श्‍वसनसंस्था ३४

श्‍वसनसंस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करते हुए हमें काफ़ी दिन हो चुके हैं। हमारी श्‍वास एक सीमा तक हमारे नियंत्रण में रहती है। परन्तु यह सीमा काफ़ी छोटी है। वास्तव में श्वास का नियंत्रण हमारे बस से बाहर ही होता है। श्‍वासो पर कौन और कैसे नियंत्रण रखता है, अब हम यह देखेंगें।

अनेक घटक हमारी श्‍वास पर नियंत्रण करते हैं। सर्वप्रथम हम यह देखेंगें कि हमारी चेतासंस्था श्वसन पर किस प्रकार नियंत्रण करती है। अधिक कॅलरीज को घटाने वाली कसरत हो या श्‍वसन संस्था पर पड़ने वाला कोई भी तनाव हो, हमारी चेतासंस्था, श्‍वसन के वेग को इस प्रकार नियंत्रित करती है कि धमनियों के रक्त में प्राणवायु का दाब Po२ और कर्बद्विप्रणिल वायु का दाब PCo२ इनमें नॉर्मल स्थिति की तुलना में ज्यादा कुछ बदलाव नहीं होता। यह कैसे होता है, अब हम यह देखेंगें।

‘श्‍वसनकेन्द्र’ अथवा Respiratory Centre –
हमारे मस्तिष्क के मेड्युला और पॉन्स नामक जो दो विभाग होते हैं, वहाँ पर इस श्‍वसन का केन्द्र होता है। यहाँ पर चेतापेशी और तंतु के तीन प्रमुख गुट होते हैं। प्रत्येक गुट श्‍वसन के विभिन्न मार्गों पर नियंत्रण रखता है।
ये तीन गुट इस प्रकार हैं –

१) डॉरसल श्‍वसन गुट : जो  अंदर लेने (inspiration) की क्रिया पर नियंत्रण रखता है।
२) वेंट्रल श्‍वसन गुट : यह भाग श्‍वास और उच्छवास दोनों पर नियंत्रण रखता है।
३) न्युमोटॅक्सिक केंद्र : यह भाग श्वसन के वेग और श्‍वसन के प्रकार दोनों पर नियंत्रण रखता है।

अब हम उपरोक्त गुटों की सविस्तर जानकारी प्राप्त करेंगें।

डॉरसल श्‍वसन गुट : इसकी जानकारी प्राप्त करने से पहले, अपनी चेतासंस्था की सर्वसाधारण जानकारी प्राप्त करेंगे। चेतासंस्था में मुख्य रुप से दो प्रकार के चेतातंतु होते हैं। शरीर के विभिन्न भागों से विविध प्रकार की संवेदनायें मस्तिष्क तक पहुँचाने वाली सेन्सरी (Sensory) चेतातंतु तथा मस्तिष्क से शरीर के स्नायुओं एवं अवयवों को कार्य करने की आज्ञा पहुँचाने वाले मोटर (motor) चेतातंतु। डॉरसल श्‍वसन गुट में भी दोनों प्रकार के चेतातंतु होते हैं। इनमें से संवेदना वहन करनेवाले चेतातंतु मेड्युला में एक केन्द्र पर जमा होते हैं। ये सभी चेतातंतु वेगस और ग्लोसोफॅरिंजिअल नामक दो चेतारज्जुओं के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। ये चेतातंतु तीन प्रकार की संवेदना मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं।

१) केमोरिसेपटर्स – जो रक्त एवं शरीर के विविध ऊतियों के द्राव में होनेवाले रासायनिक बदलाव को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं।
२) बॅरोटिसेपटर्स – जो फेफड़ों एवं रक्त की वायु के दाब में बदलाव की सूचना मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं।
३) फेफड़ों के अन्य टिसेपटर्स – श्‍वसन के नियंत्रण में ये रिसेप्टर्स महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

