आख़िरी श्‍वास तक का ध्यास

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ – भाग ६३

दिसम्बर १९९२ में छेड़े गये रामजन्मभूमि आंदोलन के परिणामस्वरूप सरकार ने संघ पर पाबंदी लगायी| सरसंघचालक बाळासाहब देवरस ने इस पाबंदी का कड़े शब्दों में निषेध किया| सरकार को इस मामले में उन्होंने पत्र भी लिखा| ‘देश बहुत ही मुश्किल हालातों का सामना कर रहा है| ऐसे समय में संघ पर पाबंदी क्यों लगायी जा रही है? यह अन्याय है| संघ इसका सामना करेगा’ ऐसा बाळासाहब ने इस पत्र में कहा था| देशभर के स्वयंसेवकों को बाळासाहब ने संदेश दिया| ‘यह हमारी एक और कसौटी है| लेकिन सत्य हमारे पक्ष में है| हम इस कसौटी को भी धीरता से पार कर जायेंगे| प्रजा रामजन्मभूमि की तरह ही श्रीकृष्णजन्मभूमि, श्री काशीविश्‍वेश्‍वरनाथ मंदिर को मुक्त किये बग़ैर नहीं रहेगी’ ऐसा विश्‍वास बाळासाहब ने इस संदेश में व्यक्त किया था|

MadhukarDattatraya

सैंकड़ो वर्षों से राष्ट्र के मानबिंदु रहनेवाले मंदिर ध्वस्त कर विदेशी आक्रमकों ने इस देश की जनता का लगातार अपमान किया| कितने साल प्रजा इस अपमान को सहती रहेगी? रामजन्मभूमि के विषय में इन्साफ़ मिलें इसके लिए प्रजा ने कितने साल प्रतीक्षा की! लेकिन सालोंसाल यदि उसपर फ़ैसला ही न होता हो, तो क्या करें? इसीलिए इसमें से निर्माण हुआ रामजन्मभूमि आंदोलन उचित ही था, ऐसा बाळासाहब का ठोंस रूप में कहना था| सरकार ने थोंपी हुई पाबंदी के विरोध में इन्साफ़ मॉंगने के प्रयास शुरू थे| लेकिन पाबंदी की कालावधि में सरकार ने किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया| संघ के कार्यालय भी शुरू थे| केवल संघ की शाखाएँ सम्मिलित नहीं होती थीं| लेकिन स्वयंसेवकों ने शाखा के बदले रामधून की शुरुआत की| श्रीराम के गजर में जनता भी सहभागी होने लगी| पुलीस ने भी इसका विरोध नहीं किया|

छः महीने बाद इस पाबंदी को हटाया गया| संघ की शाखाएँ पुनः नये जोश के साथ शुरू हुईं| शाखाओं की संख्या भी हज़ारों की तादाद में बढ़ गयी| इससे पता चलता है कि पहले की दो पाबंदियों की तरह ही यह तीसरी पाबंदी भी संघ का सामर्थ्य बढ़ानेवाली ही साबित हुई| इस पाबंदी के बारे में एक बात यक़ीनन ही कहनी होगी| इस बार केंद्र सरकार प्रगल्भता दिखाते हुए, संघ पर कठोर कार्रवाई करना टाल दिया| संघ को जनता से ज़बरदस्त प्रतिसाद मिल रहा था, इसका एहसास केंद्र सरकार को हुआ था|

उस समय प्रधानमंत्रीपद पर विराजमान हुए नरसिंह राव यानी कुशल एवं अनुभवी नेता थे| बहुत ही व्यासंगी एवं विद्वान रहनेवाले नरसिंह रावजी का कई भाषाओं पर प्रभुत्व था| बहुत ही धार्मिक वृत्ति के इस नेता ने परिस्थिति का भान रखा, यह इस देश का सौभाग्य ही था| ख़ैर! देश में ये सब उथलपुथल शुरू रहते समय बाळासाहब का स्वास्थ्य बिगड़ता चला जा रहा था| डायाबिटीज़ के कारण अन्य बीमारियॉं बढ़ती जा रही थीं| स्वास्थ्य के बिगड़ते, द्रवरूप आहार लेते हुए बाळासाहब संघ का नेतृत्व कर रहे थे| उनकी आँखें शुष्क हो जाने के कारण बार बार ‘आयड्रॉप्स’ डालने पड़ते थे| शरीर से थके हुए बाळासाहब के मन में अपने साथियों की स्मृतियॉं जाग उठती थीं|

