डॉ. अनिल काकोडकर; भारतीय अणु-ऊर्जा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य

‘भारत में अणु ऊर्जा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए इस क्षेत्र के अन्तर्गत संशोधन कार्य का तेज़ी से आगे बढना यह अत्यन्त ज़रूरी है और इससे भारत के छात्रों के मन में पश्‍चिमी देशों के प्रति आकर्षण न रहकर स्वदेश-केन्द्रित संशोधन करने में रुचि बढेगी। अणुविज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान क्षेत्र में वैश्‍विक धरातल पर भारत में सर्वाधिक मनुष्यबल एवं विशेषज्ञ हैं, परन्तु इन सबका उपयोग भारत देश के लिए होना अधिक महत्त्व रखता है। उच्च तकनीकी ज्ञान अवगत करके उससे संबंधित संशोधन करके उससे ही नया तकनीकी ज्ञान विकसित करना यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। लेकिन इसके लिए स्थानिक क्षमता का पूर्ण रूपेण उपयोग करना यह भारत की आज की ज़रूरत है। अन्यथा भारत के बुद्धिशील लोग विदेशों में जाकर वहाँ के तकनीकी ज्ञान को विकसित करने के लिए अभूतपूर्व योगदान देते रहने का प्रवाह निरंतर यूँ ही चलता रहेगा और उसी तकनीकी ज्ञान को भारत में लाने के लिए भारत को बेहिसाब पैसे खर्च करने पड़ेंगे।’ यह बात है तो थोड़ी बहुत प्रशंसनीय परन्तु मन को झकझोर देनेवाली भी है। ये कुछ विचार हैं, डॉ.अनिल काकोडकर के। भारत के एक महाविद्यालय के उपाधि समारोह में उन्होंने ये विचार व्यक्त किए हैं।

अणुसंशोधन क्षेत्र के दिग्गज संशोधकों के प्रभामंडल में जगमगाता हुआ महत्त्वपूर्ण नाम है- डॉ.अनिल काकोडकर। १९४३ में आज के मध्यप्रदेश के बावरणी नामक गाँव में उनका जन्म हुआ। गांधीजी के विचारों से प्रेरित स्वतंत्रता सेनानी माता-पिता के वे पुत्र थे। स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के पश्‍चात् मुंबई के व्हि.जे.टी.आय से १९६३ में मैकनिकल इंजिनियरिंग क्षेत्र की उपाधि प्राप्त कर १९६४ में भाभा अणुसंशोधन केन्द्र में वे कार्यरत हो गए। १९६९ में नॉटिंगहॅम महाविद्यलय से उन्होंने स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और ‘एक्स्पेरिमेंटल स्ट्रेस अ‍ॅनॅलेसिस’ यह उनका विषय था।

भाभा अणुसंशोधन केन्द्र में काम करते हुए अणु ऊर्जा केन्द्र संबंधित यंत्र विकसित करने के काम में उन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ‘ध्रुव’ नामक अणु ऊर्जा केन्द्र पूर्णत: भारतीय तकनीकी ज्ञान का उपयोग करके, भारतीय वैज्ञानिकों की संकल्पना से निर्माण होनेवाला एक वैशिष्ट्यपूर्ण अणु ऊर्जा केन्द्र के रूप में जाना जाता है। इस अणु ऊर्जा केन्द्र के कारण अनेकों साधन हमारे देश में उपलब्ध हुए हैं, साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स से संबंधित और भी अधिक संशोधन ‘ध्रुव’ अणुभट्टी के कारण ही हुए हैं।

‘प्रेशराईज्ड हेवी वॉटर रिअ‍ॅक्टर’ नामक प्रक्रिया पद्धति भारतीय बनावट के रूप में तैयार करने के लिए डॉ. काकोडकर ने काफी परिश्रम किए हैं। ‘कल्पकम – १ एवं २’, ‘राजस्थान -१’ इन प्रकल्पों की पुन: रचना डॉ. काकोडकर ने यशस्वी रूप में करने के कारण ये प्रकल्प आज भी अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाकर आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।

अणु ऊर्जा निर्माण करने हेतु ‘हेवी वॉटर रिअ‍ॅक्टर’ नाम की तकनीकी ज्ञान की एक मूल्यवान देन डॉ. काकोडकर ने हमें प्रदान की है, जिसमें भाभा अणुसंशोधन केन्द्र तथा अन्य भारतीय संशोधकों के दलों ने उन्हें इस कार्य में सहायता की है।

अणुऊर्जा निर्मिति के दौरान थोरियम का उपयोग करने के संबंध में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। यूरेनियम २३३ सह थोरियम प्लेरोनियम इनका उपयोग करके वे एक अभिनव ‘हेवी वॉटर रिअ‍ॅक्टर’ विकसित कर रहे हैं। इस सहज, सरल एवं सुरक्षित पद्धति के कारण ७५% बिजली निर्मिति थोरियम से करना संभव हो सकेगा। डॉ. काकोडकर का यह स्वप्न यदि प्रत्यक्ष में साकार हो जाता है, तो भारत में बिजली की समस्या भविष्य में कभी भी परेशान नहीं करेगी।

डॉ. अनिल काकोडकर को १९९८ में पद्मश्री, १९९९ में पद्मभूषण तथा २६ जनवरी २००९ में पद्मविभूषण नामक तीनों ही पद्म पुरस्कारों से भारत सरकार ने गौरावान्वित किया है। १९९७ में एच. के. फिरोदिया पुरस्कार विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान क्षेत्र में किये गये उल्लेखनीय कार्य के कारण उन्हें प्राप्त हुआ है। राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विज्ञान, अणुऊर्जा एवं तकनीकी ज्ञान आदि से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के वे मान्यवर सदस्य एवं उच्चपदाधिकारी हैं। अनेक संशोधनकर्ता-इंजिनियर्स-विशेषज्ञों की एक टीम तैयार करने में इन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।