समारोप करते हुए…

 

 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ – भाग ६४

जिसका प्रारंभ हुआ, उसका अन्त भी तो होना है| ‘दैनिक प्रत्यक्ष’ के ‘चालता बोलता इतिहास’ में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ पर की लेखमाला शुरू होकर एक साल बीत गया| दरअसल देशविदेशों में विस्तार हो चुके और ९० वर्षों का इतिहास रहनेवाले संघ के बारे में कितना भी लिखा, तो भी वह अपूर्ण ही होगा| इसका पूरा एहसास रखते हुए मैंने संघ के इतिहास की खोज करने का प्रयास किया| मैं बचपन से ही संघ की शाखा में जाने लगा था और ज़िन्दगी के ७५ साल बीत गये, फिर भी उसी उत्साह के साथ शाखा में जाता हूँ| इस दौरान मैंने जो संघ देखा, जिसका अनुभव किया, उसके आधार पर इस लेखमाला की रचना की| इसमें संघ से निगडित सभी बातों का समावेश करना यह प्रायः नामुमक़िन बात है| क्योंकि संघ महासागर की तरह अफाट  है| संघ की व्यापकता को दूसरी मिसाल दे ही नहीं सकते| इस संगठन का इतने सालों से सहजता से और दृढतापूर्वक कैसे विस्तार हो रहा है, यह सवाल कइयों के मन में उठता है| इसका उत्तर आद्य सरसंघचालक पूजनीय डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार के संकल्प से मिल सकता है|

rameshbhai maheta-   ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’

समाज को एक बनानेवाले एक सर्वसाधारण संगठन के रूप में संघ की स्थापना नहीं हुई थी| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने से पहले डॉक्टरसाहब ने अफाट  चिंतन किया था| इस देश के वास्तविक इतिहास को जान लिया था| इस देश की संस्कृति और सामर्थ्य किसमें है, इसका यथार्थ एहसास इसी चिंतन में से डॉक्टरसाहब को हुआ था| उसी समय, वैभवशाली धरोहर प्राप्त हुए इस देश की उस समय जो हालत थी, उसके लिए ज़िम्मेदार रहनेवाले कारणों पर भी डॉक्टरसाहब ने गहराई से विचार किया था| हज़ारों वर्षों से इस देश ने विदेशी आक्रमकों के हमले नाक़ाम किये| कुछ आक्रमकों को अल्पसमय के लिए सफलता मिली भी, मग़र फिर भी वे इस देश का धर्म, उसकी संस्कृति और परंपरा को बदल नहीं सके| कुछ अरसे बाद विदेशी आक्रमकों को इस महान धर्म एवं संस्कृति के सामने नतमस्तक होना ही पड़ा| जिन्होंने वैसा नहीं किया, वे समय की धारा में ख़त्म हुए|

समय समय पर महापुरुषों ने जन्म लेकर अपने पराक्रम से इस राष्ट्र को पुनः वैभव प्राप्त करा दिया| अलेक्झांडर ने भारत पर किये आक्रमण को प्रत्युत्तर देने के लिए उस समय इस देश में कोई विशाल साम्राज्य नहीं था, बल्कि छोटे छोटे राज्यों ने ही अलेक्झांडर की अफाट सेना को खदेड़ दिया था| लेकिन इस आक्रमण के बाद राष्ट्र की रक्षा एवं अभ्युदय करनेवाले विशाल साम्राज्य की आवश्यकता है, यह आचार्य चाणक्य की समझ में आया| उन्होंने शिष्योत्तम चंद्रगुप्त को साथ लेकर सामर्थ्यशाली साम्राज्य का निर्माण किया| इस प्रकार शून्य में से सर्जन करनेवाले महापुरुष इस देश में समय समय पर जन्म लेते रहे|

हमारा इतिहास ऐसे ही महापुरुषों की वीरगाथा से भरा है| हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न जिजामाता ने देखा और उनके पुत्र ने वह सपना सच कर दिखाया| दुनिया के इतिहास में रहनेवाली यह अद्भुत मिसाल हमारे सामने है, जिससे हमें आज भी प्रेरणा मिल रही है| संघ की स्थापना करते समय डॉ. हेडगेवार की आँखों के सामने यही इतिहास था| यही संघ की स्थापना के पीछे रहनेवाली मूलभूत प्रेरणा थी| सारे हिंदु समुदाय को एक करनेवाले, प्रखर राष्ट्रभक्तों के संगठन का निर्माण करने का ध्येय डॉक्टरसाहब के सामने था| इस संगठन के लिए अपना सारा जीवन समर्पित करनेवाले स्वयंसेवक मैं तैयार करूँगा, ऐसा निर्धार डॉक्टरसाहब ने किया|

