सर्पविशेषज्ञ डॉ. रेमंड डिटमार्स (१८७६-१९४२) – भाग २

न्यूयॉर्क झूलॉजिकल पार्क के सर्पोद्यान के व्यवस्थापक के रूप में १७ जुलाई १८९९ से डॉ. रेमंड कार्यभार सँभालने लगे। स्वयं का सर्प संग्रह भी उन्होंने उस उद्यान में उपहार-स्वरूप में दे दिया था। सर्पोद्यान यह प्रेक्षकों के लिए खास तौर पर उनके आकर्षण का केन्द्र साबित हुआ। अनेक क्षेत्रों के लोग रेमंड के संपर्क में आये। दर्शक, छात्र, सपेरे, सर्कस में काम करनेवाले लोग, डॉक्टर्स, सर्प के विषय पर संशोधन करनेवाले शास्त्रज्ञ, पत्रकार इस प्रकार से अनेक स्तरों के लागों के बीच उनका आना जाना भी बढ़ गया। स्वाभाविक है कि इससे उनके काम क्या बोझ और भी अधिक बढ़ गया।

एक वर्ष में ही उनके उद्यान में साँपों की संख्या चार-पाँच सौ तक पहुँच गई। उन लागों की इच्छा एवं उनके अपने तरीके के कारण डिटमार्स एवं उनके सहकारियों में भगदड़ मच जाती थी। मन:पूर्वक साँपों से प्रेम करने के कारण डिटमार्स उनकी हर इच्छा-अनिच्छा का पूरा पूरा ध्यान रखते थे। लोगों के कौतूहल पर एवं व्यवस्थापन में आनेवाली अड़चनों पर गौर करते हुए डिटमार्स ने यह निश्‍चय किया कि साँपों के बारे में होनेवाली सारी जानकारी पुस्तक में उपलब्ध करनी चाहिए। १९०७ में उनके द्वारा रचित ‘द रेप्टाईल बुक’ प्रकाशित हुई। राष्ट्राध्यक्ष थिओडोर रुझवेल्ट ने ‘सर्वसामान्य लोगों के लिए सुबोध भाषा में, छायाचित्रों एवं रेखाचित्रों सहित होनेवाली शास्त्रीय पुस्तक’ इन शब्दों में रेमंड की प्रशंसा की।

डिटमार्स के सर्पोद्यान में १३४ प्रकार के हजारों के लगभग प्राणी हो चुके थे। प्रेक्षकों को जानकारी प्राप्त हो सके इसलिए पूर्ण जानकारी सहित चार्ट एवं दीवार-चित्र भी लगाये गए। प्रदेश एवं पर्यावरण के अनुसार साँपों की विविधता, आंतरिक रचना, जबड़े एवं उनके विषैले दंत इनकी रचना इनको सचित्र जानकारी पत्रक बनाकर लगाई गई। अपने इन्हीं उपक्रमों के कारण डिटमार्स काफी लोकप्रिय बन गए थे।

सर्पविष पर प्रतिविष तैयार करने में रेमंड का भी हाथ हो ऐसी उनकी अपनी इच्छा हुआ करती थी। अमरीका के ‘रॉकफेलर प्रतिष्ठान’ के लिए सर्पविष भेजने की ज़िम्मेदारी रेमंड को सौंपी गई।

१९०९ में यूरोप के दौरे में रेमंड ने कुछ अच्छे कीटक संग्रहालयों का सर्वेक्षण किया और उसी प्रकार के कीटक संग्रहालय की निर्मिति भी की। कीटक विभाग में रंगमंच, लाईट, रंगीन परदे, प्रोजेक्टर आदि की सहायता से विभिन्न प्रकार के कीटक एवं छोटे जानवर इनका मज़ेदार खेल, कसरत आदि भी दिखाना शुरू कर दिया। इसी दरमियान ‘रेप्टाईल्स ऑफ द वर्ल्ड’ नामक इस नयी पुस्तक का प्रकाशन हुआ। अब रेमंड प्रसिद्धि एवं कीर्ति के शिखर पर पहुँच चुके थे। उनके व्याख्यानों की भी संख्या बढ़ने लगी थी।

अब उनका अगला पड़ाव था, रेमंड उनकी पत्नी क्लारा एवं उनकी दो बेटियाँ इन सब के सहकार्य से बनायी गयी फिल्म थी ‘द जंगल सर्कस’। विविध प्रकार के कीटक-पतंगे, मकड़ी आदि प्राणियों को चुनकर उन्हें पूरे वर्षभर कसरत का अभ्यास करवाया गया। इस कार्य में इन सभी की मेहनत थी। मकड़ी, मेंढ़कों की कसरत, सूखे प्रदेश में रहनेवाले कछुओं की जीवनशैली, बड़ी-बड़ी गोल-गोल आँखें घुमानेवाले अफ्रिका के कॅमेलिआन गिरगिट, अष्टपाद कीटक, मख्खियाँ, चूहों आदि का अभिनय कौशल देखकर प्रेक्षक हैरान रह जाते थे। इस कीर्ति के पश्‍चात् ‘द बुक ऑफ नेचर’ नामक यह प्राणि जीवन की जानकारी एवं उनके जीवन के उतार-चढ़ाव को प्रदर्शित करनेवाली फिल्म को तैयार किया गया। एक शैक्षणिक कार्य हेतु अपार धन देनेवाले उद्योगपति ने रेमंड को लाखों के करीब डॉलर्स प्रदान किया। मौसम एवं हवामान के प्राणिजगत् पर होनेवाले परिणाम का चित्रीकरण किया गया, ‘द फोर स़िझन्स’ नामक फिल्म में और यह फिल्म मनोरंजनसहित अपनी छाप दर्शकों के दिलोदिमाग पर छोड़ गयी।

