श्रीनगर भाग-७

गत कईं ह़फ़्तों से हम श्रीनगर की सैर कर रहे हैं। अब श्रीनगर से इतना लगाव हो चुका है कि यहाँ से लौटने का मन ही नहीं करता।

लेकिन कभी न कभी तो अलविदा कहने की घड़ी आने ही वाली है। उससे पहले हम श्रीनगर के आसपास के कुछ खूबसूरत स्थलों की भी सैर करते हैं।

ये सभी स्थान श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर हैं और यदि हम वहाँ नहीं गये, तो हम वहाँ की स्वर्गीय सुन्दरता के आविष्कारों को देख नहीं पायेंगे।

गुलमर्ग! हिमशिखरों के बीचों बीच बसा हुआ, घास के हरे भरे मैदान जहाँ पर हैं, ऐसा गुलमर्ग। दर असल गुलमर्ग, सोनमर्ग इत्यादि स्थानों का वर्णन शब्दों में करना नामुमक़िन ही है। पुराने ज़माने में यहाँ के चरवाहें गुलमर्ग को ‘गौरीमर्ग’ कहते थे। आगे चलकर गौरीमर्ग का ‘गुलमर्ग’ हो गया।

श्रीनगर, इतिहास, अतुलनिय भारत, गुलमर्ग, जम्मू-कश्मीर, भारत, भाग-७हरे भरे घास के मैदानों में लहराते हुए अनगिनत रंगों के बनफूल और चारों ओर दिखायी देनेवाली बरफ़ीली पहाड़ियाँ, यह नज़ारा गुलमर्ग में प्रवेश करनेवाले सैलानी को तरोताज़ा कर देता है। गुलमर्ग समुद्री सतह से लगभग २५०० मीटर्स से भी अधिक ऊँचाई पर बसा है। जाड़े के दिनों में तो यहाँ पर जहाँ नज़र डालें, वहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ दिखायी देती है। फिर कभी वह आसमान से हो रही हलकी सी फुहार के रूप में दिखायी देती है, कभी घरों के छतों पर जमी हुई दिखायी देती है, तो कभी पहाड़ियों ने ओढ़ी हुई चादर के रूप में।

गुलमर्ग के जाड़ों के मौसम की इस प्राकृतिक स्थिति का उपयोग यहाँ पर बख़ूबी से किया गया है। जाड़ों में यहाँ पर ‘स्किईंग’ नाम का एक खेल खेला जाता है। बर्फ़ पर से रपटने को स्किईंग कहते हैं। गुलमर्ग की पहाड़ियों की ढलान (उतार) पर स्किईंग करने के लिए सैलानी दूर दूर से आते हैं। गुलमर्ग में २०वीं सदी के पूर्वार्ध में ‘स्की क्लब’ की स्थापना की गयी। गुलमर्ग की ख़ासियत यह है कि कोई नौसिखिया भी यहाँ पर बड़ी आसानी से स्कीईंग कर सकता है और उसका लु़फ़्त उठा सकता है। जिन्होंने स्कीईंग की है, वे उसे करने में कितना मज़ा आता है, यह जानते ही होंगे। लेकिन इसके लिए पहाड़ियों की चोटी पर कैसे जाते हैं? इसका जवाब है, गुलमर्ग की केबल कार। गुलमर्ग की यह केबल कार चंद कुछ ही मिनटों में आपको चोटी तक ले जाती है। इस केबल कार का मार्ग और रुकने के स्थान भी निश्‍चित किये गये हैं।

दुनिया का सबसे ऊँचाई पर बसा हुआ हरा भरा गोल्फ का मैदान भी गुलमर्ग में ही है। गुलमर्ग उसकी प्राकृतिक सुन्दरता के साथ साथ ऊपर उल्लेखित खेलों के लिए भी मशहूर है।

