श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०८

एवं च पावन साईचरित्र। वाची तयाचें पावन वक्त्र। श्रोतयांचे पावन श्रोत्र। होईल पवित्र अंतरंग॥ साईसच्चरित के वाचन एवं श्रवण से मनुष्य का वक्त्र एवं श्रोत किस तरह से पावन बनते हैं यह तो हमने देख लिया; परन्तु इसके साथ ही और एक बात हेमाडपंत बता रहे हैं कि इससे अंतरंग पवित्र होगा। अंतरंग इस शब्द […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०६

काल के भी शास्ता रहने वाले सद्गुरु श्रीसाईनाथ के चरित्र का एक भी शब्द कालबाह्य नहीं है, बल्कि वह हर एक काल में उतनी ही सच्चाई के साथ अपने स्थान पर स्थिर है और इसीलिए श्रीसाईसच्चरित का हर एक शब्द, काल की स्थिति चाहे जैसी भी हो, मग़र फिर भी वह शब्द हर एक जीव […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०५

एक दिन दोपहर की आरती के पश्‍चात् साईबाबा ने भक्तों से क्या कहा, इसी के संबंध हेमाडपंत ने हमें इस अध्याय की कुछ ओवियों में बताया है। हम सभी के लिए बाबा का हर एक शब्द (बोल) मौलिक मार्गदर्शन करनेवाला होने के कारण हमें उनके बोलों को अपने हृदय में अंकित करके रखना चाहिए। लगभग […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०४

‘‘आप कहीं भी कुछ भी करते हैं, उन सभी बातों की खबर मुझे उसी क्षण लग जाती है।’’ हमने बाबा के इस वचन का अभ्यास विस्तारपूर्वक किया है। इससे एक बात तो साफ है कि मुझे कोई भी कार्य करते समय उसे सोच-समझकर न्यायसंगत रूप से करना चाहिए और सदैव सावधान रहने की एवं सतर्क […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०३

‘तुम कहीं भी कुछ भी करो, परन्तु इतना सदैव स्मरण रहे कि तुम्हारी कृतियों की पूरी की पूरी खबर ‘मुझे’ तत्क्षण मिलती ही रहती है।’ यह कहने के पश्‍चात् बाबा आगे ‘ऐसा मैं’ कौन हूँ यह भी स्पष्टरूप में बतलाते हैं। यहाँ पर निदर्शित जो ‘मैं’ हूँ। वह हूँ सभी का अन्तर्यामी। वही हूँ मैं […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०२

साईबाबा को हमारी हर एक कृति की इत्थंभूत (पूरी की पूरी) खबर निरंतर कैसे लगती रहती है, यह हमने चोलकरजी की कथा के आधार से संक्षिप्त रूप में जान लिया। १) चोलकरजी के द्वारा की गई मन्नत गुप्त थी; मग़र फिर भी उसकी खबर बाबा को चल ही गई और वह भी तुरंत ही। २) […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०१

श्रीसाईसच्चरित यह एक ऐसा सुंदर ग्रंथ है, जिसमें से एक पंक्ति भी यदि हृदय में धारण कर ली जाए, तब भी मनुष्य का समग्र जीवनविकास बड़ी सहजता से हो सकता है। इसमें की हर एक पंक्ति यह साक्षात् सद्गुरु साईनाथजी ही हैं। बाबा ही इस ग्रंथ की हर एक पंक्ति में प्रत्यक्ष रूप में प्रकट […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१००

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१००

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईबाबा के इन वचनों का अर्थ हमने पिछले लेख में देखा है और उनका अध्ययन भी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९९

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईबाबा के इन बोलों का अनुभव श्रीसाईसच्चरित में जगह-जगह पर हमें मिलता रहता है। सर्वप्रथम अनुभव […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९८

बाबा बारंबार हमसे यही कहते हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच की तर्क-कुर्तकी की जो दीवार है, उसे गिरा दो और देखो कि एक-दूसरे से मिलने का मार्ग किस तरह प्रशस्त होता है। दीवारें, मुखौटे आदि निर्माण करके हम क्या प्राप्त करते हैं? बाबा नहीं जानते ऐसा कुछ भी नहीं है, यह जानते हुए भी […]

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