नेताजी-१५६

हिटलर की ख़ास मर्ज़ी रहनेवाले उनके सहकर्मी विलियम केपलर के कहने पर सुभाषबाबू ने, जर्मन सरकार से उन्हें क्या अपेक्षाएँ हैं, इस विषय में एक १४-पन्नोंवाला निवेदन लिखित स्वरूप में उन्हें दिया।

उसमें – ‘इस द्वितीय महायुद्ध में इंग्लैंड़ की निर्णायक हार होना, यह जर्मनी एवं भारत का समान उद्दिष्ट रहने के कारण इन दोनों को चाहिए कि वे एक-दूसरे की सहायता लेते हुए ही आगे बढ़ें। बर्लिन में आज़ाद भारत की अस्थायी रूप की सरकार की स्थापना की जायें और ‘इस महायुद्ध में जर्मनी की जीत होने पर भारत की स्वतन्त्रता की घोषणा तुरन्त ही की जायेगी’ ऐसा क़रार जर्मनी एवं यह अस्थायी सरकार इनके बीच किया जाये।

इस अस्थायी सरकार की एम्बसियाँ जर्मनी के सभी दोस्त राष्ट्रों में स्थापित की जायें।

अस्थायी सरकार की कृति योजना के बारे में भारतीय जनता को समय समय पर जानकारी मिलें, इसलिए इस सरकार के लिए बर्लिन में एक स्वतन्त्र रेडिओ केन्द्र का इन्तज़ाम कर दिया जाये और ‘आज़ाद हिन्द रेडिओ केन्द्र’ के रूप में उसे मान्यता दी जाये।

भारत के बाहर से किये गये इन प्रयासों को, भारत में बग़ावत होकर मदद मिलें, इसलिए अफ़गानिस्तान मार्ग से भारत में सभी आवश्यक साधन भेजने की व्यवस्था की जाये।

इसके अलावा भारत में स्थित ढ़ाई लाख ब्रिटीश फ़ौज में केवल ७० हज़ार इतनी ही संख्या रहनेवाले ब्रिटीश सैनिकों से लड़ने के लिए इस अस्थायी सरकार के अपने खुद के ५० हज़ार के सैन्यबल का निर्माण किया जाये और उसे सभी अत्याधुनिक शस्त्र तथा यन्त्रणा इनकी आपूर्ति की जाये।

इसके लिए बहुत भारी मात्रा में जिस निधि की ज़रूरत होगी, वह फ़िलहाल जर्मनी द्वारा ही उपलब्ध करा दिया जाये। अस्थायी सरकार उसका कर्ज़ के तौर पर स्वीकार करेगी और भारत के आज़ाद होते ही उसमें की पायी-पायी चुकायी जायेगी।

– इस तरह की बातें दर्ज़ की गयी थीं।

साथ ही, इस विश्‍वयुद्ध में, ब्रिटीश साम्राज्य के भारत पर रहनेवाले नियन्त्रण को डाँवाडोल कर देने के प्रयासों के आख़री पड़ाव पर जापान की भी मदद हो सकती है, ऐसा दृढ़ विश्‍वास सुभाषबाबू ने इस निवेदन में ज़ाहिर किया था। एक बार जब जापान की इंग्लैंड़ के साथ जंग छिड़ जाती है, तब युरोप एवं पूर्व एशिया ऐसे दो मोरचों पर एक ही समय लड़ते हुए ब्रिटिशों की नाक में दम आ जायेगा, ऐसा सुभाषबाबू को यक़ीन था। (और आगे चलकर हुआ भी ठीक वैसा ही)।

