५६ . पहली ‘झायॉनिस्ट कॉंग्रेस’

स्वित्झर्लंडस्थित बेसेल में पहली ‘झायोनिस्ट काँग्रेस’ का आयोजन किया गया।

इस प्रकार हर्ट्झ्ल् ने अब झायॉनिझम का प्रसार करने का काम बड़ी ही फ़ुरती से हाथ में लिया| उसने पहले ‘झायॉनिस्ट ऑर्गनायझेशन’ की स्थापना की और इसवीसन १८९७ के अगस्त महीने में स्वित्झर्लंडस्थित बेसेल में पहली ‘झायॉनिस्ट कॉंग्रेस’ का आयोजन किया| विभिन्न देशों से कुल मिलाकर २०० से भी अधिक निमंत्रितों ने कॉंग्रेस में हिस्सा लिया था| दुनियाभर के अग्रसर मीड़िया के कुछ प्रतिनिधि भी इस कॉंग्रेस में उपस्थित थे|

इस कॉंग्रेस में – ‘ज्यूधर्मियों को हक़ का घर प्रदान करनेवाले ज्युइश राष्ट्र का निर्माण पॅलेस्टाईन की भूमि में ही करने का’ प्रस्ताव मंज़ूर किया गया| ज्यूधर्मीय किसान-कारीगर-व्यापारी इन्हें पॅलेस्टाईन में बसने के लिए सहायता करना; ज्यूधर्मियों की एकता; उनका ऐतिहासिक पॅलेस्टाईन के साथ और जेरुसलेम के साथ होनेवाला रिश्ता; सभी देशों से ज्यूधर्मियों का जेरुसलेम लौटना और इन विभिन्न पार्श्‍वभूमियों में से आये ज्यूधर्मियों द्वारा एक-दूसरे का सम्मान किया जाकर, उनका बतौर ‘केवल ज्यूधर्मीय’ मुख्य धारा में एकत्रित हो जाना; इस नये राष्ट्र को ज्युइश, झायोनिस्ट, जनतन्त्रवादी समर्थ राष्ट्र बनाना, ऐसा राष्ट्र जो जागतिक शांति के लिए प्रयास करेगा; हिब्रू भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना; इस्रायल में लौटे लोगों के सुरक्षित भविष्य के लिए और उनका अनोखापन अबाधित रखने के लिए अगली पीढ़ियों को ज्युइश एवं झायोनिस्ट मूल्यों की शिक्षा हिब्रू भाषा में प्रदान की जाना; इस्रायल को व्यवहारिक झायॉनिझम का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण बनाना; ऐसे अनेकविध मुद्दों की चर्चा इस कॉंग्रेस में की गयी थी|

रेवरंड विल्यम हेकलर

ज्यूधर्मीय पुनः जेरुसलेम लौटें, इस हेतु से जो प्रयास विस्कळित रूप में हो रहे थे, वे अब निश्‍चित दिशा में होने की शुरुआत हो गयी थी| अब तक केवल धार्मिक महत्त्व होने के कारण ज्यूधर्मीय जेरुसलेम लौटें ऐसा आग्रह किया जा रहा था, उसे अब सामाजिक और राजकीय महत्त्व भी प्राप्त हुआ था|

(आगे चलकर विश्‍लेषकों ने इस झायॉनिझम का भी ‘रिलिजस झायॉनिझम’ और ‘पॉलिटिकल झायॉनिझम’ ऐसे कई प्रकारों में वर्गीकरण किया| ‘हर ज्यूधर्मीय आजन्म कट्टरतापूर्वक ज्यूधर्मतत्त्वों का पालन करें’ यह ‘धार्मिक झायॉनिझम’ (‘रिलिजस झायॉनिझम’) और ‘पॅलेस्टाईन की भूमि में ज्यूधर्मियों की बहुसंख्या होनेवाले स्वतंत्र ज्युईश राष्ट्र का निर्माण कर दुनियाभर के ज्यूधर्मीय उसमें एकत्रित रूप में निवास करें’ यह ‘राजकीय झायॉनिझम’ (‘पोलिटिकल झायॉनिझम’) ऐसा उसका मोटे तौर पर वर्गीकरण किया जा सकता है|)

इस कॉंग्रेस के बाद हर्ट्झ्ल् ने अपनी डायरी में लिखा था – ‘आज मैंने ज्युइश राष्ट्र की स्थापना की है| लेकिन आज मैं यह ज़ाहिर रूप में नहीं बोलूँगा| क्योंकि आज यदि मैंने यह ज़ाहिर रूप में कहा, तो यक़ीनन ही मैं जागतिक मज़ाक का विषय बन जाऊँगा| लेकिन शायद अगले ५ सालों में और ५० सालों में तो यक़ीनन ही मेरे इस वाक्य की सत्यता को दुनिया ने क़बूल की होगी|’

इस झायॉनिस्ट कॉंग्रेस में ज्यूधर्मियों के साथ ही, झायॉनिझम के उद्देश को सहाय्यभूत साबित होंगे ऐसा लगनेवाले कुछ अन्यधर्मीय भी निमंत्रित थे| झायॉनिस्ट कॉंग्रेस को अन्यधर्मीय लोगों को निमंत्रण देने के लिए हर्ट्झ्ल् की आलोचना भी की गयी| लेकिन हर्ट्झ्ल् का अँदाज़ा सही निकला| उसने नियोजनपूर्वक निमंत्रित किये हुए इन लोगों की, झायॉनिझम आंदोलन आगे ले जाने की दृष्टि से काफ़ी मदद हुई|

पूर्व आफ़्रिका का ब्रिटीश उपनिवेश होनेवाले युगांडा में ब्रिटिशों ने ज्यूधर्मियों के लिए निवास हेतु आरक्षित जगह देने का प्रस्ताव रखा।

