श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७२

पिछले लेख में हमने देखा कि गुणसंकीर्तन करते समय किसी भी विरोधाभास की परवाह किए बगैर ही हमें गुणसंकीर्तन करना चाहिए। इसके साथ ही मेरे सिर पर श्रीसाईनाथ का हाथ है, मुझपर श्रीसाईनाथ की कृपा है इसीलिए मेरे मुख से श्रीसाईनाथ का गुणसंकीर्तन हो रहा है। इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए साईनाथ का […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७१

पुष्टता होना उचित विकास है। वह उन्मत्त होना यह विकृति है। हमारे मन को उन्मत्त नहीं होना है, पुष्टता प्राप्त हो इसके लिए बाबा का चरण पकड़े बगैर अन्य कोई रास्ता ही नहीं। (बाबा के चरणों को पकड़ना यही एकमेव मार्ग है, और कोई अन्य मार्ग नहीं है।) ‘उन्मत्त, मदमस्त हो चुका भैंसा’ बनना है […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७०

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ७०

हम दिन हो या रात, दु:ख हो अथवा सुख चाहे जो भी हो, यदि हम अपने इस साईनाथ का गुणसंकीर्तन करते रहते हैं, ऐसे में हमारे प्रारब्ध का नाश करनेवाली हरिकृपा हमारे जीवन में प्रवेश करती ही है। और हमारे प्रारब्ध का नाश करती ही है। हमारे त्रिविध दु:खों एवं चिंताओं का नाश करती ही […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६९

रोहिले की कथा के आधार पर हम विस्तारपूर्वक अध्ययन कर रहे हैं। श्रीसाईनाथ भगवान के भक्तिसेवा पथ पर चलने के लिए मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अब तक हमने तीन मुद्दों पर अध्ययन किया। १) शिरडी में उत्कटतापूर्वक जाना चाहिए २) बाबा के गुणों से मोहित होकर ही वहाँ जाना चाहिए ३) बाबा […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६८

पिछले लेख में हमने देखा कि बाबा के गुणों से मोहित होकर मुझे शिरडी में आना चाहिए और श्रीसाईनाथ का गुणसंकीर्तन करना चाहिए, इस क्रिया का अध्ययन किया। बाबा के चमत्कार से, बाबा पैसे बाँटते हैं इसीलिए मोहित न होकर हमें बाबा के गुणों से मोहित होना चाहिए। हमें यदि मोह करना ही है तो […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६७

रोहिले की कथा से बोध लेकर हमें कैसा आचरन करना चाहिए, इस बात पर गौर करते समय हमने सर्वप्रथम रोहिले की क्रिया का अर्थात शिरडी में आनेवाली क्रिया से संबंधित अध्ययन किया। उत्कटतारूपी प्रथम कदम श्रीसाईनाथ की, शिरडी में अर्थात भगवान की भक्ति में हमें रखना चाहिए यह हमने देखा। शिरडी में आया एक रोहिला। […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६६

पिछले लेख में हमने रोहिले की कथा के आधार पर अनेक रूपकों का अध्ययन करके बोध प्राप्त किया। रोहिला एवं रोहिली इन दोनों किरदारों का परिचय प्राप्त कर इन किरदारों का हमारे जीवन में क्या स्थान है। इस बात की जानकारी भी हासिल की। रोहिला – मनुष्य का मन शिरडी – भक्तिरूपी भूमि साईनाथ – […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६५

रोहिले की कथा के बारे में हम विस्तारपूर्वक चर्चा कर रहे हैं। इस अध्याय में ही और वह भी हेमाडपंत के एक अनुभव के पश्‍चात् इस कथा को लिखने के पिछे हेमाडपंत का क्या उद्देश्य है? हेमाडपंत को सेवानिवृत्त होने के पश्‍चात् यह चिंता सताने लगी कि अब अपने परिवार का एवं अपना गुजर-बसर कैसे […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६४

जिसे हरिनाम का आलस। बाबा उससे दूर ही रहते। कहते व्यर्थ ही क्यों रोहिले से परेशान होते हो। भजन में मग्न जो रहता सदा॥ जयासी हरिनामाचा कंटाळा। बाबा भीती तयाच्या विटाळा। म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा। भजनीं चाळा जयातें॥ ‘परमात्मा का नामस्मरण’ यह मनुष्य को परमात्मा से जोड़नेवाली एक कड़ी है। मनुष्य को परमात्मा तक ले […]

Read More »

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग- ६३

‘मद्भक्ता यत्र गायंति’। तिष्ठें तेथे मी उन्निद्र स्थितीं। सत्य करावया हे भगवदुक्ति। ऐसी प्रतीति दाविली। (जहाँ पर मेरे भक्त नाम का गायन करते हैं, नाम का सदैव स्मरण करते हैं, वहाँ पर मैं सदैव रहता ही हूँ, यह भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है। साई रूप में अवतार धारण करने पर उस परमात्माने स्वयं की उक्ति […]

Read More »
1 2 3 19