्मृति हो गई। मन जहाँ पर बेभान हो गया वहाँ पर मैं का भी अपने आप ही विस्मरण हो गया। ‘हृदय ठिठक गया’ इसका अर्थ है- ‘मेरा’ ‘मेरा’ यह जो अव्याहत घोष मेरे अहंकार के कारण मेरे दिल में चल रहा था, वह वहीं पर रुक गया और वह भी कैसे, तो बिलकुल अपने आप ही। इसीलिए इस स्थिति को वे ‘दिल ठिठक गया’ कहती हैं।

साईनाथ को देखते ही अपने आप ही मेरा हृदय, मेरे मेरेपन का ‘मैं’ उस सद्गुरु-अस्तित्व के प्रवाह में ही ठिठक गया, मेरा ‘मैं’ खत्म हो चुका और उस स्थान पर, ‘मुझे केवल मेरे साईनाथ ही चाहिए’, ‘हे साई, अब मेरे जीवन में केवल तुम ही हो’, यह भाव प्रवाहित हो गया। जिस तरह सागर से मिलने पर नदी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, बिलकुल उसी तरह मेरा भी अस्तित्त्व समाप्त हो चुका है।

पहले मैं रूखा था और इसीलिए मेरी आँखें भी रूखी ही थीं। पहले मेरा ‘मैं’ ही कर्ता था। इसीलिए मन बेभान नहीं था, वह केवल मेरा बनकर रहता था। पहले मेरा ‘मैं’ क्रियाशील था, इसलिए मेरा हृदय साईप्रेम से ठिठकता नहीं था। अब आँखें, मन एवं हृदय इनकी क्रियायें बिलकुल विरुद्ध दिशा में मुड़ गई हैं। अन्तर्मुख हो गयी हैं।

आँखों की क्रिया (ऐच्छिक क्रिया- Voluntary Action), हृदय की क्रिया (अनैच्छिक क्रिया- Involuntary Action) और मन की क्रिया (काल्पनिक क्रिया- Imaginary Action) ये तीनों क्रियाएँ मनुष्य देह में चलती रहती हैं। साई दृष्टि में घुल गये, इसका अर्थ ही यह है कि ये सभी क्रियाएँ अब साईचरणों में ही एकरूप हो गईं। अब शरीर एवं मन इन दोनों की हर एक क्रिया केवल ‘साईनाथ’ इसी अधिष्ठान पर आधारित हो गई। ‘संपूर्ण संसार का साईमय हो जाना’ इसका अर्थ है- जल में, स्थल में, काष्ठ में, पाषाण में साईनाथ ही दिखाई देना, इतना ही नहीं बल्कि देह की अन्त:सृष्टि का यानी शरीर, मन, बुद्धि एवं सभी इंद्रियगण आदि समूची देहसृष्टि का साईमय हो जाना। और इस कार्य को करने के लिए मीनावैनी का आदर्श हमारे समक्ष है ही।