श्‍वसनसंस्था – २५

प्राणवायु और कार्बन-डाय-ऑक्साईड वायु का डिफ्युजन, श्‍वसनसंस्था में किस प्रकार होता है, आज हम इसकी जानकारी प्राप्त करेंगे।

वायु का यह आदान-प्रदान फेफड़ों के जिस भाग में होता हैं उसे ‘श्‍वसन-पटल’ अथवा Respiratory Membrane कहते हैं। फेफड़ों का एक बड़ा हिस्सा इस श्‍वसन पटल से व्याप्त रहता है। श्‍वसन पटल सिर्फ अलविलोय का ही बना नहीं होता बल्कि इसमें अन्य अनेक घटक भी शामिल होते हैं। ये सभी घटक मिलकर श्‍वसन का कार्य करते हैं। उन सबको मिलाकर Respiratory unit अथवा ‘श्‍वसनसंच’ भी कहते हैं।

श्‍वसनसंच की आकृति – रेस्पिरेटरी ब्रोंकिओल, अलविलोर डक्ट, एट्रिअम और अलविओलय ऐसे चार घटकों से मिलकर श्‍वसन संच बनता है। इनमें से प्रत्येक घटक वायु का आदान-प्रदान करता है। इनमें से अलविओलस् सबसे छोटे होते हैं। एक अलविओलाय का व्यास साधारणत: ०.२ मायक्रोमीटर होता है। इनकी दीवार अत्यंत पतली होती हैं और इन दीवारों में फेफड़ों की केशवाहनियों के अत्यंत घने जाले होते हैं। पतली दीवार और केशवाहनियों के घने जाल के फलस्वरूप वायु का आदान-प्रदान तेज गति से होता है और सुलभता से होता है।

श्‍वसन पटल में केशवाहिनियों का भी समावेश होता है। श्‍वसन संच के प्रत्येक घटक की दीवार तथा वहाँ की केशवाहनियों की दीवार मिलाकर श्‍वसन पटल बनता है। सभी स्थानों के श्‍वसन पटल में छ: स्तर होते हैं। इसके एक सिरे का स्तर अलविओलाय के द्राव का होता है तथा दूसरे सिरे का स्तर होता है, केशवाहनियों की एन्डोथेलिअल मेंब्रेन। छ: स्तरों के बावजूद भी यह पटल अत्यंत पतला होता है। इसकी मोटाई साधारणत: ०.६ मायक्रोमीटर होती है। कुछ स्थानों पर इसकी मोटाई सिर्फ ०.२ मायक्रोमीटर होती है। फेफड़ों का प्राणवायु इस पटल के माध्यम से सीधे लाल रक्त पेशियों में प्रवेश करता है तथा कार्बन-डाय-ऑक्साईड लाल रक्त पेशियों में से अलविओलाय में प्रवेश करता है। फेफड़ों की केशवाहिनियों का व्यास साधारणत: ५ मायक्रोमीटर होता है। लाल रक्तपेशियां साधारणत: ६ मायक्रोमीटर होती है। अत: वहाँ रक्तवाहिनी से प्रवास करते समय इन लाल पेशियों को अपना आकार थोड़ा सिकोड़ना पड़ता है तथा लाल पेशियों का आवरण केशवाहिनियों की दोनों ओर की दीवारों के संपर्क में हमेशा रहता है। इसके फलस्वरूप वायु का आदान-प्रदान सुलभ होता है।

प्रत्येक प्रौढ व्यक्ति में श्‍वसनपटल का क्षेत्रफल साधारणत: ७० sq. meters होता है। यदि पूरे श्‍वसन पटल को फैलाया जाए तो लगभग २५ फुट X ३० फुट आकार की जगह घेरेगा। यानी उपरोक्त आकार के किसी हॉल की संपूर्ण floor area ढ़क जायेगी। इतने बड़े आकार की तुलना में उपलब्ध रक्त की मात्रा काफी कम होती है। फेफड़ों की केशवाहिनियों में साधारणत: ६० से १४० मिली ही रक्त रहता है। कल्पना करो कि उपरोक्त आकार के हॉल की फर्श पर यदि ६० से १४० मिली पानी फैलाया जाए तो उसकी कितनी पतली पर्त तैयार होगी? रक्त की ऐसी ही पतली पर्त श्‍वसनपटल के चारों ओर होती है। वायु के आदान-प्रदान के लिये यह लाभदायक साबित होती है। केशवाहिनियों की दीवारों का लाल रक्त पेशियों के प्रत्यक्ष संपर्क में आने के फलस्वरूप वायु का आदान-प्रदान सीधे-सीधे हो जाता है। उन्हें शॉर्टकट मिल जाता है क्योंकि रक्त के प्लाझमा में से होनेवाला उनका प्रवास टल जाता है।(क्रमश:)