‘मनुष्य यत्न, ईश्‍वर कृपा’ इस न्याय के तहत डॉक्टरसाहब ने अथक रूप में किये परिश्रम को फल मिला| एक एक करके डॉक्टरसाहब ने स्वयंसेवक तैयार किये| ‘स्वयंमेव मृगेंद्रता’ यह संदेश डॉक्टरसाहब ने युवावर्ग को दिया और उनमें अफाट  आत्मविश्‍वास निर्माण किया| बाल्यावस्था से लेकर जीवन के अन्त तक केवल संघकार्य और उसके द्वारा राष्ट्रकार्य करनेवाले कई स्वयंसेवक डॉक्टरसाहब ने तैयार किये| ‘माधव सदाशिव गोळवलकर’ यह डॉक्टरसाहब के संपर्क में आया हुआ सुविद्य एवं आध्यात्मिक रूझान रहनेवाला युवक था| मोक्ष की एकमात्र कामना मन में रखते हुए संन्यास धारण करने निकले माधव को डॉक्टरसाहब ने संघकार्य की दीक्षा दी| माधव यानी श्रीगुरुजी ने डॉक्टरसाहब के पश्‍चात् संघ की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली| डॉक्टरसाहब ने लगाये हुए संघ के इस पौधे का, विशाल वटवृक्ष में रूपांतरण किया| केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी जहॉं जहॉं पर हिंदु समाज है, वहॉं जाकर संघ पहुँचा और उसका विस्तार हुआ| उसके पीछे श्रीगुरुजी की व्यापक दृष्टि थी| ‘इदं न मम, इदं राष्ट्राय स्वाहा’ यह श्रीगुरुजी का संदेश था| इस दुनिया से विदा लेते समय श्रीगुरुजी ने ‘सरसंघचालक’पद की ज़िम्मेदारी बाळासाहब देवरस पर सौंपी|

श्रीगुरुजी का कार्य बाळासाहब ने और आगे बढ़ाया| ‘सामाजिक समरसता के बिना एकता नहीं और एकता के बिना सामर्थ्य नहीं’, ऐसा बाळासाहब का सिद्धांत था| इसीलिए उन्होंने सामाजिक समरसता पर और सेवाकार्य पर सर्वाधिक ज़ोर दिया| इसीलिए उनके कार्यकाल में संघ अधिक ही बलशाली बन गया| राष्ट्र के हर एक क्षेत्र में स्वयंसेवक कार्य करें, ऐसा बाळासाहब का आग्रह था| इसका नतीजा यह हुआ कि अपने जीवन के अंतिम दौर में बाळासाहब ने, किसी ज़माने में संघ के प्रचारक रहनेवाले अटल बिहारी वाजपेयीजी को ‘प्रधानमंत्री’पद की शपथग्रहण करते हुए देखा| आज देश के प्रधानमंत्री रहनेवाले नरेंद्र मोदीजी को राजनीति के क्षेत्र में भेजने का निर्णय भी बाळासाहब ने लिया था| उसके पीछे रहनेवाली दूरदृष्टि को देखकर हम रोमांचित हुए बिना नहीं रहते|

स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण बाळासाहब ने स्वयं होकर ‘सरसंघचालक’ पद की ज़िम्मेदारी रज्जूभैया को सौंप दी| रज्जूभैय्या संपन्न परिवार से आये थे और उच्चशिक्षित थे| रज्जूभैय्या ने संघकार्य को आगे बढ़ाना जारी रखा|

उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर उन्होंने ‘सरसंघचालक’ पद की ज़िम्मेदारी श्री. सुदर्शनजी को सौंप दी| सुदर्शनजी ने इस कार्य कौ और आगे बढ़ाया| कुछ समय बाद सुदर्शनजी ने ‘सरसंघचालक’ पद की बागड़ोर श्री. मोहनजी भागवत के हाथों सौंप दी| आज परमपूजनीय सरसंघचालक श्री. मोहनजी भागवत संघकार्य को तेज़ी से आगे ले जा रहे हैं|