डॉरसल श्‍वसन गुट की ‘मोटर’ चेतातंतु श्वास के अंदर लेने की क्रिया (inspiration) घटित करवाते हैं। हृदय की लय अथवा Rhythem सायनस जोड़ में निर्माण होती है। उसी तरह श्‍वसन की मूल अथवा पायाभूत लय यहाँ पर निर्माण होती है और वह फेफड़ों तक ले जायी जाती है। श्‍वसन क्रिया की यह लय मुख्यत: द्विभाजक परदे की ओर ले जायी जाती है। श्‍वसन की शुरुआत में यह लय धीमी होती है और अगले २ सेकेंड़ में लय की गति बढ़ती जाती है। अगले तीन सेकेंड़ के लिये यह वहन रूक जाती है। वापस इसी प्रकार से प्रत्येक पाँच सेकेंड़ में यह चक्र शुरू ही रहता है।

शुरुआत के दो सेकेंड़ में यह लय बढ़ती जाती है, तब श्वास अंदर लिया जाता है। इसकी गति के धीरे-धीरे बढ़ते जाने पर फेफड़ों का प्रसरण भी एक निश्चित गति से होता है। इस लय को Ramp Signal कहते हैं। इसी समय में हम श्वास अंदर लेते हैं। अगले तीन सेकेंड़ में इस लय में आनेवाले signals रुक जाते हैं। इस दौरान फेफड़ों का इलॅस्टिक रिकॉइल होने से हम उच्छवास बाहर निकालते हैं।

शरीर के ऍक्टिव कार्य में अथवा व्यायाम के दौरान, इन सिग्नल्स की गति बढ़ जाती है। इसके कारण अलविओलाय तुरंत हवा से भर जाती हैं। निश्चित समय के बाद ये रॅम्प सिग्नल्स पूरी तरह रुक जाते हैं। इन रॅम्प सिग्नल्स की समय सीमा जितनी कम होती है, उतना ही inspiration कम और expiration (उच्छवास) भी कम समय के लिये होता है। फलस्वरूप श्‍वसन की गति बढ़ जाती है। प्रति मिनट हम ज्यादा बार श्वासोच्छवास करते हैं।

न्युमोटॅक्सिक केंद्र – यह केन्द्र प्रमुख रूप से श्वास (inspiration) पर नियंत्रण रखता है। वास्तव में यह श्वास की कालावधि पर नियंत्रण रखता है। श्वास के नियंत्रण का मुख्य केन्द्र (Inspiration Centre) डॉरसल श्वसन गुट में होता है यह हमने देखा है। इस गुट से Ramp संदेश द्विभाजक परदे की ओर जाते हैं। दो सेकेंड़ के लिये ये संदेश शुरु रहते हैं। उसके बाद तीन सेकेंड़ों तक ये संदेश बंद होते हैं। संदेश बंद होने की क्रिया को Switch off बिंदू कहते हैं। न्युमोटॅक्सिक केन्द्र से आनेवाले संदेश switch off बिंदु पर कार्य करते हैं। यह संदेश जितने strong होते हैं उतना ही यह बिंदु जल्दी आता है। अर्थात दो सेकेंड़ की जगह उससे कम समय श्वास (inspiration) शुरु रहता है। यह कालावधी बिल्कुल आधा सेकेंड़ तक नीचे आ सकता है। फलस्वरूप श्वसन का वेग बढ़ जाता है और प्रति मिनट १६ से १८ बार होनेवाला श्‍वासोच्छवास की बजाय प्रतिमिनिट ३० से ४० बार श्‍वासोच्छवास चलने लगता है। इसके विपरित जब ये संदेश कमजोर (weak) होते हैं तब श्वास की समय सीमा बढ़ जाती है। यह समय सीमा ५ सेकेंड़ तक बढ़ जाती है और श्वास की गति कम हो जाती है।(क्रमश:)