श्‍वसनसंस्था भाग – ३५

हमारी चेतासंस्था द्वारा श्‍वसन का नियंत्रण किस प्रकार होता है, हम इसका अध्ययन कर रहे हैं। श्‍वसन पर नियंत्रण रखनेवाले श्‍वसन केन्द्र तीन गुटों में विभाजित होते हैं, यह हमने देखा। पिछले लेख में हमने इनमें से दो गुटों के बारे में जानकारी प्राप्त की। आज हम तीसरे गुट के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगें।

वेंट्रल श्‍वसन गुट : इस गुट से आनेवाले संदेश ‘श्वास’ और उच्छवास दोनों पर नियंत्रण रखते हैं। परन्तु इस गुट के कार्यों और डॉरसल गुट के कार्यों में अनेक महत्त्वपूर्ण फरक होते हैं। ये फरक कौन से हैं, उनकी जानकारी अब हम प्राप्त करेंगें।

१) हमारी नॉर्मल श्वासोच्छवास के दौरान यह गुट कोई भी कार्य नहीं करता। ‘श्वास’ का नियंत्रण डॉरसल गुट करता है और उच्छवास फेफड़ों की इलॅस्टिक रिकॉइल के कारण पूरा होता है।

२) श्वास का नियंत्रण करनेवाले Ramp संदेश निर्माण करने में इस गुट का सहभाग होता है।

३) व्यायाम अथवा अन्य भाग-दौड़ के दौरान श्वासोच्छवास की गति बढ़ जाती है। इस परिस्थिती में इस गुट के संदेश श्‍वसन में मदत करते हैं।

४) इस गुट की कुछ चेतापेशी ‘श्वास’ के (inspiration) कार्य घटित करवाते हैं और कुछ चेतापेशी उच्छवास के कार्य घटित करवाते हैं।

उपरोक्त सभी श्‍वसन गुटों के अलावा मस्तिष्क में ‘अप्नूस्टिक’ (Apneustic) केन्द्र होते हैं। इन केन्द्रों से आनेवाले संदेश डॉरसल श्‍वसन गुट पर कार्य रहते हैं और switch off बिंदु को दूर तक देते हैं। फलस्वरूप श्वास अंदर लेने की क्रिया ज्यादा समय तक चलती है तथा फेफड़ों से हवा पूरी तरह भर जाते हैं। इस केन्द्र का क्या प्रयोजन है, यह अभी तक निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं। परन्तु न्युमोटॅक्सिक केन्द्र के साथ-साथ ये केन्द्र श्वास अंदर लेने की क्रिया की तीव्रता पर नियंत्रण रखता है।

श्‍वसन पर नियंत्रण रखनेवाले मस्तिष्क के केन्द्रों के अलावा अन्य कुछ चीजें भी इस नियंत्रण में सहभागी होती है। इनमें से एक महत्त्वपूर्ण घटक है फेफड़ों का ‘स्ट्रेच रिफलेक्स’ (stretch reflex) है। यदि उचित मात्रा से ज्यादा हवा फेफड़ों में घुस जाए तो यह रिफलेक्स कार्यरत होता है। जब हवा के कारण फेफड़ों में खिचाव होता है तो फेफड़ों के सेन्सरी चेतातंतू वेगस चेतारज्जू के माध्यम से मस्तिष्क को संदेश पहुँचाते हैं। यह संदेश डॉरसल श्‍वसन गुट में जाकर वहाँ पर Ramp संदेश switch-off करते हैं। इस प्रकार श्वास का अंदर जाना रूक जाता है। फलस्वरूप फेफड़ों में खिंचाव नहीं बढ़ता। इस तरह यह रिफलेक्स, फेफडो़ं को ज्यादा खिंचाव से होनेवाली बीमारियों से बचाता है। इसी लिए इसे शरीर का संरक्षक रिफलेक्स माना जाता है। नॉर्मल श्‍वसन में यह रिफलेक्स कोई कार्य नहीं करता।

अब तक हमनें श्‍वसन के नियंत्रण के बारे में मूलभूत जानकारी प्राप्त की। शरीर की आवश्यकता के अनुसार श्‍वसन का नियंत्रण कैसे होता है, अब हम इसका अध्ययन करेंगे। शरीर की गरज का क्या तात्पर्य है। इसका एक उदाहरण देखते हैं। जब कोई व्यक्ति व्यायाम कर रहा होता है तो शरीर में प्राणवायु की आवश्यकता बढ़ जाती है और कर्बद्विप्रणिल वायु भी ज्यादा मात्रा में तैयार होता है। दोनों भी लगभग २० गुना बढ़ जाते हैं। उसके लिए पूरक श्‍वसन की आवश्यकता होती है। क्या श्‍वसन में इसके अनुरूप बदलाव होता है? अब हम इसकी जानकारी प्राप्त करेंगें।
श्‍वसन में ये बदलाव रक्त और शरीर के अन्य द्रावों के रासायनिक घटकों के कारण होते हैं। इसीलिए इसे श्‍वसन का रासायनिक नियंत्रण भी कहते हैं।

श्‍वसन का रासायनिक नियंत्रण
शरीर के विभिन्न उती और रक्त के बीच में प्राणवायु, कर्बद्विप्रणिल वायु, हैड्रोजन के अणु को उचित मात्रा में रखना श्‍वसन का अंतिम ध्येय होता है। इनमें से किसी भी घटक में होनेवाले मामूली बदलाव को भी हमारा श्‍वसन तुरंत उचित प्रतिक्रिया देता है।

कर्बद्विप्रणिल वायु अथवा हैड्रोजन की रक्त में मात्रा बढ़ जाने पर उसका सीधा असर मस्तिष्क के श्‍वसन केन्द्र पर होता है और श्वास एवं उच्छवास दोनों की गति बढ़ जाती है।

प्राणवायु की मात्रा में होनेवाला बदलाव मस्तिष्क पर सीधा कार्य नहीं करता। शरीर की मुख्य धमनी और मस्तिष्क की कॅरोटिड रक्तवाहिनी में रासायनिक संदेशग्राहकों (chemoreceptors) के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से इनका कार्य चलता है। इन सब की सविस्तर जानकारी हम अगले लेख में देखेंगे।(क्रमश:)