सर्पविष पर अमरीका में ही प्रतिविष तैयार किया जाए, ऐसी रेमंड की दिल से इच्छा थी। इसके लिए उन्होंने ब्राझील का दौरा भी किया। सैंकड़ों कॉपरहेडस्, वॉटर मोकॅसिन्स, रॅटलर्स आदि विषैले साँपों का विष-दोहन करके, उस विष का स्फटिकीकरण करने पर प्राप्त पाऊडर डॉ. रेमंड ब्राझील में भेजते थे।

न्यूयॉर्क के शिक्षणक्षेत्र ने भी डिटमार्स के कार्यक्षेत्र में दखलअंदाजी की। सजीवों की उत्क्रांति पर आधारित ‘इव्होल्युशन’ एवं ‘लिव्हिंग बुक ऑफ नेचर’ नामक यह जानकारियों से परिपूर्ण फिल्म स्कूली अभ्यास एवं विषयों के संबंध में उपयुक्त सबित हुई। जगह-जगह पर जमा किए गए प्राणी पार्क तक ले आना यह भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ करता था। न्यूयॉर्क झूलॉजिकल पार्क की माँग दिनोंदिन बढ़ती ही रही। अचानक एक अजगर की मृत्यु हो गई, जाँच के दौरान यह निदान (डयग्नोस) हुआ कि उसे क्षयरोग हुआ था। अब इस जंतुशास्त्र की जानकारी होनी ही चाहिए इसीलिए रेमंड ने इस शास्त्र का अध्ययन करना शुरू कर दिया। शौक, पसंद, ज़रूरत, अभ्यास एवं प्रयोग इस प्रकार से रेमंड की चाह बढ़ती ही रही। अमरीका की यूनायटेड कंपनी ने स्वयं का सर्पगृह निर्माण कर इससे संबंधित प्रतिवर्ष उत्पादन प्रकल्प शुरू कर दिया। इसके तकनीकी सलाहगार एवं प्रमुख संचालनकर्ता स्वाभाविक है कि डॉ. रेमंड डिटमार्स ही थे। अनेक प्रकार के सर्पविष का गुणधर्म ढूँढ़कर उसकी औषधि उपयुक्तता की जाँच की जाती थी। जानलेवा विष का उपयोग जान बचाने के काम में कैसे लाया जा सकता है, इस संशोधन में देश-विदेश के सभी शास्त्रज्ञ लगे हुए थे और डिटमार्स इनकी कोशिशों में सहायता करते थे। यह कार्य प्राणघातक एवं जोखीम का होकर भी विषारी सर्पों को भूलावे में रखकर उनका विषदोहन करने का काम वे करते रहे। हजारों साँपों को विषदोहन करके डिटमार्स के हाथ खुरदरे दिखाई देते थे। रेमंड डिटमार्स के प्रदीर्घ सेवाव्रत का गौरव संस्था ने उन्हें सुवर्णपदक देकर किया। १९३० में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से गौरावान्वित किया गया।

प्राणियों के जीवन से संबंधित तीन नयी पुस्तकें एवं स्व-अनुभव के अनुसार उनके द्वारा लिखा गया उपन्यास पूर्ण हो जाने पर उन्होंने अपना लक्ष्य चमगादड़ों की ओर केन्द्रित किया। व्हॅम्पायर जाति के चमगादड़ों के प्रति उन्हें विशेष जिज्ञासा थी। ये चमगादड़ प्राणियों का केवल ताजा खून ही पीते हैं। त्रिनिनाद में होनेवाले एक सौ फीट ऊँचाई वाले तथा दस फुट चौड़ाई वाला कोटर होनेवाले वृक्ष के अंदर घुसकर भी उन्होंने ये चमगादड़ देखें और उन्हें पकड़कर वे अपने पार्क में ले आये। इसके पश्‍चात् कीट-पतंगों के अध्ययन की ओर भी अपना ध्यान केन्द्रित किया। ‘द बुक ऑफ इनसेक्ट ऑडिटिज्’ एवं ‘द फाईट टू लिव्ह’ नामक दो पुस्तकें उन्होंने एक सहायक लेखिका के साथ मिलकर लिखीं। सन १९४० में प्राणिविभाग की ज़िम्मेदारी से निवृत्त होकर उन्होंने कीटकविभाग की ज़िम्मेदारी संभाली, साँपों का पालन-पोषण करनेवाले इस डॉ. रेमंड डिटमार्स का निमोनिया के कारण सन १९४२ में उनका निधन हो गया।