बाळासाहब के निजी सचिव रहनेवाले डॉ. आबाजी थत्ते का स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण यह ज़िम्मेदारी श्रीकांतजी जोशी पर सौंपी गयी| आबाजी को भी नागपुर के अस्पताल में दाख़िल किया गया था| एक एक करके बाळासाहब के बचपन के साथी उन्हें छोड़कर जा रहे थे| माधवराव मुळे, एकनाथजी रानडे, आप्पाजी जोशी और बाळासाहब के ही बन्धु भाऊराव देवरस ने इस दुनिया से विदा ली थी| संघ में मशहूर रहनेवाली ‘बाळ-भाऊ’ की जोड़ी अब टूट गयी थी| आबाजी से मिलने बाळासाहब नागपुर के अस्पताल में गये| उनकी हालत देखकर बाळासाहब को बहुत बुरा लगा| दोनों भी इस समय गद्गद हो उठे|

उम्र के इस पड़ाव पर भी बाळासाहब व्यक्तिगत दुख, स्वास्थ्य की तक़रारें यह सबकुछ बाजू में रखकर अपना कर्तव्य निभा रहे थे| लेकिन तबियत बहुत ही बिगड़ने के कारण वे परावलंबी बन चुके थे| बाळासाहब को ‘लोकमान्य टिळक पुरस्कार’ घोषित किया गया| लेकिन इस पुरस्कार का स्वीकार करने बाळासाहब पुणे नहीं जा सके| उनकी ओर से मा. गो. वैद्यजी ने इस पुरस्कार का स्वीकार किया| शरीर क्षीण हो चुका था| लेकिन बाळासाहब की विचारशक्ति उतनी ही तीक्ष्ण थी|

सन १९९३ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चेन्नई के कार्यालय में बमविस्फोट हुआ| इसमें ११ लोगों की जानें गयीं| यह  होने के कुछ ही समय पहले, कार्यालय में बैठक संपन्न हुई थी| स्वयंसेवक कार्यालय से बाहर निकलने के बाद यह बमविस्फोट हुआ| अन्यथा अधिक बड़ी हानि हो चुकी होती| इस बमविस्फोट के बाद बाळासाहब व्यथित हुए| वे चेन्नई जाकर सभी स्वयंसेवकों से मिलना चाहते थे| लेकिन उनके स्वास्थ्य को मद्देनज़र रखते हुए डॉक्टरों ने उसे अनुमति नहीं दी| इसके बाद बाळासाहब का स्वास्थ्य और भी बिगड़ गया| उनके शरीर में कँपकँपी होने लगी| यह देखकर डॉक्टर भी हैरत में पड़ गये और उन्हें अनुमति देनी ही पड़ी|

विमान में से चेन्नई जाते समय, बाळासाहब को एअर होस्टेस ने, ‘दादाजी, आप चेन्नई में कहॉं जा रहे हैं?’ ऐसा सवाल पूछा| ये दादाजी शायद चेन्नई के अपोलो अस्पताल में ईलाज के लिए जा रहे होंगे, ऐसा उसे लगा था| ‘संघ के चेन्नईस्थित कार्यालय में बमविस्फोट हुआ और उसमें ११ लोगों की जानें गयीं| ‘सरसंघचालक’ होने के नाते वहॉं पर जाना और शोक में डूबे परिवारों की सांत्वना करना, यह मेरा कर्तव्य है और उसे निभाने मैं चेन्नई जा रहा हूँ’, ये बाळासाहब के उद्गार सुनकर वह एअर होस्टेस हैरान हो गयी और उसने बाळासाहब को प्रणाम किया|

चेन्नई के कार्यालय में बाळासाहब को व्हीलचेअर में से ले जाया गया| सभी स्वयंसेवक कतार में खड़े थे| बाळासाहब को हर एक स्वयंसेवक के पास ले जाया गया| किसी भी हालत में बाळासाहब यहॉं के स्वयंसेवकों को मिलना ही चाहते थे| इसीलिए इस मुलाक़ात से उन्हें आत्यंतिक सन्तोष मिला|

११ मार्च १९९४ को नागपुर में संघ की ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधिसभा’ का आयोजन किया गया| यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बैठक रहती है| विभिन्न क्षेत्र में कार्यरत रहनेवाले संघ के प्रांतीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर के पदाधिकारी इस बैठक में सहभागी होते हैं| यहॉं कार्य का लेखाजोखा लिया जाता है| इस बार, प्रतिनिधियों की सभा का पहला सत्र जब ख़त्म होने को आया था, तब अत्यधिक महत्त्वपूर्ण निर्णय घोषित किया गया| बाळासाहब ने ‘सरसंघचालक’ पद से निवृत्त होने की और नये ‘सरसंघचालक’ के रूप में प्रा. राजेंद्रसिंह (रज्जूभैय्या) की नियुक्ति की घोषणा इस समय की|

