परमहंस-१३१

परमहंस-१३१

कोलकाता के श्यामापुकुर स्ट्रीट स्थित मक़ान में रामकृष्णजी निवास के लिए आये थे। नीचली मंज़िल पर एक बड़ा दीवानखाना और एक मध्यम आकार का कमरा और ऊपरि मंज़िल पर दो एकदम छोटे कमरें, ऐसा इस जगह का स्वरूप था। नीचली मंज़िल पर के उस मध्यम आकार के कमरे को रामकृष्णजी निवासस्थान के रूप में इस्तेमाल […]

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परमहंस-१३०

परमहंस-१३०

रामकृष्णजी के उस स्त्रीभक्त द्वारा दिये गए आमंत्रण के अनुसार, उनके कुछ शिष्यगण उसके पास जब भोजन के लिए गये थे, तब ‘वह’ सँदेसा आया था – ‘रामकृष्णजी के गले से से रक्तस्राव शुरू हुआ होने के कारण वे वहाँ नहीं आ सकते।’ उपस्थितों के दिल की मानो धडकन ही रुक गयी और भोजन को […]

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परमहंस-१२९

परमहंस-१२९

पानिहाटी से आये हुए अब एक महीना बीत चुका था, लेकिन रामकृष्णजी के गले की बीमारी कम होने का नाम ही नहीं ले रही ती; उलटी दिनबदिन उनकी परेशानी बढ़ती ही चली जा रही थी। अब तो उन्हें खाना निगलने में भी दिक्कत होने लगी। उनपर ईलाज करनेवाले डॉक्टरों ने – ‘क्लर्जीमन्स सोअर थ्रोट’ ऐसा […]

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परमहंस-१२८

परमहंस-१२८

रामकृष्णजी के पीछे पीछे उनकी पत्नी शारदादेवी भी एक-एक करके आध्यात्मिक पायदान चढ़ रही थीं। रामकृष्णजी बीच बीच में उनकी परीक्षा भी लेते थे। एक बार एक धनवान भक्त रामकृष्णजी को दस हज़ार रुपये देना चाहता था। रामकृष्णजी द्वारा उनका स्वीकार किया जाना तो असंभव ही था। मन ही मन देवीमाता को – ‘यह क्या […]

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परमहंस-१२७

परमहंस-१२७

पानिहाटी का ‘गौरांग चैतन्य महाप्रभु’ उत्सव यह रामकृष्णजी और उनके शिष्यों के लिए आनंदपर्व ही था। रामकृष्णजी को वहाँ के भक्तिसत्संग में गाते-नाचते एकदम भान खोकर भावसमाधि में जाते हुए देखना, यह उपस्थितों के लिए पर्व ही होता था। अतः हर साल उस उत्सव की सभी लोग बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे। लेकिन इस साल, […]

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परमहंस-१२६

परमहंस-१२६

रामकृष्णजी द्वारा दक्षिणेश्‍वर से शुरू किया गया भक्तिप्रसार का कार्य अब तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था। रामकृष्णजी ने चुने हुए संन्यस्त भक्तों का पहला समूह रामकृष्णजी की सीख को भक्तों तक पहुँचाने का काम जोशपूर्वक कर रहा था और उस माध्यम से वृद्धिंगत होते जा रहा ‘रामकृष्ण-संप्रदाय’ अब सुचारू आकार धारण कर रहा […]

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परमहंस-१२५

परमहंस-१२५

रामकृष्णजी की स्त्रीभक्त अब रामकृष्णजी ने गोपालर माँ को धीरे धीरे शारदादेवी की सेवा में भी प्रविष्ट कर दिया। दक्षिणेश्‍वर आने पर, रामकृष्णजी के दर्शन करने के बाद शारदादेवी के कमरे में जाकर वे उनकी सेवा में लगी रहती थीं। उनका बहुत ही पसंदीदा काम – प्रेमपूर्वक अपनी जपमाला खींचते रहना चालू ही थी। लेकिन […]

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परमहंस-१२४

परमहंस-१२४

रामकृष्णजी की स्त्री-भक्त अघोरमणीदेवी बहुत ही सीधासादा जीवन जीतीं थीं। उनके दिवंगत पति के परिवारवालों से पतिनिधन के बाद उन्हें कुछ रक़म मिली थी, जिसका निवेश कर उसके ज़रिये जो प्रतिमाह ५-६ रुपये ब्याज आता था, उसपर वे अपने पूरे महीने का गुज़ारा कर लेती थीं। अघोरमणीदेवी ‘बालकृष्ण’ तो अपना आराध्य बनायें, यह मार्गदर्शन भी […]

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परमहंस-१२३

परमहंस-१२३

रामकृष्णजी की स्त्रीभक्त ‘योगिन माँ’ की तरह ही रामकृष्ण-परिवार में विख्यात होनेवालीं दुसरीं स्त्रीभक्त यानी ‘गोलप माँ’। रामकृष्णसंप्रदाय स्थापन होने के शुरुआती दिनों में उसे ठीक से आकार देने का काम जिन्होंने निष्ठापूर्वक किया, उनमें से एक गोलप माँ थीं। ‘अन्नपूर्णा देवी’ उर्फ ‘गोलप सुंदरी देवी’ ऐसे पूर्वनाम होनेवालीं गोलप माँ रामकृष्णजी के पास आयीं, […]

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परमहंस-१२२

परमहंस-१२२

रामकृष्णजी कीं स्त्रीभक्त रामकृष्णजी की निष्ठावान स्त्रीभक्तों में ‘योगिन (जोगिन) माँ’ तथा ‘गोलप माँ’ इन नामों से आगे चलकर विख्यात हुईं अग्रसर स्त्रीभक्त थीं। इनमें से ‘योगिन माँ’ (मूल नाम ‘योगींद्रमोहिनी मित्रा’) ये अमीर परिवार से थीं। लेकिन बहुत पैसा होने के बावजूद भी घर में पति की व्यसनाधीनता के कारण सुखशांति नहीं थी। घर […]

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