श्‍वसनसंस्था – २४

हमारे फेफड़ों की हवा एवं फेफड़ों के रक्त के बीच वायु का आदान-प्रदान किन दो बातों पर निर्भर करता है, इसकी जानकारी हमने प्राप्त की। इसी संदर्भ में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण बातों की जानकारी आज हम प्राप्त करेंगे।

वातावरण और अलविओलाय दोनों में हवा होती है। परन्तु इस हवा में फर्क होता है। वातावरण की हवा में मुख्यत: नायट्रोजन (नत्रवायु) और ऑक्सिजन (प्राणवायु) होती है। समुद्री सतह पर हवा का दबाव ७६० mm of Hg होता है। इसमें से ६०० mm of Hg नत्रवायु के कारण और १६० mm of Hg प्राणवायु के कारण होता है। जब वातावरण की हवा श्वसनमार्ग में प्रवेश करती हैं तो वहाँ पर मौजूद पानी की भाप (बाष्प) इस हवा में मिल जाती है। इसे Humidification कहते हैं। पिछले लेख में हमने देखा कि अलविओलाय में भाप का दबाव (नॉर्मल स्थिती में) ४७ mm of Hg होता है। हवा का दबाव अलविओलाय में भी ७६० mm of Hg होता है। अलविओलाय की हवा में भाप का दबाव ४७ mm of Hg जुड़ने के बाद भी वहाँ की हवा का दबाव कुल ७६० mm of Hg ही रहता है। तात्पर्य यह है कि नत्रवायु और प्राणवायु का दबाव कम हो जाता है। अर्थात अलविओलय में आने के बाद हवा डायलूट होती है। (प्राणवायु, नत्रवायु की मात्रा कम हो जाती है)।

वातावरण की हवा और अलविओलाय की हवा में जो फर्क होता है, वह निम्नलिखित चार घटकों पर निर्भर करता है।

१) प्रत्येक श्वास के साथ अलविओलार हवा और वातावरण की हवा में अल्प मात्रा में आदान-प्रदान होता है। नॉर्मल उच्छवास के बाद फेफड़ों में साधारणत: २३०० मिली हवा शेष रह जाती है। इसे फंक्शन रेसिड्युअल कपॅसिटी कहते हैं। प्रत्येक श्वास के साथ हम जैसे-तैसे ३५० मिली हवा अंदर लेते हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक श्वास के साथ जैसे-तैसे एक सप्तमांश हवा का आदान-प्रदान होता है। यानी अलविओलाय की हवा का पूर्णत: आदान-प्रदान होता है। सारांश यह है कि अलविओलाय की हवा की संपूर्ण अदला-बदली के लिये हमें सात बार श्वास लेना आवश्यक है। परन्तु वास्तव में कुछ अलग ही होता है। वास्तविक अदला-बदली इससे भी मंद गति से होती है। नॉर्मल प्रौढ़ व्यक्ति सर्वसाधारणत: एक मिनट में सोलह बार श्वासोच्छवास करता है। वास्तव में एक मिनट के अंत में अलविओलाय की संपूर्ण हवा की अदला-बदली नहीं होती है।

नॉर्मल श्वसन के दौरान साधारणत: १७ सेकेंड़ों में अलविओलाय की ५० प्रतिशत हवा की अदला-बदली होती है। श्वसन की रेट प्रति मिनट १६ होती है परन्तु यदि यह प्रति मिनट आठ हो जाये (विविध विकारों में ऐसा हो सकता है) तो अलविओलाय में ५० प्रतिशत हवा की अदला-बदली में दो गुना समय (३४ सेकेंड़) लग जाता है। श्वसन के विकारों में यदि श्वसन का वेग बढ़कर दो गुना हो जाये तो यहाँ की हवा की अदला-बदली का वेग भी बढ़ जाता है। ५० प्रतिशत हवा की अदला-बदली मात्र ८ सेकेंड़ हो जाती है।

अलविओलाय की हवा की अदला-बदली उचित मंदगति से होना शारीरिक कार्यों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। इसके कारण रक्त तथा पेशियों में विविध प्रकार की वायुओं की मात्रा में अचानक बदलाव नहीं होता। पेशियों की प्राणवायु, कार्बनडाय ऑक्साइड वायु की अचानक वृद्धि अथवा कमी नहीं होती है। श्वसन के नियंत्रण के लिए यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। हमारे मस्तिष्क में श्वसन पर नियंत्रण रखनेवाले केन्द्र होते हैं। उनके कार्य रक्त की प्राणवायु, कार्बनडाय ऑक्साइड वायु और PH पर अवलंबित होता है। इन घटकों की मात्रा में अचानक बदलाव होने पर इन केन्द्रों के कार्य बिगड़ जाते हैं तथा इसके फलस्वरूप श्वसन के कार्य बिगड़ जाने से जान का खतरा हो सकता है।

२) अलविओलर हवा की प्राणवायु का लगातार फेफड़ों के रक्त में शोषण (absorption) होता रहता है। फलस्वरुप अलविलोअर हवा में प्राणवायु की मात्रा हवा में होनेवाले प्राणवायु की मात्रा से कम होती है।

प्राणवायु की तीव्रता से रक्त में absorb हो जाने पर अलविलोअर हवा में उसकी मात्रा कम हो जाती है। श्वसन के माध्यम से अधिक मात्रा में प्राणवायु को आ जाने पर अलविओलर हवा में प्राणवायु की मात्रा बढ़ जाती है।

अलविओलर में प्राणवायु का partial pressure १०४ mm of Hg होता है। नॉर्मल श्वास के साथ साधारणत: हम २५० मिलीलीटर प्राणवायु प्रतिमिनट रक्त में लेते हैं। व्यायाम के दौरान यह मात्रा बढ़कर १००० मिली. हो जाती है। यदि प्राणवायु के absorption की मात्रा बढ़ जाये तो भी PO2 १०४ mm of Hg ही रखने के लिए श्वसन की रेट बढ़ जाती है। इसी लिए व्यायाम के दौरान हमारे श्वसन की गति तेज हो जाती है।(क्रमश:)