‘सोनमर्ग’ और ‘खिलनमर्ग’ भी श्रीनगर से कुछ ही घण्टों की दूरी पर हैं। यहाँ पर जाने की वजह है, ईश्‍वर ने इस सृष्टि को कितने रंगों और गन्धों के माध्यम से सजाया है, उसे महसूस करना। सोनमर्ग और खिलनमर्ग को कुदरत ने मानो सुन्दरता के सारे वरदान ही दे दिये हैं। खिलनमर्ग, सोनमर्ग और गुलमर्ग जानेवाले सैलानी वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता को मन और दृष्टि के कैमेरे में एवं भौतिक कैमेरे के रोल में अंकित करके ही वहाँ से लौटते हैं।

‘पहलगाम’ यह नाम आप ने बहुत बार सुना होगा। कुदरती खूबसूरती का एक अनोखा आविष्कार! इस पहलगाम में छोटे छोटे आठ गाँव बसे हैं। यहीं पर कश्मीर का सबसे पुराना शिवमंदिर है, जिसका निर्माण ५वीं सदी में किया गया था ऐसा कहा जाता है। पहलगाम के आसपास की पहा़डियों पर ट्रेकिंग भी की जाती है और इस पहलगाम से ही यात्री अमरनाथ के लिए रवाना होते हैं।

कश्मीर की पहाड़ियों की चोटियाँ सदियों से साल के बारह महीने बर्फ़ से आच्छादित रहती हैं। पहाड़ियों के बाक़ी के हिस्से पर जमी बर्फ़ गर्मियों में पिघलकर बहने लगती है। कभी वे झरनों के रूप में दिखायी देते हैं; तो कभी झीलों का रूप धारण कर लेते हैं। श्रीनगर और कश्मीर के कई झरनों तथा झीलों के नाम में ‘नाग’ यह शब्द रहता है। जैसे कि कोकरनाग, वेरीनाग, वेस्तरनाग ये कुछ झरनों के नाम हैं; वहीं नीलनाग, अनंतनाग ये कुछ झीलों के नाम हैं।

श्रीनगर की दल यह झील जितनी मशहूर और महत्त्वपूर्ण है; उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं, श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर रहनेवालीं ‘मानसबल’ और ‘वुलर’ ये झीलें।

श्रीनगर से कुछ ही दूरी पर स्थित ‘तुलमुल’ इस गाँव में एक झरना है। इस झरने के पास देवीमाँ का एक मंदिर भी है। यह मंदिर ‘क्षीरभवानी’ का मंदिर इस नाम से मशहूर है। कहा जाता है कि इस झरने के पानी का रंग अपने आप कुदरती करामात से बदलते रहता है। लेकिन इसकी वजह आज भी एक पहेली है।

मानसबल और वुलर ये दो झीलें कईं प्राणियों के, विशेष रूप से मछलियाँ और पंछियों का आश्रयस्थान हैं। इन झीलों में से मानसबल में ॠतुनुसार बड़े बड़े कमल भी खिलते हैं।

अब प्राणियों की बात चली ही है, तो आइए चलते हैं, श्रीनगर के नॅशनल पार्क।

‘दचिगाम नॅशनल पार्क’ इस नाम से मशहूर यह पार्क श्रीनगर से २२ कि.मी. दूर है। ‘दचिगाम’ का अर्थ है दस गाँव। इसके निर्माण के समय इसके आसपास के दस गाँवों का पुनर्वसन किया गया था और इस स्मृति में इसे ‘दचिगाम’ नाम दिया गया है, ऐसा कहते हैं।

साधारणत: पार्क अथवा उद्यान कहने पर एक ही सतह में फैली हुई बाग़ हमारी नज़रों के सामने आ जाती है। लेकिन दचिगाम इसके लिए अपवाद है। दचिगाम पार्क समुद्री सतह से ५५०० फीट से लेकर १४००० फीट की ऊँचाई तक फैला हुआ है। लगभग १४१ स्क्वेअर किलोमीटर्स के विशाल भूप्रदेश पर यह पार्क बसाया गया है।

साडेपाच हज़ार फीट से लेकर चौदह हज़ार फीट की ऊँचाई तक फैला हुआ होने के कारण निर्माण होनेवाली जीवविविधता के अनुसार इस बाग़ के ‘लोअर’और ‘अप्पर’ ऐसे दो विभाग होते हैं।