दरअसल सरसंघचालक की नियुक्ति आजीवन होती है| लेकिन बाळासाहब ने इस नियम को बदल दिया| स्वास्थ्य बिगड़ गया होने के कारण मैं इस पद के साथ इन्साफ़ नहीं कर सकता| अतः इस पद पर रहने का मुझे नैतिक अधिकार नहीं है, ऐसा बाळासाहब का कहना था| इसीलिए नये सरसंघचालक का चयन उन्होंने बहुत पहले ही कर रखा था| उस बारे में संघ के ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा भी की थी| यह नियुक्ति की प्रक्रिया बहुत ही सरल थी| अगले दिन शाखा में माननीय रज्जूभैय्या ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया| ‘हमने आज तक बाळासाहब के मार्गदर्शन में मार्गक्रमणा की| इसके आगे भी उन्हीं के मार्गदर्शन में हम आगे बढ़ेंगे’ ऐसा रज्जूभैय्या ने कहा|

२६ नवम्बर १९९५ को बाळासाहब के ८० साल पूरे हो गये| उनके सहस्त्रचंद्र दर्शन का कार्यक्रम आयोजित किया गया| इस कार्यक्रम में बाळासाहब प्रसन्नतापूर्वक सहभागी हुए| देशभर में से आये अभिनंदन के संदेशों का बाळासाहब ने स्वीकार किया| इस दौरान बाळासाहब का प्रवास पूरी तरह रुक गया था| लेकिन कुछ समय के लिए उन्हें मुंबई लाया गया| मुंबई आये, तो बाळासाहब हमारे ही घर ठहरते थे| १७ वर्ष तक इस सौभाग्य का मुझे लाभ हुआ है| उनके वास्तव्य के कारण हमारा घर पुनीत हुआ है| हमारे लिए वे परिवारप्रमुख ही थे| बाळासाहब भी, ‘यह मेरा ही परिवार है’ ऐसा हमेशा कहते थे| वह सुनकर हम धन्य हो जाते थे| बाळासाहब को इस हालत में देखना बहुत ही क्लेशदायी था|

पुणे में रहनेवाले कौशिक आश्रम जाने की बाळासाहब की इच्छा थी| कौशिक आश्रम यानी निवृत्त प्रचारकों का निवासस्थान था| श्रीकांतजी जोशी के साथ मैं बाळासाहब को यहॉं छोड़ने गया था| जीवनभर का अनमोल खजिना यहॉं पर बाळासाहब को प्राप्त हुआ| क्योंकि यहीं पर उन्होंने टीव्ही पर, अटल बिहारी वाजपेयीजी को ‘भारत के प्रधानमंत्री’ के रूप में शपथग्रहण करते हुए  देखा| संघ का एक प्रचारक देश का प्रधानमंत्री बना, यह बाळासाहब के लिए कृतार्थता का क्षण था|

स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण बाळासाहब को पुणे के रुबी अस्पताल में दाख़िल किया गया| १५ जून १९९६ को उनका स्वास्थ्य और भी बिगड़ गया| बाळासाहब के भॉंजे डॉ. हर्षवर्धन मार्डीकर तथा उनकी पत्नी डॉ. मंजूषा मार्डीकर, अन्य डॉक्टरों के साथ हर संभव प्रयास कर रहे थे| लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी| १७ जून को रात के आठ बजकर दस मिनट पर बाळासाहब की प्राणज्योति अनंत में विलीन हो गयी|

डॉक्टर हेडगेवार और श्रीगुरुजी से मिलने बाळासाहब की आत्मा शरीर त्यागकर चली गयी थी| क्या विचित्र संजोग है देखिए! डॉक्टर हेडगेवार ने २१ जून १९४० को इस दुनिया से विदा ली| श्रीगुरुजी ५ जून १९७३ को अनंत में विलीन हो गये और बाळासाहब ने १७ जून को देह त्याग दिया|

तीन सरसंघचालकों ने संघ को स्तर पर लाकर रखा| आज ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ यह दुनिया का सबसे बड़ा संगठन बन चुका है| ‘स्वयंसेवकों को चाहिए कि वे कभी भी अपने कार्य पर संतुष्ट न रहें| निरन्तर कार्य को बढ़ाते रहने का ध्यास कभी भी छोड़ न दें| राष्ट्र को परमवैभव प्राप्त करा दिये बग़ैर हमारा कार्य पूरा नहीं हो सकता’ यह संघ का संदेश स्वयंसेवक कभी भी भूल नहीं सकेंगे|

(क्रमश:)