नेताजी-१६१

जर्मनी द्वारा कैद किये गये भारतीय युद्धबन्दियों के मन्तव्य को जानने के लिए डॉ. धवन तथा डॉ. मेल्चर्स को नियुक्त किया गया था। पहले दल के साथ बातचीत करते हुए डॉ. धवन के ध्यान में यह बात आ गयी कि उनमें प्रमुख रूप से जाट, सिख और पठानों का समावेश था। उनके साथ क़रीबी सम्बन्ध स्थापित करने की दृष्टि से उनकी मातृभाषा में बातचीत करना आवश्यक था। डॉ. धवन पंजाबी मूल के रहने के कारण पंजाबी भाषा की समस्या तो हल हो चुकी थी, लेकिन पठानों की पुश्तू भाषा की समस्या तो अब भी अनसुलझी ही थी। उसे डॉ. मेल्चर्स ने हल किया। गुलामअली सिद्दीकी नाम के एक अ़फगान गृहस्थ, अ़फगानिस्तान के भूतपूर्व बादशाह अमानुल्लाखान के कार्यकाल में विदेशमन्त्री थे। अ़फगानिस्तान को आधुनिक जग से अमानुल्लाखान ने ही परिचित कराया था। उन्होंने तो ब्रिटन के साथ युद्ध ही घोषित कर दिया था। इस वजह से आगे चलकर अ़फगानिस्तान में बग़ावत होकर अमानुल्लाखान को देशत्याग करके रोम में राजाश्रय लेना पड़ा था; वहीं, सिद्दीकी बर्लिन में रह रहे थे। डॉ. मेल्चर्स की उनके साथ अच्छी-ख़ासी जानपहचान थी। गत युरोप वास्तव्य में बर्लिन आये सुभाषबाबू के साथ उनकी मुलाक़ात भी हुई थी। सुभाषबाबू के प्रति सिद्दिकी के मन में आत्मीयता थी। अत एव इस मामले में उनकी तथा उनके भतीजे हक़ीमखान की डॉ. धवन को का़फी मदद हुई।

उस वक़्त युद्ध के सभी मोरचों पर जर्मनी की जीत हो रही दिखायी दे रही थी। सभी जगह ब्रिटन एवं दोस्तराष्ट्रों की सेनाएँ जर्मन सेना के सामने घुटनें टेक रही थी। इसी वजह से आगे चलकर इसी तरह के दो हज़ार से भी अधिक युद्ध़कैदियों को धीरे धीरे जर्मनी लाया गया। उन्हें बर्लिन के दक्षिण में स्थित अ‍ॅनाबर्ग की छावनी में रखा गया था। जैसे जैसे भारतीय युद्ध़कैदियों की बढ़ती संख्या के बारे में जानकारी मिल रही थी, वैसे वैसे सुभाषबाबू के हौसलें बुलन्द होते जा रहे थे। मग़र ङ्गिर भी तक़नीकी दृष्टि से वे सभी युद्ध़कैदी जर्मनी एवं इटली के संयुक्त युद्धबन्दी रहने के कारण उनसे मिलने के लिए हर बार इटली के सेना-अधिकारियों से भी इजाज़त लेना ज़रूरी था। हर बार यह करते रहने की अपेक्षा सुभाषबाबू खुद रोम जाकर इटालियन सेना-उच्चाधिकारियों से बातचीत करके इस मामले में उनकी सदा के लिए इजाज़त प्राप्त करें, यह सुझाव सुभाषबाबू के जर्मन मित्रों ने दिया। इस सूचना के बारे में सुभाषबाबू सोचविचार कर ही रहे थे कि कर्मधर्मसंयोग से इटालियन विदेश मन्त्रालय से उन्हें ठेंठ बुलावा भी आ गया। अब समस्या का जड़ से समाधान होना निश्चित था।

सुभाषबाबू ने रोम जाने की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन रोम जाने से पहले पॅरिस जाने की बात उन्होंने तय की। वहाँ पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के साथ उन्हें विचारविमर्श करना था और वे व्यक्ति थे – ए. सी. एन. नंबियार। जल्द ही स्थापित होनेवाले ‘आज़ाद हिन्द रेडिओ केन्द्र’ के द्वारा भारतीय भूमिका का प्रचार एवं प्रसार करने के लिए नंबियार जैसी युरोपीय राजनीति में जानकार रहनेवाली हस्ती का़फी उपयोगी साबित हो सकती थी।