पहले यह भूभाग कश्मीर के शासकों के अधिपत्य में था। आगे चलकर श्रीनगर शहर को शुद्ध जल की आपूर्ति करने के उद्देश्य से इस विभाग का विस्तार किया गया और अन्त में यह नॅशनल पार्क में रूपान्तरित हो गया।

इस पार्क के निचले विभाग में घास के मैदान, छोटे बड़े पेड़पौधें हैं; वहीं ऊपरि हिस्से में ऊँचें ऊँचें पेड़ों के घने जंगल हैं। इस फ़र्क़ के साथ साथ दोनों स्तरों पर वृक्षों तथा प्राणियों की विभिन्न प्रजातियाँ भी पायी जाती है।

छोटे छोटे रंगबिरंगें बनफूलों से शुरू होनेवाला यह सफ़र ऊँचें ऊँचें चिनार, पोपलर, पाईन इन पेड़ों के जंगल में जा ख़त्म होता है।

हिमालय की पहाड़ियों में लेपर्ड, हिमालयन ब्लॅक बियर, हिमालयन ग्रे लंगूर ये प्राणि तो पाये जाते ही हैं; लेकिन साथ ही सिर्फ़ और सिर्फ़ हिमालय में ही पाये जानेवाले दो प्राणि हैं- ‘कस्तुरीमृग’ और ‘हंगुल’ नाम का कश्मीरी बारहसिंगा।

नामशेष होने की कगार पर होनेवाले इस ‘हंगुल’ नाम के कश्मीरी बारहसिंगेको इस नॅशनलपार्क में सुरक्षित रखा जाने के साथ साथ इस प्रजाति की संख्या में वृद्धि भी हुई है, यह बड़ी खुशी की बात है।

प्राचीन समय से कश्मीर यह शैव मत का एक प्रमुख केंद्र था और यहाँ के शिवमंदिरों में शिवजी की उपासना होती थी। आगे चलकर कश्मीर के शासक बदल गये। यहाँ पर शासन करनेवाले मुग़लों के धर्म का यहाँ प्रसार हुआ।

प्राचीन समय में कश्मीर यह एक प्रमुख शक्तिपीठ भी माना जाता था।

श्रीनगर से अलविदा कहने से पहले आज हम का़ङ्गी सैर कर चुके हैं। चलिए, तो अब कुछ पलों के लिए विश्राम करते हैं और ‘कहावा’ का लु़फ़्त उठाते हैं। गत लेख में इस कहावा का केवल नामनिर्देश ही किया गया था, लेकिन केवल इससे हम कहावा का स्वाद नहीं जान सकते, इसीलिए अब कहावा कैसे बनाया जाता है, यह देखते हैं।

चाय की हरी पत्ती, केसर, दालचिनी, इलायची इन सबको पानी के साथ उबाला जाता है, उसमें फिर शक्कर मिलाकर आख़िर उस में बादाम या अखरोट के टुकड़ें ड़ाले जाते हैं और यह कहावा यानि की कश्मीर की स्पेशल चाय पीने के लिए दी जाती है।

दर असल यह कहावा विशेष दावत, शादी आदि प्रसंगों पर बनाया जाता है। दैनंदिन जीवन में कश्मीर में सोडा और नमक मिलाकर बनायी जानेवाली गुलाबी रंग की ‘नुन चाय’ पी जाती है। कहावा की खासियत यह है कि उसे ‘समोवार’ नाम के पितल के बर्तन में ही बनाया जाता है। समोवार यह पितल का बर्तन यानि की चाय की किटली होती है, लेकिन यह कोयले पर चलनेवाले बंब की छोटी प्रतिकृति होती है। यह कोयले की सहायता से ही अपना काम करती है और उसमें लगे नल से जितना चाहे उतना और गरमा गरम कहावा पीने के लिए दिया जा सकता है।

श्रीनगर से अलविदा कहने के इस मोड़ पर एक हिंदी फ़िल्म का गाना याद आ रहा है। ‘बार बार देखो, हज़ार बार देखो, ये देखने की ………..!’ इस श्रीनगर में हम बार बार जा सकें तो वह अच्छी बात ही है, लेकिन कम से कम एक बार तो वहाँ जाना ही चाहिए। है ना!

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