केपलर ने इस निवेदन को सहानुभूतिपूर्वक पढ़ा। वह निवेदन सुभाषबाबू के भारतीय स्वतन्त्रता के ध्येय के बारे में, जर्मन सरकार के लोगों का मतपरिवर्तन करने हेतु बहुत ही असरदार साबित होगा, ऐसी राय उन्होंने ज़ाहिर की। हालाँकि भारत को आज़ादी दिलाने के विषय में सुभाषबाबू को हो रही बेसब्री वे समझ सकते थे, मग़र फिर भी वे यह भी जानते थे कि फ़िलहाल सम्पूर्ण युरोप खण्ड में ही विभिन्न स्थानों पर युद्ध में उलझे हिटलर की प्राथमिकता (प्रायॉरिटी) इस समय कुछ अलग है। अतः उन्होंने सुभाषबाबू को किसी भी प्रकार का ठोस आश्‍वासन तो नहीं दिया। लेकिन इस निवेदन का सकारात्मक परिणाम ज़रूर दिखायी दिया। जर्मनी के विदेश मन्त्रालय में एक अलग ‘भारत विभाग’ की स्थापना कर दी गयी। इस वजह से जर्मन विदेश मन्त्रालय में सुभाषबाबू का आना-जाना बढ़ गया। कौन अफ़सर मेरी ध्येयपूर्ति के प्रति हमदर्दी रखता है और किसका उसे विरोध है, यह बात अब धीरे धीरे उनकी समझ में आने लगी। हालाँकि स्वतन्त्र ‘भारत विभाग’ की स्थापना कर दी गयी, मग़र फिर भी सुभाषबाबू को किस प्रकार से मदद की जाये, इस बारे में जमर्र्न विदेश मन्त्रालय के अफ़सरो में मतभिन्नता थी। एक तो इस अकेले मनुष्य की भला इतनी बड़ी क्या औक़ात है और दूसरी बात ‘गाँधीजी के साथ मतभिन्नता रहने के कारण’ क्या इस आदमी को भारत से कुछ समर्थन मिलेगा, जिसके बलबूते पर जर्मनी उसकी मदद करें, ऐसी भी विचारधारा ‘हिटलर के अलावा अन्य दुनिया से कोई वास्ता न रखनेवाले’ उसके चाटुकारों की थी। भारत के प्रति कोई ख़ास दिलचस्पी न रहने के कारण, यहाँ-वहाँ से आयीं उड़ती ख़बरों के आधार पर उन्होंने अपने मत बनाये थे। लेकिन वैश्विक गतिविधियों की ख़बर रखनेवाले, जर्मन सरकार स्थित अध्ययनशील लोग सुभाषबाबू की महानता को अच्छी तरह जानते थे और भारतवासियों पर, ख़ासकर युवा वर्ग पर एवं सशस्त्र क्रान्तिकारियों पर रहनेवाले सुभाषबाबू के प्रचण्ड प्रभाव का भी उन्हें अँदाज़ा था। भारतीय क्रान्तिकारी तो उनके एक इशारे पर अपनी जान तक कुर्बान कर देने के लिए तैयार हो जायेंगे, इस बात को भी वे भली-भाँति जानते थे।

ऐसी बन्द दरवाज़ों के पीछे की कई चर्चाओं का तफ़सील सुभाषबाबू को डॉ. धवन के ज़रिये प्राप्त होता था। लेकिन मायूस न होते हुए उन्होंने अपना काम जारी ही रखा था और मुख्य तौर पर जनसम्पर्क बढ़ाना शुरू कर दिया था। जर्मन सरकार में, इतना ही नहीं, बल्कि नाझी पक्ष में भी इस तरह का ‘सीक्रेट’ फीड बॅक देनेवालों की यन्त्रणा को उन्होंने बर्लिन में धीरे धीरे विकसित करना शुरू कर दिया था। उनके ज़रिये प्राप्त होनेवाले फीड बॅक के अनुसार वे अपनी योजना में उचित परिवर्तन करते थे।

सुभाषबाबू अब ‘एक्सेलसिअर’ हॉटेल को छोड़कर उतने ही आलीशान ‘एस्प्लनेड’ हॉटेल में ठहरे थे। वहाँ पर उनकी ख़ातिरदारी के लिए कुछ कर्मचारी दिये गये थे। सुभाषबाबू को किस बात की आवश्यकता है, उसपर ध्यान देने के लिए डॉ. धवन से कहा गया था। इसलिए कम से कम शुरुआती दौर में तो सुभाषबाबू को उनकी अच्छी-ख़ासी मदद हुई। लेकिन आगे चलकर धीरे धीरे डॉ. धवन अपने ही कामकाज़ में व्यस्त हो गये और सुभाषबाबू का काम भी अब बहुत फैल चुका था। इसलिए जर्मन विदेश मन्त्रालय के अफ़सरों के साथ मीटिंग्ज, उसमें स्थित ‘भारत विभाग’ का काम, साथ ही जर्मनी में बसे हुए भारतीयों से मुलाक़ातें इस दिनक्रम का व्यवस्थापन करने के लिए उन्हें एक फुल-टाईम सहायक की ज़रूरत थी।

उस समय बर्लिनस्थित जर्मन विश्‍वविद्यालयों में कई भारतीय छात्र पढ़ रहे थे। पढ़ाई के साथ साथ उनमें से कोई यदि स्वदेश के लिए काम करने के लिए तैयार हो, तो उसे यह काम सौंपने में कोई हर्ज़ नहीं है, ऐसा सुभाषबाबू सोच रहे थे और उन्होंने विदेश मन्त्रालय से ऐसे छात्रों की सूचि मँगवायी।

कुल मिलाकर ३९ भारतीय छात्र उस समय जर्मन विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे थे। उन्हीं में से एक नाम सुभाषबाबू को ज़रा-सा परिचित लगा। इसलिए उसीसे शुरुआत करने का सुभाषबाबू ने तय किया।