नंबियार भूतपूर्व क्रान्तिकारियों में से एक थे और सन १९३२-३३ तक बर्लिन में ही बसे थे। पहले विश्‍वयुद्ध के दौरान उन्होंने विश्‍वयुद्ध के परिपेक्ष्य में भारत की भूमिका को प्रसारमाध्यमों में प्रस्तुत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। पिछली द़फ़ा जब सुभाषबाबू युरोप दौरे पर आये थे, तब बर्लिन में ही उनकी मुलाक़ात नंबियारजी से हुई थी। उस समय दोनों के विचार का़फी मिलते-जुलते साबित हुए थे और उनका नाम सुभाषबाबू की याददाश में दृढ़तापूर्वक बैठ गया था। लेकिन आगे चलकर इन क्रान्तिकारियों में एकता नहीं रही और वे तीन गुटों में विभाजित हो गये। उनमें से एक गुट स्वातन्त्र्यवीर सावरकरजी के ‘अभिनव भारत’ संगठन से सम्बन्धित था। दूसरा गुट जर्मनी की सोशालिस्ट पार्टी से जुड़ा था। वहीं, तीसरे गुट में पढ़ने के लिए बर्लिन विद्यापीठ आये छात्रों का वर्चस्व था और नंबियारजी इसे गुट के प्रमुख सूत्रधार थे। जवाहरलालजी की सूचना के अनुसार पहले विश्‍वयुद्ध के दौरान और उसके बाद भी वे बर्लिन में ‘भारत परिचय केन्द्र’ संचालित कर रहे थे। भारत के घटनाक्रमों से सम्बन्धित लेख प्रसारमाध्यमों में लिखना, वहाँ पढ़ने आनेवाले भारतीय छात्रों की हर तरह से मदद करना, पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें वहीं के उद्योगव्यवसायों में नौकरी दिलवाना ये काम यह केन्द्र कर रहा था।

आगे चलकर नाझी हु़कूमत के हाथ में सत्ता की डोर आते ही उनके पीछे गेस्टापो की परेशानी बढ़ गयी और इसीलिए नंबियारजी प्राग गये। आगे चलकर नाझी सेना झेकोस्लोव्हाकिया का निवाला लेने ही वाली है, यह सा़फ़ सा़फ दिखायी देते ही वे प्राग छोड़कर पॅरिस रवाना हो गये। लेकिन हिटलर ने फ्रान्स को धूल चटाने के बाद उन्हें पॅरिस छोड़कर दक्षिणी ङ्ग्रान्स के एक छोटेसे गाँव में स्थलान्तरित होना पड़ा। सुभाषबाबू ने पॅरिस आते हुए एक मध्यस्थ के ज़रिये उन्हें वहाँ बुला लिया। सुभाषबाबू के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करने का मौक़ा मिल रहा है, यह सोचकर वे फ़ूले नहीं समाये और उन्होंने फौरन सुभाषबाबू को ‘हाँ’ कह दी। सुभाषबाबू के प्रस्तावित कार्य में नंबियारजी जैसे सहकर्मी का शरीक़ होना यह सुभाषबाबू के युरोपवास्तव्य की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धी थी।

पॅरिस में एक अन्य व्यक्ति के साथ सुभाषबाबू की इत्त़िफाक़ से पहचान हो गयी। उस व्यक्ति का नाम था, इक्बाल सिदेई। इक्बाल सिदेई रोम का रहनेवाला है और वहाँ की सरकार के आशीर्वाद से एवं आर्थिक सहायता के बलबूते पर वह ‘हिमालया’ यह रेडिओ केन्द्र संचालित कर रहा है, यह सुनते ही सुभाषबाबू की दिलचस्पी और भी बढ़ गयी। अधिक जानकारी से यह ज्ञात हुआ कि वह मूलतः ग़दर पार्टी का कार्यकर्ता था और पहले विश्‍वयुद्ध के दौरान ग़िऱफ़्तारी से बचने के लिए वह भारत से अ़फगानिस्तान चला गया और उसके बाद तुर्कस्तान। उसके बाद कुछ समय तक वह पॅरिस में रहा और उसने एक फ्रान्सिसी औरत के साथ शादी भी कर ली। सन १९३८ में ब्रिटन ने फ्रान्स पर दबाव डालकर सिदेई को फ्रान्स से तड़ीपार करने के लिए मज़बूर कर दिया था। उसके बाद कभी रशिया में, तो कभी रोम में इस तरह उसका ठिकाना एक जगह नहीं रहता था। द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान, उसने मुसोलिनी के दामाद – इटली के विदेशमन्त्री काऊंट सियानो के साथ मित्रता बढ़ाकर सरकार में अपना अच्छा-ख़ासा प्रभाव जमा लिया था।

पहली ही मुलाक़ात में देशभक्ति से ओतप्रोत रहनेवाली उसकी वाणी से सुभाषबाबू का़फ़ी प्रभावित हुए थे। मेरी तरह मनोभूमिका रहनेवाला यह गृहस्थ प्रसारप्रचार के काम में का़फी उपयोगी साबित होगा, यह सोचकर सुभाषबाबू खुश हो गये।