श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९५

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईनाथ के द्वारा स्वमुख से कहे गये शब्दों के अनुसार मनुष्य की हर एक कृति का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९४

कहीं भी रहो कुछ भी करो। इतना मात्र सदैव स्मरण रहेे। कि तुम्हारी इत्थंभूत कृतियों की खबरें। निरंतर मुझे पता चलती रहती हैेे॥ (कुठेंही असा कांहींही करा । एवढें पूर्ण सदैव स्मरा । कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥) बाबा के मुख से निकले ये वचन हैं हर किसी को ध्यान में रखना […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९३

………कोई कही भी रहे, कुछ भी करता रहे, फिर भी उसके हर एक कृति की इत्थंभूत जानकारी बाबा को त्वरीत ही मिल जाती है। इस बात का जिसे निरंतर स्मरण रहता है, वह श्रद्धावान होता है। एक दिन मध्यान्ह आरती हो जाने के पश्‍चात् बाबा के मुख से जो वचनावली निकली, उसके संबंध में हेमाडपंत […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९२

रूखी सूखी माँगकर खाता। अन्यथा भूखे पेटही रहता। ऐसे रोहिले की कैसी पत्नी। कैसे वह जाती बाबा के पास॥ रोहिले के पास फूटी कौड़ी भी न थी। फिर कैसी पत्नी कैसी शादी। बाबा बालब्रह्मचारी। कथा यह सारी काल्पनिक॥ (ओलें कोरडें मागूनि खाईल। नातरी उपाशीही राहील। तया रोहिल्यासी कैंची बाईल। कोठूनि जाईल बाबांशी॥ रोहिला कफल्लक दिडकीस […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९१

रोहिले की कथा के अनेक पहलुओं पर हमने विचार किया और कुछ यदि मेरी समझ में नहीं भी आया तब भी ईश्‍वर का गुणसंकीर्तन निरंतर करते रहना ही हमारे लिए परमहितकारी है, परम श्रेयस्कर है, इतनी बात भी यदि हम ध्यान में रख लेते हैं तब भी काफ़ी है। क्योंकि यहीं पर हमें पता चलता […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९०

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९०

रोहिले से सीखने जैसा और भी एक महत्त्वपूर्ण अर्थात ‘कौन क्या कहेगा’ इस बात की परवाह किए बगैर, किसी भी प्रकार की लाज–लज्जा न रखते हुए परमात्मा का गुणसंकीर्तन ‘मुझे जैसे आता है वैसे’ करते रहना। यह रोहिला कौन क्या कहेगा, मेरी आवाज सुनकर कोई हँसेगा अथवा मैं उलटे–सीधे गुणसंकीर्तन करता हूँ इसीलिए कोई मेरा […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८९

रोहिले की कथा का भावार्थ हमने अब तक अनेकों लेखों के द्वारा देखा। रोहिले की कथा से हर एक मनुष्य को क्या सीख लेनी चाहिए इस बात पर यदि हम सभीने विचार करना शुरु कर दिया तब हमें पता चलेगा कि इस रोहिले की कथा से हम जैसों को सीखने के लिए अनेक बातें हैं। […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८८

रोहिले की कथा द्वारा साईनाथ हमारे जीवन में कर्ता के रूप में उन्निद्र स्थिति में सदैव रहें इसके लिए हमें क्या करना चाहिए इस बात का बोध हमने हासिल किया। गुणसंकीर्तन करनेवाले भक्त के जीवन में ये साईनाथ सदैव उन्निद्र स्थिति में होते ही हैं। इस बात का अध्ययन हमने बाबा की गँवाही द्वारा किया। […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८७

शिरडी में आनेवाले रोहिले के आचरणद्वारा मुझे अपने-आप में क्या बदलाव करना चाहिए और इसके लिए सर्वप्रथम स्वयं अपना आत्मनिरिक्षण करना चाहिए इससे संबंधित पिछले लेख में हमने संक्षिप्त में चर्चा की थी। मैं भी अकसर यही चाहता हूँ कि मैं भी बाबा का प्रिय बनकर रहूँ। बाबा को मेरा आचरण अच्छा लगे और इसके […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-८६

पिछले अध्याय में हमने रोहिले की कथाद्वारा भक्तिमार्ग का मार्गक्रमण करनेवाले भक्त के मन में चलनेवाले सत्त्व, रज एवं तम इन तीन गुणों के खेल से संबंधित अध्ययन किया। सत्वगुण रोहिले ने अधिकाधिक जोरदार रूप में गुणसंकीर्तन करते रहना यही रजोगुणी शिकायत करनेवाले ग्रामवासी एवं तमोगुणी रोहिली को पछाड़ने का उपाय है। साईनाथ को प्रिय […]

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