डॉ. अरुण निगवेकर

वैज्ञानिक की छबी हमारे मन में प्राय: एकान्त में रहकर संशोधन कार्य करने वाले ज्ञानी के रूप में उभरती है, लेकिन आज के दौर के संशोधक-वैज्ञानिक एकाकीपन को छोड़कर समाज में मिलजुलकर विज्ञान के प्रचार-प्रसार का काम करते हुए नज़र आते हैं। पुराने समय के वैज्ञानिक अपने स्वयं के संशोधन में ही पूर्ण रूप से खोए रहते थे। परन्तु आज अनेक शास्त्रज्ञ अपने स्वयं के कार्य को अबाधित रखते हुए समाज में विज्ञान के प्रचार-प्रसार का कार्य करते हुए दिखाई देते हैं और यही कारण है कि समाज से अंधश्रद्धा दूर होकर, एक प्रकार का शास्त्रीय दृष्टिकोन बढ़ता हुआ नज़र आता है। इसी लिए आज के इस आधुनिक काल के संशोधकों का कार्य अधिक महत्वपूर्ण एवं मौलिक संशोधन माना जाता है, साथ ही उनके द्वारा किया जानेवाला विज्ञान का प्रचार-प्रसार का कार्य यह पहले के समान ही नहीं, बल्कि उससे भी कहीं अधिक सरस एवं सरल साबित होकर इससे ही देश को सही मायने में सामर्थ्यवान बनने में मदद मिलेगी।

पुणे विश्वविद्यालय के प्रधानाचार्य के रूप में अपने कार्य का ध्यान रखने के साथ-साथ महाविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्षपद का कार्य-भार संभालने वाले डॉ. अरुण निगवेकर का विशेष स्थान आज के समाज में भी कायम है। पुणे विश्वविद्यालय में आरंभ से ही प्रधानाचार्य पद पर अत्यंत विद्वान एवं विख्यात राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय लौकिकता प्राप्त मान्यवर लोग विराजमान हैं। डॉ. निगवेकर का कार्यकाल पुणे में समाप्त होने से पहले ही विश्वविद्यालय अनुदान (U.G.C.) अर्थात् ‘यूनिव्हर्सिटी ग्रॅंटस्‌ कमिशन’ नामक राष्ट्रीय स्तरीय संस्था में उपाध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। उसी दौरान अनुदान मंडल के अध्यक्ष प्रा. हरी गौतम का कार्यकाल समाप्त होते ही डॉ.अरुण निगवेकर की नियुक्ति हो गई। कोल्हापुर एवं पुणे इन दोनों शहरों में उनका कार्यक्षेत्र निश्चित हो गया।

पदार्थविज्ञान शास्त्र के विद्यार्थी होने वाले डॉ.निगवेकर ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कोल्हापुर के राजाराम महाविद्यालय से पूर्ण की। इसके अलावा उनके शैक्षणिक कार्यकारीता का अधिकतर समय पुणे विश्वविद्यालय में अध्यापन करने में ही बीता है। पदार्थविज्ञान विभाग में पदार्थविज्ञान विषय ही सिखाने के लिए वे प्रोफे़सर के रूप में नियुक्त हुए थे। डॉ. निगवेकर आगे चलकर प्रपाठक, रिडर, विभागप्रमुख आदि की जिम्मेदारियॉ संभालते हुए पदार्थविज्ञान विभाग को प्रसिद्धि दिलाने वाले साबित हुए। पुणे विश्वविद्यालय में होने वाले विज्ञान संम्मेलन, सायन्स काँग्रेस आदि के वे समन्वयक थे। अपने सहकर्मियों के साथ उन्होंने अनेक प्रकार के उपक्रम एवं शैक्षणिक कार्यक्रम, विविध प्रकार के अभ्याक्रम पुणे विश्वविद्यालय में शुरु करके इस विश्वविद्यालय को उच्च स्तर तक पहुंचाने के लिए काफी़ मेहनत की है।

पुणे विश्वविद्यालय का सुवर्ण महोत्सव डॉ. निगवेकर के कार्यकाल में बड़े ही शानदार तरीके से मनाया गया। उस समय इंडियन सायंस कॉंग्रेस का अधिवेशन भी वहीं पर चल रहा था। इसी निमित्त से एक विज्ञान प्रदर्शन का आयोजन भी वहीं पर किया गया था। इस विज्ञान प्रदर्शन का लाभ उठाने हेतु राज्य के साथ ही देशभर के विद्यार्थी, पालक, शिक्षक, एवं विज्ञान के अभ्यासकों आदि की भीड़ वहाँ पर सप्ताह भर मची रही। हड्डियों के प्राध्यापक एवं संशोधक, पदार्थविज्ञान के अभ्यासक एवं सभी भाषाओं पर अपना प्रभुत्व जमाये रखने वाले इन सभी के अनुभवों के आधार पर साथ ही विज्ञान पर निष्ठा होने के कारण डॉ. निगवेकर ने स्वयं के देख-रेख में इस प्रदर्शनी को का़फी यशस्वी बना दिया था। पुणे विश्वविद्यालय के इतिहास एवं कार्य का लेखा-जोखा रखने वाली एक बहुत ही सुंदर सूचनापत्रिका शैक्षणिक माध्यम संशोधन केन्द्र की ओर से तैयार की गई थी।

एक संशोधक प्रशासक होने के साथ-साथ शिक्षाक्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य के अधिकारी होने वाले डॉ. निगवेकर ने नयी दिल्ली के नेशनल फिजिकल लॅबोरेटरी में भी काम किया है। इंग्लैंड के यॉर्क महाविद्यालय, कनाडा के वेस्टर्न ओंटेरिओ महाविद्यालय में साथ ही स्वीडन के उपसाला महाविद्यालय में उन्होंने काम किया है। संयुक्त राष्ट्रसंध के शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संघटना के सदस्य के रूप में भी डॉ. निगवेकर कार्यरत थे। पुणे विश्वविद्यालय में उप-कुलगुरु पद का स्वीकार करने से पहले दो-तीन वर्ष वे बंगलुरु के ‘नॅक‘ अर्थात ‘नेशनल असेसमेंट काऊंसिल’ संस्था के प्रमुख संचालक थे। नॅक नामक यह संस्था ही विविध महाविद्यालयों का शैक्षणिक, प्रशासनिक स्तर निश्चित करती है। नॅक के संचालकों की ज़िम्मेदारी भी स्वाभाविक है कि महाविद्यालय के प्रधानाध्यापक के पदानुसार ही होती है।

इन सभी बातों के साथ ही अनेक वैज्ञानिक निबंध, प्रबंध, पीएचडी के विद्यार्थीयों को मार्गदर्शन करना, महाविद्यालयों के ही अहाते में होने वाले ‘सायन्स अंड़ टेक्नॉलॉजी पार्क’ नामक इस संशोधन केंद्र में नित्यप्रति आना इस प्रकार के अनगिनत काम वे निरंतर कर रहे हैं।

वैज्ञानिक एवं शिक्षाविशेषज्ञ इन दोनों ही भूमिकाओं को निभाते हुए डॉ. अरुण निगवेकर द्वारा लोगों में की गई यह जागृति काफ़ी महत्त्वपूर्ण साबित होती है।

डॉ. सी. ड़ी देशमुख के पश्चात् अनेक वर्षों के बाद अध्यक्ष के पद पर चुने गए शिक्षाशास्त्री के रुप में उन्हें गौरववान्वित किया जाना ही अपने- आप में एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।