ख़ासकर इन निमंत्रितों में से रेव्ह. विल्यम हॅकलर नामक एक धर्मोपदेशक हर्ट्झ्ल् की विचारधारा से प्रभावित होकर उनके दोस्त बन गये थे, जिन्होंने झायॉनिझम आंदोलन के लिए ठोस पूरक कार्य किया| इन हेकलर की मध्यस्थता से ही हर्ट्झ्ल्, अगले साल जेरुसलेम के दौरे पर आये तत्कालीन जर्मन सम्राट विल्हेम कैसर (द्वितीय) से मुलाक़ात कर अपनी झायॉनिझम की संकल्पना को उसके सामने पेश कर सके थे| लेकिन कैसर को हर्ट्झ्ल् के झायॉनिझम से या ज्यूधर्मियों की समस्या से कुछ भी लेनादेना नहीं था| अतः इस दृष्टि से इस मुलाक़ात का कुछ ख़ास उपयोग न हो सका| लेकिन जागतिक प्रसारमाध्यमों में इस मुलाक़ात की अच्छीख़ासी चर्चा होने के कारण, हर्ट्झ्ल् जिस झायॉनिझम की संकल्पना को प्रतिपादित कर रहा था, उसकी ओर दुनिया का ध्यान खींचा गया|

इन प्रयासों के परिणामस्वरूप इसवीसन १९०३ में हर्ट्झ्ल् को इंग्लैंड़ में इस विषय में बिठायी गयी एक रिसर्च-कमिटी (‘ब्रिटीश रॉयल कमिशन’) के समक्ष निवेदन के लिए बुलाया गया, जहॉं पर हर्ट्झ्ल् ने झायॉनिझम की संकल्पना प्रस्तुत की| उसी के साथ इस इंग्लैंड़ दौरे में, तत्कालीन ब्रिटीश सरकार के कई उच्चपदस्थों के साथ उनकी दोस्ती हो गयी| हर्ट्झ्ल् की संकल्पना को तत्त्वतः मंज़ूर करते हुए, लेकिन उसमें थोड़ासा बदलाव करके ब्रिटीश सरकार ने उन्हें, उस समय ब्रिटीश उपनिवेश होनेवाले पूर्व आफ्रिका के युगांडा में ज्यूधर्मियों के लिए आरक्षित जगह देने का प्रस्ताव रखा; जो हालॉंकि ब्रिटीश उपनिवेश था, उसमें ज्यूधर्मियों की स्वायत्त सरकार होनेवाली थी|

उस दौर में पूर्व युरोप में वांशिक भेदभाव का कड़ा मुक़ाबला करना पड़ रहे युरोपीय ज्यूधर्मियों के निवास का अस्थायी रूप में ही सही, लेकिन प्रबंध होने हेतु, इस ब्रिटीश ऑफर का स्वीकार किया जाये, ऐसा हर्ट्झ्ल् को लग रहा था| लेकिन उसी दौरान जुलाई में दिल का दौरा पड़ने से हर्ट्झ्ल् की मृत्यु हो गयी| उसके बाद इसवीसन १९०६ में आयोजित छठीं ‘झायॉनिस्ट कॉंग्रेस’ में, अब स्वतंत्र और सार्वभौेम ज्यू-राष्ट्र की – इस्रायल की स्थापना के अलावा अन्य कुछ भी समझौता मंज़ूर न होनेवाली झायॉनिस्ट ऑर्गनायझेशन ने इस ब्रिटीश ऑफर को ठुकरा दिया|

हर्ट्झ्ल् हालॉंकि इस्रायल राष्ट्र की स्थापना नहीं देख सके, लेकिन उन्होंने ही डाली नींव पर अगले प्रयास आधारित होने के कारण, इस्रायल के इतिहास में हर्ट्झ्ल् का नाम हमेशा के लिए अंकित किया गया है| अपनी स्वतंत्रता को उद्घोषित करनेवाले इस्रायल के घोषणापत्र में भी हर्ट्झ्ल् को अधिकृत रूप में – ‘इस ज्युइश राष्ट्र के आध्यात्मिक जनक’ (‘स्पिरिच्युअल फादर ऑफ द ज्युइश स्टेट’) ऐसा संबोधित कर सम्मान का स्थान दिया गया है|

यंग टर्क्स रेव्हॉल्युशन

हर्ट्झ्ल् हालॉंकि इस कार्य को अधूरा छोड़ गये थे, उन्होंने लगाया पौधा तेज़ी से बढ़ने लगा था| ‘झायॉनिझम’ की संकल्पना को अधिक से अधिक ज्यूधर्मियों को मान्य होने लगी थी और जागतिक समुदाय को भी!

उसी के साथ ज्यूराष्ट्र की संकल्पना के लिए सहायकारी साबित होनेवालीं और भी कई घटनाएँ अब घटित होने लगी थीं| इस दौरान, पॅलेस्टाईन प्रांत जिसका हिस्सा था, वह ऑटोमन साम्राज्य भी पतन की कगार पर था| मुख्य बात, वहॉं पर भी ऑटोमन सुलतानी राजपाट का त़ख्ता पलटकर उसके स्थान पर जनतन्त्र लाने की नयी हवाएँ बहने लगी थीं| राजेशाही के खिलाफ़ के ‘युवा तुर्कों के’ विद्रोह (‘यंग टर्क्स रिव्हॉल्युशन’) ने तत्कालीन सुलतान की राजसत्ता डॉंवाडोल कर दी थी| ज़ाहिर है, ऑटोमन साम्राज्य के प्रदेशों पर ब्रिटीश आदि साम्राज्यों की नज़र थी|

तभी इसवीसन १९१४ में पहला विश्‍वयुद्ध शुरू हुआ….(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर