श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १६)

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १६)

भारतीय अध्यात्मशास्त्र कभी भी किसी भी मनुष्य को खोखला वैराग्य नहीं सिखाता, बल्कि गृहस्थी में रहकर परमार्थ कैसे करना चाहिए यही सिखाता है। भक्ति करना यानी बाकी के सारे काम-काज छोड़कर व्यर्थ की डिंगें हॉंकते हुए माथा-पच्छी करना यह जो एक दृष्टिकोण है, उसे इस गेहूँ पीसनेवाली कथा के माध्यम से ही पूर्ण रूप में […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १५) उद्धरेत् आत्मना आत्मानम्

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १५) उद्धरेत् आत्मना आत्मानम्

महामारी का निर्दलन करने में साईनाथजी तो समर्थ हैं ही, मुद्दा यह है कि मुझे इस कथा से क्या सीखना चाहिए? मुझे यह सीखना चाहिए कि मन के सारे संकल्प-विकल्प छोडकर यह मेरा साईनाथ ही सत्य संकल्पप्रभु है, इस दृढ़ विश्वास के साथ साईबाबा के कार्य में अपनी पूर्ण क्षमता के अनुसार मुझे शामिल हो […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १४) साईसच्चरित-नदी का उद्गम

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १४) साईसच्चरित-नदी का उद्गम

हेमाडपंतजी कहते हैं कि यह गेहूँ पीसने की लीला बाबा ने मेरे जीवन में घटित कर इस साईसच्चरित को प्रकट करवाया। मेरे जीवन में बाबा ने जॉंते के दोनों पत्थरों को सक्रिय कर दिया, नीचेवाला पत्थर यानी श्रद्धा और ऊपरवाला पत्थर यानी सबूरी इन दोनों को सदैव कार्यरत करनेवाले मेरे बाबा ही हैं। इन पत्थरों […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १३) सत्यसंकल्प के स्वामी साईनाथजी

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १३) सत्यसंकल्प के स्वामी साईनाथजी

एके दिवशी सकाळी जाण। बाबा करोनि दंतधावन। सारोनि मुखप्रक्षाळण। मांडू दळण आरंभिले॥ – श्रीसाईसच्चरित एक दिन प्रात:काल में साईबाबा दंतधावन एवं मुखप्रक्षालन करके महीन आटा पीसने लगे। हेमाडपंत प्रथम अध्याय के आरंभ में ही हमें सतर्क कर रहे हैं कि ये सहजसिद्ध साईनाथ कैसे हैं, उन्हें ठीक से जान लो। महामारी का विनाश करने के […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १२) साईनाथ जी ने चक्की में पीस डाला महामारी को

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग १२) साईनाथ जी ने चक्की में पीस डाला महामारी को

शिरडी के लोग महामारी के संभाव्य संकट के कारण घबरा गए थे, गॉंव के हर एक मनुष्य के मन में यह अशांति भय के कारण ही आई थी। हमारे मन के गॉंव का क्या? मन-गॉंव के हर घर में यानी मन के हर कोने में अन्य जन्तुओं का प्रवेश उस मात्रा में नहीं होता, जितनी […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ११) मन की चार साईनिष्ठ वृत्तियाँ

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ११) मन की चार साईनिष्ठ वृत्तियाँ

‘महीन’ आटे की जगह ‘खुरदरा’ आटा पीसा जाने के बावजूद भी बाबा ने महामारी का उच्चाटन करके गॉंव को एक बहुत बड़ी आपत्ति से बचाया, इसका अध्ययन हमने किया। यही बाबा का ‘कौशल’ है, इस बात की जानकारी हेमाडपंत ने हमें बड़ी ख़ूबसुरती से दी है । महीन आटे के स्थान पर मोटा खुरदरा आटा […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ८) फलाशाविरहित कर्म

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ८) फलाशाविरहित कर्म

हमने भक्ति की आसान पगडंडी माने जानेवाले श्रीसाईसच्चरितरूपी सेतु का अध्ययन किया। ‘बाबा के चरणों तक पहुँचानेवाली राह’ इस दृष्टि से यहाँ पर पगडंडी इस शब्द का उपयोग किया गया है। सद्गुरुकथानुस्मरण की इस सेतुरूपी पगडंडी पर से प्रेमप्रवास करते हुए हम सूखे चरणों भव से पार हो जायेंगे। निश्चित ही, १०८% प्रतिशत! यह विश्वास […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ७)

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ७)

भक्ति के ऐसे अनेक लक्षण। एक से बढ़कर एक विलक्षण । हम सिर्फ गुरुकथानुस्मरण कर (का अनुसरण कर) । सुखे पैरों(कदमों/चरणों) ही भवसागर तर जायें॥(तर जाये भवसागर) (श्रीसाईसच्चरित १/१०१) ‘गुरुकथानुस्मरण’ यही है वह भक्ति की आसान पगदंडी, जो हेमाडपंत हमें दिखा रहे हैं। इस भवसागर को सूखे कदमों से तर जाने के लिए यही पगदंडी […]

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श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ६) – फलाशा का पूर्णविराम

श्रीसाईसच्चरित अध्याय १ (भाग ६) – फलाशा का पूर्णविराम

फलाशेचा पूर्ण विराम । काम्य त्यागाचें हेंची वर्म। करणे नित्य नैमित्तिक कर्म ।‘शुद्धस्वधर्म’ या नांव॥’ श्रीसाईसच्चरित (१/१००) (फलाशा का पूर्णविराम । काम्यत्याग का यही वर्म। करना नित्यनैमित्तिक कर्म ।‘शुद्ध स्वधर्म’ इसी नाम॥) फलाशा का पूर्ण विराम यही काम्यत्याग का वर्म है अर्थात कर्म का त्याग न करते हुए फलाशा नष्ट करके पूरी दक्षता के साथ […]

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निष्काम कर्मयोग

निष्काम कर्मयोग

फलाशेचा पूर्ण विराम । काम्य त्यागाचें हेंची वर्म। करणे नित्य नैमित्तिक कर्म ।‘शुद्धस्वधर्म’ या नांव॥’ – श्रीसाईसच्चरित (१/१००) (फलाशा का पूर्णविराम । काम्यत्याग का यही वर्म। करना नित्यनैमित्तिक कर्म ।‘शुद्ध स्वधर्म’ इसी नाम॥) फलाशा का पूर्ण विराम यही काम्यत्याग का वर्म है अर्थात कर्म का त्याग न करते हुए फलाशा नष्ट करके पूरी दक्षता के […]

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