श्रीसाईसच्चरित : अध्याय- २ (भाग-१४)

पिछले लेख में हमने श्रीसाईसच्चरित की कथा में ‘श्रवण करना’ इस शब्द के भावार्थ के बारे में अध्ययन किया। स्वयं बाबा ने ही २१ वे अध्याय में एक प्रांत अधिकारी से कहा है, ‘आप्पा ने जो बताया है उसे पूर्ण रूप से आचरण में उतारने से ही भला होगा।’

बाबा ने उन्हें यहाँ पर सुस्पष्ट शब्दों में कहा है कि एक कान से सुनना और दूसरे से निकाल देना यह ‘सुन लिया’ इस क्रिया का अर्थ नहीं है, अपितु सुनी हुयी बात को हमें हमारे अपने आचरण में उतरना चाहिये तब ही उस ‘सुनने’ का मनुष्य के जीवन में कोई मायने होता है।

इसके बारे में हेमाडपंत भी आगे कहते हैं,

 ‘श्रवण करना’

‘‘ग्रंथ करना है पहले श्रवण।
उसी को फ़िर करना है मनन।
फिर पारायण आवर्तन।
और करें निदिध्यासन।
पढ़ना ही का़फ़ी नहीं है।
ज़रूरी है उसे आचरण में लाना।’’

अन्य कोई पढ़ता है और हम सुनते हैं अथवा स्वयं ही पढ़ते-पढ़ते सुनना इस प्रकार की किसी भी पद्धति से श्रीसाईसच्चरित सुनने की क्रिया अपनायी जा सकती है, लेकिन वह क्रिया वहीं पर खत्म न होकर उस सुनने को यानी सिद्धान्त को ‘प्रॅक्टिकल’ स्वरूप में अपने आचरण में उतारना ज़रूरी है।

साई की इन कथाओं को किस तरह सुनना चाहिए, इस बात का वर्णन करते समय हेमाडपंत कहते हैं- श्रीसाईसच्चरित की कोई भी कथा हो, उसे ‘सावधानीपूर्वक’ ही सुनना चाहिए। जब हम इन कथाओं को ‘सावधानीपूर्वक’ सुनेंगे तब ही जाकर हमारे आचरण में इस सावधानता का समावेश होगा।

संत रामदास स्वामी कहते हैं- ‘सर्वप्रथम बरतनी चाहिए सावधानी।’ हर एक मनुष्य को सदैव सावधान रहना ही चाहिए और यह सावधानता केवल कृति में ही उतारना काफ़ी नहीं है, बल्कि आहार, विहार, आचार और विचार इन चारों में भी इस सावधानी का होना बहुत ही ज़रूरी है।
इस भौतिक जगत में जीवन जीने के लिए इस सावधानी की ज़रूरत जितनी अधिक है, उतनी ही वह आध्यात्मिक धरातल पर भी है।

हम भक्ति करते हैं, भगवान का नाम भी लेते हैं, तो हमें भला सावधान रहने की क्या ज़रूरत है, ऐसा प्रश्‍न भी मन में उठ सकता है। परन्तु हर एक मनुष्य को एक बात का ध्यान तो अच्छी तरह से रखना ही चाहिये कि जितनी सावधानी हम अपने दैनिक व्यावहारिक जीवन में रखते हैं, उतनी ही हमें भक्ति के क्षेत्र में भी रखनी ही चाहिए। क्योंकि व्यवहार में जिस तरह लोग अनगिनत मुखौटे लगाकर घुमते रहते हैं, बिलकुल यही भक्तिमार्ग में भी हो सकता है।

इसका अर्थ क्या यह है कि हम सारी जिन्दगी शक के दायरे में ही बंद रहेंगे? बिलकुल भी नहीं। क्योंकि हर एक मनुष्य को यह सावधानता वे सद्गुरु, वे परमात्मा प्रदान करते रहते हैं। जब भी कभी व्यवहार में अथवा अध्यात्मिक मार्ग पर हम मुखौटों के जाल में फ़ॅंस जाते हैं, तब वे परमात्मा लगातार हमें उस मुखौटे के प्रति सावधान करते रहते हैं। परमात्मा जब सगुण साकार मानवी रूप में आते हैं, तब वे स्वयं हमें बोल बोलकर उन मुखौटों के बारे में सावधान करते हैं। कभी अपनी वाणी माध्यम से तो कभी किसी अन्य प्रकार से ‘वे’ मनुष्यों को सावधान करते ही रहते हैं। ज़रूरत होती है, केवल मनुष्य को उस ओर ध्यान देने की।

और इतना करने पर भी यदि मनुष्य ध्यान नहीं देता, तब भी वे परमात्मा अपना कर्तव्य कभी नहीं भूलते, वे अपना काम करते ही हैं और फ़िर उस पाखंडी मनुष्य का मुखौटा फ़ाड़कर फ़ेक देते हैं और उसका असली रूप हर किसी को दिखायी देता है। ऐसे इन अनुभवों के माध्यम से परमात्मा अपने श्रद्धावान की सावधानता को अधिक से अधिक बढ़ाते ही रहते हैं। इसीलिए भक्तिमार्ग में रहने वाले श्रद्धावान स्वयं को कभी भी बुद्धु न समझे, क्योंकि ऐसों को सावधानता प्रदान करने का काम स्वयं परमात्मा ही करते हैं और इसके लिये केवल परमात्मा पर हमारी पूरी निष्ठा होनी चाहिए और उनके चरणों में पूर्णत: शारण्यभाव रखना चाहिए।

