परमहंस- ११

परमहंस- ११

गदाधर का अध्यात्म की ओर, गूढता की ओर रूझान बढ़ता ही चला जा रहा था और वह अधिक से अधिक अंतर्मुख होने लगा था। उसका दिन का अधिकांश समय घर में ही या फिर गाँव के उसे प्रिय रहनेवाले स्थानों में व्यतीत होने लगा था। जब घर में रहता था, तब माँ का घर के […]

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परमहंस- १०

परमहंस- १०

सात साल की उम्र में ही माथे पर से पिताजी का साया उठ चुके गदाधर का शरारतीपन थमकर वह अधिक ही अंतर्मुख हुआ था। उसे अब टकटकी भी बहुत बार लगने लगी थी और ऐसी टकटकी लगने के लिए – भगवान की कोई सुन्दर मूर्ति, यहाँ तक कि आसमान के बादल, पर्वत, बारिश, हरेभरे खेत, […]

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परमहंस- ९

परमहंस- ९

नन्हें गदाधर को कल हुआ क्या था, इसका अंदेशा किसी को भी, यहाँ तक कि गाँव के वैद्य को भी नहीं हो रहा था। अहम बात यह थी कि वह स्वयं जो कल की हक़ीक़त बयान कर रहा था, उसपर भी विश्‍वास रखने के लिए कोई तैयार नहीं था। ‘काले घने बादलों की पृष्ठभूमि पर […]

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परमहंस- ८

परमहंस- ८

गदाधर अब छः साल का हो चुका था और अपनी बाललीलाओं द्वारा पूरे गाँव को आनन्द प्रदान कर रहा था। हालाँकि उसकी बाललीलाओं ने सबके मन को भा लिया था, मग़र फिर भी यह बालक सबको अभी भी अन्य आम बालकों की तरह ही प्रतीत हो रहा था, उसमें रहनेवाले दिव्यत्व का किसी को भी […]

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परमहंस-७

परमहंस-७

देखते देखते गदाधर पाँच साल का हो गया। उसकी बाललीलाओं में ये पाँच साल कैसे बीत गये, पता भी नहीं चला था। स्वाभाविक रूप से ही शरारती स्वभाव का रहने के कारण, दूसरों के साथ शरारत करना उसे पसन्द आता था; लेकिन ये शरारतें इतनी मासूम रहती थीं कि उसके कारण सामनेवाला कभी भी ग़ुस्सा […]

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परमहंस- ६

परमहंस- ६

जिसका जन्म हो जाते ही जिसके बारे में ईश्वरीय लीलाएँ देखने को मिली थीं, वह ‘वह’ बालक – गदाधर – प्रतिदिन अपने मातापिता का आनंद दुगुना कर रहा था। केवल मातापिता को ही नहीं, बल्कि उसके दीदार करनेवाले हर एक को ही, आनंद का ही अनुभव हो जाता था, जैसे नन्हें कन्हैया को देखनेवाले गोपगोपिकाओं […]

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परमहंस- ५

परमहंस- ५

बुधवार १७ फ़रवरी १८३६ के ब्राह्ममुहुर्त पर, फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को खुदिरामजी तथा चंद्रमणीदेवी चट्टोपाध्याय के घर ‘उस’ तेजस्वी बालक का जन्म हुआ था। उन दोनों जितना ही दाई धनी लुहारन को भी आनंद हुआ था। लेकिन ज़्यादा न सोचते हुए उसने उस बालक को ठीक से साफ़सुथरा कर उसकी माँ की बगल में रखा […]

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परमहंस- ४

परमहंस- ४

खुदिराम एवं चंद्रमणीदेवी को हुए उन दिव्य दृष्टांतों के बाद वे दोनों भी आगे घटित होनेवाली ‘उस’ दिव्य घटना की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगे। उससे पहले के – रामकुमार, रामेश्वर एवं कात्यायनी इन तीन सन्तानों के बाद अब इस ईश्वरीय सन्तान का आगमन होनेवाला था। इस प्रतीक्षा के दौर में, आम तौर पर ‘शुभशकुन’ […]

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परमहंस-३

परमहंस-३

कामारपुकूर में धीरे धीरे खुदिरामजी का जीवन सुचारु रूप से जम रहा था। वैसे तो वे पहले से ही धार्मिक वृत्ति के होने के कारण, जैसा हो सके वैसी तीर्थस्थलों की यात्राएँ भी करते थे। यहाँ कामारपुकूर में थोड़ाबहुत जीवन दस्तूरी हो जाने के बाद खुदिराम ने रामेश्वर की यात्रा की थी। उसके कुछ समय […]

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परमहंस-२

परमहंस-२

दौर लगभग उन्नीसवीं सदी के पूर्वाध का…. स्थल कामारपुकूर….कोलकाता की वायव्य दिशा में लगभग साठ किलोमीटर की दूरी पर, शहर की भीड़ का संसर्ग न रहनेवाला, हुगळी ज़िले में बसा एक छोटासा गाँव….छोटा यानी इतना छोटा कि मानो गाँव के एक कोने में कोई फुसफुसाया, तो गाँव के दूसरे कोने में सुनायी दें! चावल की […]

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