श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५३

अण्णा चिंचणीकर ने बाबा से कहा कि हेमाडपंत को नौकरी मिल जाए और उनकी घर-गृहस्थी एवं उनकी दैनिक ज़रूरतों की पूर्ति हो सके, इसके लिए आप ही कुछ कीजिए। अण्णा की इस विनती को सुनकर श्रीसाईनाथ ने हेमाडपंत से कहा ‘अब केवल मेरी ही चाकरी करो; मेरा बस्ता रखो, तुम्हारी झोली सदैव भरी ही रहेगी, […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५२

‘‘जिन लोगों का भगवान पर विश्‍वास नहीं, भगवान के न्यायी होने पर विश्‍वास नहीं, जिन्हें कर्म का अटल सिद्धांत मान्य नहीं, ऐसे नीति-न्याय-नियमों की परवाह न करनेवाले दुराचारियों से सर्वप्रथम दूर रहो।’’ ‘जिनका भगवान पर विश्‍वास न हो, जिन्हें कर्म का अटल सिद्धांत मान्य न हो ऐसे नीतिनियमों को ठुकराकर अपनी मनमानी करनेवाले दुराचारियों का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५१

बाबा ने हेमाडपंत से जो कुछ भी कहा, वह हम सभी के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। हमें कोई भी नौकरी-व्यवसाय आदि करते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखना है कि हम साईनाथ के चाकर हैं। इसी लिए कहीं पर भी नौकरी करते समय वहाँ पर पवित्रता है या नहीं, वहाँ पर परमेश्‍वरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५०

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ५०

हम अपनी क्षमतानुसार, अपने सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी व्यवसाय अथवा नौकरी करते हैं, वह तो हमें करना ही है, परन्तु हमें यह याद रखना चाहिए कि हमें किसी की ‘गुलामी’ नहीं करनी चाहिए। यह बात काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। लौकिक तौर पर हम न्याय, नीति, मर्यादा आदि के अनुसार कोई भी पवित्र व्यवसाय, नौकरी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४९

सन १९१६ की गुरुपूर्णिमा के दिन घटित हुई घटना के बारे में हेमाडपंत हमें बता रहे हैं। गुरुपूर्णिमा का दिन होने के कारण स्वाभाविक बात है कि द्वारकामाई में भक्तों की भारी भीड़ थी। अण्णा चिंचणीकर के साथ वहाँ पर हेमाडपंत भी उपस्थित थे और उसी समय अण्णा चिंचणीकर ने हेमाडपंत की समस्या बाबा के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४८

सन् १९१६ में हेमाडपंतजी सरकारी नौकरी से निवृत्त हो गए और उन्हें पेंशन मिलने लगी, परन्तु गृहस्थी का भार बढ़ जाने से, जो पेंशन उन्हें मिल रही थी, उसमें उनका गुजर-बसर ठीक से नहीं हो रहा था, इसके लिए उपाय ढूँढ़ने में वे सदैव लगे रहते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘जहाँ चाह वहाँ […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४७

तृतीय अध्याय की प्रथम कथा के बारे में हम चर्चा कर रहे हैं। बढ़ रहे परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपनी पेंशन कैसे पूरी पड़ सकती है? मुझे इस जिम्मेदारी को पूरी तरह से निभाने के लिए क्या करना चाहिए, इस बात का विचार सरकारी नौकरी से निवृत्त (रिटायर्ड) होनेवाले हेमाडपंत के […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ४६

तृतीय अध्याय के आरंभिक विभाग में अनेक अप्रतिम पंक्तियाँ हैं। वैसे देखा जाए तो साईसच्चरित की हर एक पंक्ति का ही अपने आप में एक सुंदर महत्त्व है, परन्तु इन पंक्तियों में ‘साईनाथ उवाच’ एवं ‘हेमाडपंत उवाच’ इन दोनों ही प्रकार की पंक्तियों के माध्यम से हमें इस बात का पता चलता है कि साईसच्चरित […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४५

श्री साईनाथ मुझ से अनंत अपरंपार प्रेम करते हैं। यही बात हेमाडपंत हमें बतला रहे हैं। यहाँ पर हेमाडपंत का ‘मैं’ यह केवल एक व्यक्ति से संबंधित न होकर सारे श्रद्धावानों को निर्दिष्ट करनेवाला ‘मैं’ है। धेनु (गाय) – बछड़े का, घन (बादल) – चातक का उदाहरण देकर श्रद्धावानों के प्रति रहनेवाले साईबाबा के प्रेम […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-४४

गृहस्थी और परमार्थ को एकसाथ आसानी से सफल बनाया जा सके, हर कोई अपने जीवनविकास का मार्ग सहजता से प्राप्त कर सके इसके लिए सद्गुरु साईनाथजी का सगुण ध्यान सहजता से जिस पथ से हो सकता है, वह पथ है साईनाथजी की कथाओं का मार्ग श्री साईनाथ ने अपने श्रद्धावानों के लिए श्रीसाईसच्चरित के रूप […]

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