विक्रमसिंघे दुबारा श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने; चीन को बडा झटका मिलने का विश्‍लेषकों का दावा

कोलंबो – भली भांती ५१ दिन के सियासी ड्रामा के बाद रानील विक्रमसिंघे फिर से श्रीलंका के प्रधानमंत्री हुए है| यह मेरी जीत नही है, बल्कि श्रीलंका की लोकतंत्र की जीत है, यह प्रतिक्रिया विक्रमसिंघे इन्होंने दी है| साथ ही राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना इनके साथ हुए सियासी मतभेद दूर करके सहयोग करने की घोषणा भी प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे इन्होंने की है| विक्रमसिंघे इन्हे प्राप्त हुई सफलता यानी चीन के लिए बहुत बडा सामरिक झटका है, यह विश्‍लेषकों का कहना है|

चीनचे समर्थक के तौर पर पहचाने जा रहे श्रीलंका के नेता महिंदा राजपक्षे इन्हें यकायक प्रधानमंत्री पद की शपथ देकर राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना इन्होंने श्रीलंका में सियासी झंझावात लाया था| अपने राजनीतिक स्वार्थ के खातिर राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना इन्होंने यह निर्णय किया और यह निर्णया घटनाबाह्य है, यह आरोप हो रहे थे| श्रीलंका में लोकतंत्रवादी जनता इस निर्णय के खिलाफ रास्ते पर उतरी थी| तभी प्रधानमंत्री बने राजपक्षे इन्होंने अपनी सत्ता बरकरार करने के लिए सभी स्तर पर कडी कोशिष की| लेकिन श्रीलंका की यंत्रणा ने उनके आदेशों का पालन करने से इन्कार किया था| साथ ही विक्रमसिंघ इन्होंने प्रधानमंंत्री का अधिकृत निवास छोडने से मना किया था|

राजपक्षे इन्हे चीन का समर्थन प्राप्त था?और उसी बलबुते पर उन्होंने श्रीलंका की सत्ता हथियाने की कोशिष की, यह आरोप हो रहे थे| चीन ने भी झटके में राजपक्षे प्रधानमंत्री होने के बाद उनका स्वागत किया था| तो, भारत, अमरिका के साथ अन्य पश्‍चिमी देशों ने श्रीलंका में लोकतंत्र पर आघात ना हो यह भूमिका अपनाई थी| इसका बडा दबाव राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना पर बना था| श्रीलंकन संसद के अधिवेशन में प्रधानमंत्री बने राजपक्षे बहुमत सिद्ध नही कर सके| इसके अलावा उनका प्रधानमंत्री होना अवैध है, यह फैसला श्रीलंका की अदालत ने सुनाया था| इस वजह से राजपक्षे इन्हें प्रधानमंत्री पद त्यागना पडा|

५१ दिन बाद रानील विक्रमसिंघे ने दुबारा श्रीलंका के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की| विक्रमसिंघे इनकी ‘यूएनपी’ ने फिर से राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना के साथ सहयोग करने की तैयारी दिखाई है| इसके पहले एक गुट ने सिरिसेना को गुमराह करने से ही श्रीलंका में यह उथल पुथल हुई, लेकिन आखिरकार सत्य की जीत हुई, यह दावा भी ‘यूएनपी’ ने किया| इस दौरान श्रीलंका की संसद में बहुमत सिद्ध करने में विफल रहे राजपक्षे के लिए यह बडा राजनीतिक झटका है| उसी समय उन्हें सत्ता हथियाने के लिए संपूर्ण सहायता करनेवाले चीन के लिए भी यह बडा सामरिक झटका है, यह माना जा रहा है|

श्रीलंका का हंबंटोटा बंदरगाह कब्जे में करके चीन ने इस देश को वर्चस्व में रखने के लिए योजना से कोशिष की थी| इसके लिए महिंदा राजपक्षे के दौर में चीन ने श्रीलंका को बडी रकम का कर्ज दिया था| लेकिन राजपक्षे के पराभव से चीन ने किया यह निवेश बेकार साबित होने की आशंका बनी है| राष्ट्राध्यक्ष सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानील विक्रमसिंघ इनकी नेतृत्त्व में श्रीलंका ने भारत के साथ बने संबंध और भी पुख्ता करने के लिए कदम बढाए थे| इस वजह से बेचैन हुए चीन ने राजपक्षे के द्वारा श्रीलंका में सत्ता बदलने का षडयंत्र किया था|

यह षडयंत्र उधेडा गया है और श्रीलंका दुबारा लोकतंत्र की राह पर चल रहा है, यह स्पष्ट हुआ है| उसी समय श्रीलंका का लोकतंत्र पूरी तरह से चीन के विरोध में गया है, यह भी इस अवसर से सामने आ रहा है|