संघ में पद और सत्ता के लिए साटमारी (झगड़े) क्यों नहीं होती, ऐसा सवाल कइयों के मन में उठता रहता है| बहुत साल पहले इसका जवाब बाळासाहब ने दे रखा है – ‘संघ ‘एकचालकानुवर्ति’ संगठन है यह सच है| इस कारण संघ  फॅसिस्ट होने का आरोप किया जाता है| लेकिन संघ भले ही एकचालकानुवर्ति हो, मग़र फिर भी यह संगठन चालकानुवर्ति न होकर ध्येयानुवर्ति है| आहे. अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में परमपवित्र भगवा ध्वज यही गुरु है| संघ का तत्त्वज्ञान, ध्येय-नीतियॉं, यह सबकुछ इस परमपवित्र भगव्या ध्वज से प्रतीत होता है|’

‘लक्ष्य एक और कार्य अनेक’, इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मार्गक्रमणा करता रहा| इस प्रवास में चरमसीमा का विद्वेष और प्रखर विरोध इनका सामना संघ को करना पड़ा| संघा को दुर्लक्षित कर देने की कोशिशें भी हुईं| लेकिन संघ अपने ध्येय-नीतियों से कभी भी विचलित नहीं हुआ| यह सबकुछ संभव हुआ, वह स्वयंसेवकों के त्याग, तपस्या और बलिदान के कारण! आज देशविदेश में कई विश्‍वविद्यालयों में संघ पर अनुसंधान किया जा रहा है| जिस तरह गंगा नदी का केवल उद्गमस्थान देखकर हरिद्वार में रहनेवाले गंगा नदी के विशाल पात्र की कल्पना नहीं कर सकते, जिस तरह वटवृक्ष (बरगद) के बीज को देखकर, भविष्य में विकसित होनेवाले वृक्ष का अँदाज़ा नहीं होता; ठीक उसी तरह ९० वर्ष पूर्व विजयादशमी के दिन नागपुर के डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार के साधारण से घर में पंद्रह-बीस लोगों की उपस्थिति में शुरुवात हुए संघ ने आज विशाल जनआंदोलन तथा राष्ट्रभक्ति के महाअभियान का व्यापक स्वरूप धारण किया है|

आज संघ देशभक्तों की आशा और देशविरोधी शक्तियों के सामने चुनौती बनकर दृढ़तापूर्वक खड़ा है| साधारणसी प्रतीत होनेवालीं शाखाओं ने गगनस्पर्शी व्यक्तित्वों का गठन किया| शाखा से प्रेरणा लेनेवाले स्वयंसेवकों पर केवल संघ को ही नहीं, बल्कि सारे देश की जनता को गर्व महसूस हो रहा है| फिर चाहे वे साधारण किसान, मज़दूर, क्लर्क हों, या फिर शासकीय एवं निमशासकीय आस्थापनों के उच्चाधिकारी हों या देश के प्रधानमंत्री हों, विभिन्न क्षेत्रों में स्वयंसेवक अपनी सेवाएँ देश को समर्पित कर रहे हैं| स्वयंसेवक अपनी गुणवत्ता एवं कठोर परिश्रम तथा प्रामाणिकता के कारण अन्यों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गये हैं| परमपूज्य डॉ. हेडगेवारजी कहते थे कि ‘संघ और कुछ नहीं करेगा, बस केवल शाखाएँ चलायेगा| लेकिन स्वयंसेवक कुछ भी बाक़ी नहीं छोड़ेंगे| अर्थात् देश और समाज के लिए आवश्यक रहनेवाला हर एक कार्य स्वयंसेवक करेंगे|’

संघ की शाखा में से देशभक्ति, अनुशासन और अपने समाज के प्रति आत्मीयता रखने की शिक्षा एवं संस्कार ग्रहण करनेवाला स्वयंसेवक हर एक क्षेत्र में सक्रिय है| संघ द्वारा शुरू की गयीं कुछ संस्थाओं तथा संगठनों की जानकारी हमने इस लेखमाला में पहले ही ली है| समाज की आवश्यकता के अनुसार संघ ने और भी कुछ संगठनों की स्थापना की| उनमें ‘विद्या भारती’, ‘अखिल भारतीय शिक्षा मंडल’, ‘अखिल भारतीय साहित्य परिषद’, ‘संस्कृत भारती’, ‘भारत विकास परिषद’, ‘राष्ट्रीय सेवा भारती’, ‘दीनदयाळ खोज संस्थान’, ‘विज्ञान भारती’, ‘पूर्व सैनिक सेवा परिषद’, ‘क्रीडा भारती’, ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’, ‘अखिल भारतीय सहकार भारती’, ‘अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत’, ‘लघु उद्योग भारती’, ‘प्रज्ञा प्रवाह’, ‘सीमा जागरण और सुरक्षा मंच’, ‘स्वदेशी जागरण मंच’, ‘भारतीय किसान संघ’, ‘भारतीय इतिहास संकलन योजना’, ‘राष्ट्रीय शीख संगत’, ‘हिंदु जागरण मंच’, ‘आरोग्य भारती’, ‘अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ’, ‘नॅशनल मेडिकोज् ऑर्गनायझेशन’, ‘भारतीय कुष्ठ निवारक संघ’, ‘सक्षम’, ‘गोसेवा आणि संवर्धन’, ‘परिवार प्रबोधन’, ‘सामाजिक समरसता मंच’, ‘धर्मजागरण विभाग’ इन तथा इन जैसे कई संगठन संघ ने शुरू किये हैं| ये संगठन प्रचंड कार्य कर रहे हैं| उनका तफ़सील देना चाहें, तो हर एक पर एक स्वतंत्र लेखमाला शुरू की जा सकती है| कभी अवसर प्राप्त हुआ, तो इसके बारे में भी यक़ीनन विचार किया जा सकता है|

मैं कोई लेखक नहीं हूँ| पढ़ाई ख़त्म होने के बाद मैंने, दस्तख़त करने के अलावा अन्य कुछ लिखने के लिए कभी पेन हाथ में लिया हो, वह मुझे याद भी नहीं है| यहॉं तक कि संघ की बैठक में भी मैं कभी डायरी लेकर नहीं गया| क्योंकि मुझे लिखने की आदत ही नहीं थी और आज भी नहीं है| बहुत साल पहले मेरी मुलाक़ात अनिरुद्ध बापूजी से हुई थी| ‘आप लेखन शुरू कीजिए’ ऐसा बापूजी ने मुझे कहा था| लेकिन मैंने मेरी मुश्किल बापूजी को बतायी| ‘बापू, आप मुझे दूसरा कुछ भी करने को बोलिए, लेकिन लिखने का काम मत बोलिए, वह मुझसे हरगिज़ नहीं होगा|’ यह सुनकर बापूजी खिलखिलाकर हँसे थे| उसके बाद कुछ साल बीत गये और ‘दैनिक प्रत्यक्ष’ में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ पर लेखमाला शुरू करने की ज़िम्मेदारी मेरे पास आयी| इस लेखमाला के लिए मैंने कई पुस्तकों का संदर्भ लिया है| लेकिन अब तक किसी भी पुस्तक में प्रकाशित न हुईं बातें भी इस लेखमाला में आयी हैं| पूजनीय बाळासाहेब देवरस के पूरे १७ सालों के सहवास का सौभाग्य मुझे और मेरे परिवार को प्राप्त हुआ| हम उन्हें अपना परिवारप्रमुख ही मानते थे| मेरी बेटियॉं उन्हें ‘दादाजी’ कहकर बुलाती थीं| मेरी बेटियों की शिक्षा से लेकर शादियों के समारोह के तफ़सील तक की बातों में बाळासाहब बारिक़ी से ध्यान देते थे|

हमारे लिए यह सबसे अनमोल खज़ाना है| लेकिन यह पारिवारिक बात यह बताने का कारण यह है कि बाळासाहब ने संघ से निगड़ित रहनेवालीं और कहीं पर भी प्रकाशित न हुईं ऐसी कई बातें हमें बतायी थीं| ठेंठ उन्हीं की ज़बानी सुनी हुईं बातें मैंने यहॉं पर दी हैं| अन्यथा कहीं पर भी वे दर्ज़ न होतीं| ये कहीं पर तो दर्ज़ होनी चाहिए, ऐसी मेरी तहे दिल से इच्छा थी और वह पूरी हो गयी| संघ का इतिहास लिखने की यह ज़िम्मेदारी मैंने सुचारु रूप से निभायी है या नहीं, यह वाचक ही तय करेंगे|

मैं अपने आपको बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ| पूजनीय अनिरुद्ध बापूजी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन मुझे समय समय पर मिलता रहा| १६ जून २०१५ को नाशिक में श्रीगुरुजी रुग्णालय का एक विशेष कार्यक्रम था| उसके लिए बापूजी को निमंत्रित करने का हमने तय किया| ‘बापू, आप स्वयं डॉक्टर हैं, क्या आप इस अस्पताल के डॉक्टरवर्ग को संबोधित करेंगे? आपकी ओर से मैंने पहले ही ज़बान दे रखी है’, ऐसा मैंने बापूजी से कहा| उसपर बापूजी ने जो उत्तर दिया, उसे मैंने मेरे हृदय में जीवनभर के लिए अंकित कर दिया है| ‘आपको यह अधिकार है’, ऐसा बापूजी ने कहा और वे बड़े दिल से इस कार्यक्रम के लिए उपस्थित रहे| इस समय बापूजी ने श्रीगुरुजी के जीवन पर अद्भुत व्याख्यान दिया| श्रीगुरुजी के जीवन का गहराई से अध्ययन एवं चिंतन करनेवाले ही इस तरह भाष्य कर सकते हैं|

इस लेखमाला के लिए भी मुझे पूजनीय बापूजी के आशीर्वाद एवं सहयोग का लाभ हुआ| समीरदादा का मार्गदर्शन और मेरे मित्र जितेंद्रजी का सहयोग मिला| इसके कारण ही मैं यह मालिका आपके सामने प्रस्तुत कर सका| या लेखमाला का समारोप करते समय मन में कुछ भावनाएँ मन में उमड़कर आ रही हैं|

हमारा राष्ट्र कितना प्राचीन है! भारत ने इस विश्‍व को कई बातें बहाल कीं| बाकी की दुनिया जब प्राथमिक अवस्था में थी, उस समय भारत में शास्त्र, विज्ञान और कला का अद्भुत विकास हुआ था| हमारी संस्कृति, हमारा समाजजीवन उस दौर में परमोत्कर्ष को पहुँच चुका था| हमारी इस भारतभूमि को परमेश्‍वर ने अपरंपार प्राकृतिक वैभव से संपन्न बनाया है| हमारे देश के पूर्व की ओर गंगासागर, पश्‍चिम की ओर सिंधुसागर, दक्षिण की ओर हिंदु महासागर      और उत्तर की ओर नगाधिराज हिमालय और उसमें से उद्गमित होनेवालीं कई नदियॉं हैं| प्राकृतिक संपन्नता के साथ ही भाषिक संपन्नता का वरदान भी हमारे देश को प्राप्त हो चुका है| मानवी उत्कर्ष करनेवाली संस्कृति इस देश में बसती आ रही है| त्याग और पराक्रम की, अन्य कहीं पर भी देखने को न मिले, ऐसी धरोहर हमारे देश को प्राप्त हुई है| मग़र फिर भी हमारी इस अधोगति का क्या कारण है?

इसका कारण यह है कि समाज और राष्ट्र की चिन्ता छोड़कर हम व्यक्तिगत मोहपाश में अटक गये|

लेकिन हे भारतमाता, हम तुझे आश्‍वासन देते हैं कि जो अपराध हमने किये, उसकी पुनरावृत्ति न होने देंगे| हम पुनः सुसंघटित होंगे, सुसंस्कारित होंगे और पुनः तुम्हें तुम्हारा गतवैभव प्राप्त करा देंगे| उसके लिए….

….ना मतभेद, ना मनभेद, ना भाषा के विवाद, ना प्रांतों के झगड़ें, ना उच्चनीच विवाद, ना धर्म को लेकर संघर्ष, राष्ट्रधर्म सर्वोच्च धर्म, राष्ट्रदेवता सर्वोच्च देवता, भारतमाता हमारी माता, हम सब मिलकर गान करें,

तेरा वैभव सदा रहे मॉं, हम दिन चार रहें ना रहें

वंदे मातरम् !

॥ भारत माता की जय ॥