श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०१

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१०१

श्रीसाईसच्चरित यह एक ऐसा सुंदर ग्रंथ है, जिसमें से एक पंक्ति भी यदि हृदय में धारण कर ली जाए, तब भी मनुष्य का समग्र जीवनविकास बड़ी सहजता से हो सकता है। इसमें की हर एक पंक्ति यह साक्षात् सद्गुरु साईनाथजी ही हैं। बाबा ही इस ग्रंथ की हर एक पंक्ति में प्रत्यक्ष रूप में प्रकट […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१००

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-१००

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईबाबा के इन वचनों का अर्थ हमने पिछले लेख में देखा है और उनका अध्ययन भी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९९

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९९

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईबाबा के इन बोलों का अनुभव श्रीसाईसच्चरित में जगह-जगह पर हमें मिलता रहता है। सर्वप्रथम अनुभव […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९८

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९८

बाबा बारंबार हमसे यही कहते हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच की तर्क-कुर्तकी की जो दीवार है, उसे गिरा दो और देखो कि एक-दूसरे से मिलने का मार्ग किस तरह प्रशस्त होता है। दीवारें, मुखौटे आदि निर्माण करके हम क्या प्राप्त करते हैं? बाबा नहीं जानते ऐसा कुछ भी नहीं है, यह जानते हुए भी […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९७

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९७

पिछले लेख में हमने अभ्यास किया कि सर्वप्रथम इन पंक्तियों को हमें अपने जीवन में कैसे उतारना है। मेरा आचरण मर्यादाशील कैसे हो सकता है, इस संबंध में ये पंक्तियाँ मुझे मार्गदर्शन करती हैं। बाबा को मेरी हर एक कृति की पूरी की पूरी खबर रहती ही है, इस बात का यहाँ पर मुझे पता […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९६

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९६

श्रीसाईनाथ सब कुछ जानते हैं, इस बात का स्मरण सदैव रखने से ही श्रीसाईनाथ का स्मरण अपने-आप ही सदैव बना रहेगा। बाबा सदैव मेरे साथ हैं ही, इस बात का स्मरण ही फिर भक्त के लिए कर्मस्वातंत्र्य का उचित उपयोग करनेवाला साबित होता है और भक्त को निर्भयता भी प्रदान करता है। साईनाथ सभी लोगों […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९५

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९५

कुठेंही असा कांहींही करा। एवढें पूर्ण सदैव स्मरा। कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥ (कहीं भी रहना, कुछ भी करना। परन्तु सदैव इतना स्मरण रखना। कि तुम्हारी हर एक कृति की खबर। निरंतर मुझे रहती ही है॥) साईनाथ के द्वारा स्वमुख से कहे गये शब्दों के अनुसार मनुष्य की हर एक कृति का […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९४

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९४

कहीं भी रहो कुछ भी करो। इतना मात्र सदैव स्मरण रहेे। कि तुम्हारी इत्थंभूत कृतियों की खबरें। निरंतर मुझे पता चलती रहती हैेे॥ (कुठेंही असा कांहींही करा । एवढें पूर्ण सदैव स्मरा । कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा। मज निरंतरा लागती॥) बाबा के मुख से निकले ये वचन हैं हर किसी को ध्यान में रखना […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९३

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९३

………कोई कही भी रहे, कुछ भी करता रहे, फिर भी उसके हर एक कृति की इत्थंभूत जानकारी बाबा को त्वरीत ही मिल जाती है। इस बात का जिसे निरंतर स्मरण रहता है, वह श्रद्धावान होता है। एक दिन मध्यान्ह आरती हो जाने के पश्‍चात् बाबा के मुख से जो वचनावली निकली, उसके संबंध में हेमाडपंत […]

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श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९२

श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ : भाग-९२

रूखी सूखी माँगकर खाता। अन्यथा भूखे पेटही रहता। ऐसे रोहिले की कैसी पत्नी। कैसे वह जाती बाबा के पास॥ रोहिले के पास फूटी कौड़ी भी न थी। फिर कैसी पत्नी कैसी शादी। बाबा बालब्रह्मचारी। कथा यह सारी काल्पनिक॥ (ओलें कोरडें मागूनि खाईल। नातरी उपाशीही राहील। तया रोहिल्यासी कैंची बाईल। कोठूनि जाईल बाबांशी॥ रोहिला कफल्लक दिडकीस […]

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