श्‍वसनसंस्था – २४

हम अपने फेफड़ों की हवा और वातावरण की हवा में होने वाले फर्क की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। पिछले लेख में हमने दोनों में रहने वाले अंतर की जानकारी प्राप्त की। आज हम अन्य बातों की जानकारी लेंगे।

३) कर्बद्विप्राणिलवायु की मात्रा :
वातावरण की हवा में इस वायु की मात्रा की तुलना में अलविलोलार की हवा में इसकी मात्रा ज्यादा होती है। हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका अपने कार्यों के दौरान कर्बद्विप्राणिल वायु तैयार करती हैं। यह वायु रक्त में घुल जाती है। फेफड़ों के रक्त में से यह वायु लगातार अलविओलाय में प्रवेश करती रहती है। फलस्वरूप अलविओलाय में इसकी मात्रा ज्यादा होती है। यहाँ पर इस वायु का वैयक्तिक दाब (PCO2) ४० mm of Hg के लगभग होता है। रक्त की कार्बनडाय ऑक्साइड जितनी मात्रा में अलविओलाय में छोड़ी जाती है, उतनी मात्रा में अलविओलार (PCO2) बढ़ती है।

अलविओलाय में से अंदर-बाहर होनेवाली (ventillation) हवा की मात्रा के अनुसार फेफड़ों में कार्बनडाय ऑक्साइड कम-ज्यादा होती है। अलविओलार वेंटिलेशन जितना ज्यादा, कार्बनडाय ऑक्साइड की मात्रा उतनी ही कम होती है। इसका सीधा-सादा मतलब है कि हम श्वास के द्वारा जितनी ज्यादा हवा अंदर लेंगे उतनी ही ज्यादा मात्रा में कार्बनडाय ऑक्साइड बाहर निकाली जायेगी। गहरी साँस (deepa breathing) लेने की क्रिया में ज्यादा हवा अंदर ली जाती है तथा ज्यादा मात्रा में कार्बनडाय ऑक्साइड उत्सर्जित होती हैं। जिससे शरीर और फेफड़े शुद्ध होते हैं। प्राणवायु की मात्र बढ़ती है तथा कार्बनडाय ऑक्साइड की मात्रा कम होती है। प्राणायाम का अथवा ॐकार का महत्त्व इसमें सन्निहित है।

वातावरण की हवा और फेफड़ों की हवा में एक महत्त्वपूर्ण अंतर हैं हवा की आर्द्रता। वातावरण की हवा ऋतुओं के अनुसार, भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। परन्तु फेफड़ों की हवा हरदम आर्द्र ही होती है। हवा किस प्रकार होती है, इसकी जानकारी हमने पिछले लेख में प्राप्त की है।

उत्सर्जित हवा :
उच्छवास के द्वारा जो हवा हम बाहर निकालते हैं उसे उत्सर्जित हवा कहा जाता है। उत्सर्जित हवा, डेड स्पेस की हवा और अलविओलाय की हवा का मिश्रण होती हैं। श्वसन-संस्था का जो भाग, वायु के आदान-प्रदान में भाग नहीं लेता, उस भाग को डेड स्पेस कहते हैं। इस डेड-स्पेस की हवा को डेडे स्पेश की हवा कहते हैं। उच्छश्वास के दरम्यान उत्सर्जित की जानेवाली हवा तीन स्तरों पर बाहर निकलती हैं। उच्छवास की शुरुआत में सिर्फ डेड स्पेस की हवा बाहर निकलती है, बीच में मिश्रित हवा होती है। इसमें डेड स्पेस हवा के साथ अलविलोलाय की हवा भी मिश्रित होती है। तीसरे और अंतिम स्तर में सिर्फ अलविओलाय की हवा ही बाहर निकलती है। इस जानकारी का उपयोग फेफड़ों की हवा की जाँच करने में होता हैं। यदि किसी व्यक्ति के अलविओलाय की हवा जाँच करनी होती है तो उस व्यक्ति से गहरी साँस लेकर पूरी ताकत के साथ साँस छोड़ने को कहा जाता है। उसके उच्छवास के अंतिम स्तर की हवा को जाँच के लिये लिया जाता है।

आज तक हमने श्वसन संस्था की रचना देखी। श्वसनमार्ग से होनेवाले हवा के प्रवास का अध्ययन किया। अब हम हवा के प्रवास के अंतिम स्तर का अध्ययन करेंगें। इस अंतिम स्तर में वायु का प्रत्यक्ष आदान-प्रदान होता है। हमारे श्वसन का मुख्य ध्येय साध्य होता है। फेफड़ों में मौजूद हवा की प्राणवायु लाल रक्त पेशियाँ ले लेती हैं और इन पेशियों में उपस्थित कार्बनडाय ऑक्साइड अलविलोय में चली जाती है। यह किस तरह संभव होता है? कौन सी बातें इस अंतिम स्तर पर महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं, अब हम इसकी जानकारी प्राप्त करेंगें।

साथ-साथ अंतिम स्तर पर कार्य में किन-किन कारणों से बाधायें आती हैं, हम यह भी देखेंगें। परन्तु यह सब अगले लेख में।(क्रमश:)