‘सावधानी’ हर मनुष्य में होनी ही चाहिए। फ़िर साईनाथ की कथा का पठन करने से यह ‘सावधानी’ कैसे प्राप्त होगी? हेमाडपंत के कहने के अनुसार ‘ज़रूर मिलेगी’ क्योंकि हेमाडपंत का पूरा विश्‍वास है कि उनके सद्गुरु साईनाथ इस कथा को सुनने वाले हर एक को यह सावधानी अवश्य देंगे। साईसच्चरित की किसी भी कथा को पढ़ने पर हमारा मन अपने आप ही उसके बारे में सोचने लगता है। इससे ‘क्या उचित है और क्या अनुचित’ इस बात का ज्ञान उसे होने लगता है। जब कभी भी हमारे जीवन में ऐसी स्थिति निर्माण होती है, उस समय हमें किस तरह व्यवहार करना है, इस बात का मार्गदर्शन सद्गुरु ही हमें करते हैं, लेकिन इसके लिए साई की कथाओं को पूरी सावधानी से सुनना चाहिये। यह तो हमने पहले देख ही लिया है कि साईं की कथाओं को ‘सुनना’ इसका अर्थ ‘सावधानता को अपने आचरण में उतारना’ यह है।

मनुष्य की विवेकबुद्धि तो अच्छी होती है, लेकिन उसका मन चंचल होता है। सावधानी का मतलब संशयी वृत्ति यह नहीं है, बल्कि सावधानी का अर्थ है- दक्षता,और यह दक्षता अकसर बुद्धि के पास होती है परन्तु मन के पास नहीं होती। चंचल रहनेवाले इस मन को बुद्धि बारंबार सचेत करती रहती है और यह मन एक शरारती बच्चे की तरह बुद्धि की बात बहुत कम सुनता है।

जब कभी भी मन बुद्धि की बात सुनता है तब मनुष्य का फ़ायदा ही होता है। इसीलिए यह सावधानता विशेष तौर पर मन को ही सिखाना होता है। जब तक यह मन थोड़ी-बहुत गलती करता है वहाँ तक तो ठीक है, परन्तु जब वह अपनी मर्यादा की सीमा को तोड़ वाहियात हरकतें करने लगता है तब वह उस मनुष्य का आत्मघात करता है और इसीलिए सावधानी बरतना अति आवश्यक होता है।

अकसर हमसे यह कहा जाता है कि परमात्मा के चरित्र का, संतों के चरित्र का बारंबार पठन, मनन एवं चिंतन करना चाहिए। यहाँ पर बारंबार यह शब्द बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। यह बारंबार की जाने वाली क्रिया मन के लिए अति आवश्यक है। क्योंकि कोई भी बात मन को बारंबार बताने पर ही वह मन में गहराई तक उतर जाती है, अन्तर्मन में दृढ़ हो जाती है और इसके पश्‍चात् ही मन उसके अनुसार क्रिया कर सकता है।
सारांश में कहना हो तो साईचरित्र की कथाओं को सावधानीपूर्वक सुनना यह मन के द्वारा उन कथाओं को सुनकर उनके अनुसार उचित आचरण करने का दृढ़ निश्‍चय करना और उसी के अनुसार कृति करना यह है।

सावधानीपूर्वक सुनी गई उस साईचरित्र की कथाएँ इससे भी आगे बढ़कर क्या-क्या करती हैं, इसके संबंध में हेमाडपंत कहते हैं –

‘‘श्रवणार्थियों के कर्मपाश।
तोड़ देती ये कथाएँ अशेष (संपूर्णत:)।
सुप्रकाश प्रदान करती बुद्धि को।
निर्विशेष सुख सर्वथा॥

अर्थात जो भी कोई इन कथाओं को सुनता है उनके कर्मपाश पूरी तरह तोड़ दिए जाते हैं और बुद्धि को सद्गुरुरुपी ज्ञानसूर्य प्रकाशित करते हैं और इस प्रकाशित बुद्धि की रोशनी में (उजाले में) मन उचित मार्ग पर से मार्गक्रमण करता है। इससे भी आगे बढ़कर हेमाडपंत कहते हैं –

‘‘कानों में पड़ते ही चार अक्षर ।
तत्काल ही जीवों का दुर्दिन टर जाये।
संपूर्ण कथा सुनते ही प्रेमभाव उमड पडे।
भावार्थी का हो जाये उद्धार॥

इतना ही नहीं, बल्कि ये कथाएँ मनुष्य का जीवन सुफ़ल-संपूर्ण बनाती हैं और इस भवसागर से उसकी जीवन की नैय्या को पार कर देती हैं।