श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-३१)

साई, आप ही हैं मुझ अंधे की लाठी। आप के होते मुझे किस बात का भय।
लाठी टेंकते-टेंकते पीछे-पीछे। सीधे आसान मार्ग पर चलूँगा मैं ॥

साईबाबा! आप ही मुझ अंधे की लाठी हो तो फिर मुझे व्यर्थ ही मशक्कत करने की, चिंता करने की, भाग-दौड़ करने की ज़रूरत ही क्या है? उसी लाठी का सहारा लेकर, उसे टेकते-टेकते यानी आपके मार्गदर्शन के अनुसार आप ही के पीछे-पीछे मैं चलता रहूँगा। आप मुझे जिस राह से ले चलोगे, वही राह मेरे लिए आसान एवं सरल राह है। हेमाडपंत इस पंक्ति के माध्यम से हम सभी को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात दिग्दर्शित कर रहे हैं। हम सभी भौतिक आँखों के होते हुए भी अंधे ही होते हैं, क्योंकि अपने मन की आँखों को हमने स्वयं ही अपने प्रज्ञापराध के कारण बंद किया होता हैं।

हमारा मन विषयवासना के कारण धृतराष्ट्र के समान अंधा ही बन चुका होता है और वहीं मति भी गांधारी की तरह आँखों पर पट्टी बाँधे रहती है। धृतराष्ट्र का आसक्ति के कारण अंधा बन जाता है, उसी तरह हमारा मन विकारों, मोहपाश में अंधा हो चुका होता है और इसी कारण मति भी आँखें होते हुए भी आँखों पर पट्टी बाँध लेती है। इसके बाद हमारे जीवन में अंहकार, विकार, षड्रिपु, संशय आदि कौरवों को रास्ता साफ़ मिल जाता है और वे सभी स्तरों पर सिर उठाने लगते हैं। पंचप्राणरूपी पांडवों की शक्ति कहलानेवाली बुद्धिरूपी द्रौपदी का ही वे भरी सभा में वस्त्रहरण करने लगते हैं और इसी कारण हमारा जीवन शोक में डूब जाता है। इसके लिए करना यह होता है कि ‘हम अंधे हैं’ इस बात का अहसास होते ही सर्वप्रथम हमें श्री साईनाथ की ही शरण में जाना चाहिए।

मेरे जीवन में कौरवों का कोलाहल न होने पाये, बल्कि जीवन में गोकुल का ही भरा-पूरा अस्तित्व बना रहे इसके लिए श्रीसाईसच्चरित की इस ओवी के अनुसार साईनाथ की शरण लेने के अलावा अन्य कोई राह ही नहीं है। हेमाडपंत कहेनुसार निम्नलिखित मुद्दों को अपने आचरण में लाकर स्वयं का विकास साध्य कर लेना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।

साईबाबा, श्रीसाईसच्चरित, सद्गुरु, साईनाथ, हेमाडपंत, शिर्डी, द्वारकामाई१) ‘मैं अंधा हूँ’ इस बात का स्वयं को अहसास हो जाना एवं साईनाथ (सद्गुरुतत्त्व) के समक्ष इस बात को दिल से कबूल कर लेना।

२) केवल ये सद्गुरु साईनाथ (सद्गुरुतत्त्व) ही मेरी लाठी हैं, इस निश्‍चय को दृढ़ करना।

३) साईनाथ (सद्गुरुतत्त्व) के अलावा किसी अन्य का आधार न लेना और ना ही किसी अन्य की शरण में जाना।

४) ये साईनाथ (सद्गुरुतत्त्व) बिना किसी लाभ के केवल प्रेम के ही कारण भक्तों की लाठी बनने में भी बिलकुल छोटापन नहीं मानते हैं। फिर मुझे कोई भी सेवा करते समय शर्मिंदगी महसूस नहीं करनी चाहिए।

५) ये साईनाथ (सद्गुरुतत्त्व) ‘मुझ अंधे की लाठी’ बनकर मेरी खातिर स्वयं ही आगे बढ़कर, हम पर आनेवाले आघात को स्वयं ही सहन करते हैं। मुझे ठोकर न लगने पाये इसके लिए ये स्वयं ही कष्ट सहते हैं। भक्तों के दुख एवं तकलीफ को बाबा स्वयं अपने शरीर पर झेल लेते हैं।

६) एक बार यदि लाठी को हम हाथ में पकड़ लेते हैं तो फिर उस लाठी पर हमें पूरा भरोसा होना चाहिए। फिर हमें लाठी की बात भी सुननी चाहिए। लाठी यदि हम से कहती है कि आगे पत्थर है, ठोकर लगेगी तो उसे सुनना ही हमारे लिए हितकारी होगा। फिर यदि कोई भी कहता है कि आगे कुछ भी नहीं है। फिर भी हमें उसकी बात नहीं सुननी है।

यदि लाठी स्वयं ही अपने आप को पत्थर पर पटक-पटक कर कह रही है तो उसकी वह बात सत्य ही है, इस बात का अहसास हमें होना ही चाहिए। लाठी कभी भी मेरे लिए झूठ नहीं बोलेगी, लाठी कभी भी मुझे दिशाभ्रम नहीं होने देगी। वह सदैव मेरे हित की ही बात करती है। यदि मेरा उसपर भरोसा नहीं होगा, तो लाठी हाथ में लेने से क्या फायदा? अन्य कोई भी कुछ भी कहे परन्तु मेरा अपने साईनाथ पर ही पूरा विश्‍वास है और केवल अपने साईनाथ की ही बात सुनूँगा।

अंधे व्यक्ति का जिस तरह से अपनी लाठी पर पूरा विश्‍वास होता है, बिलकुल वैसे ही मुझे भी अपने साईनाथ पर पूरा भरोसा करना चाहिए। बाबा जो कहेंगे वही मैं करूँगा।

७) इसके साथ ही उस लाठी को मजबूती से पकड़कर रखना यह पुरुषार्थ तो मुझे करना ही चाहिए।

कोई यदि यह कहेगा कि मैं लाठी को सामने रख देता हूँ, लाठी मेरे हाथ में चिपक जायेगी और मुझे मार्ग दिखायेगी, तो यह मूर्खता ही होगी। लाठी को हाथ ले पकड़े बगैर ही ‘लाठी मुझे रास्ता दिखालाओ’ यह हम केवल मुख से कहते हैं तो इसका कोई लाभ नहीं होगा। इसी तरह साईनाथ की भक्ति एवं सेवा करते रहने का पुरुषार्थ यो मुझे करते ही रहना चाहिए। भक्ति एवं सेवा का कार्य पूरी ईमानदारी से करना यह लाठी को मज़बूती से पकड़े रहना है।

८) भक्तिमार्ग की यह लाठी जहाँ ले जायेगी वहीं केवल लाठी के पीछे-पीछे चलने की हमारी तैयारी होनी चाहिए। ये साईनाथ जहाँ पर भी जिस दिशा में, जिस राह से ले जायेंगे उसी दिशा में उसी लाठी के पीछे-पीछे चलने की मेरी तैयारी होनी चाहिए।

‘मुझे ये यहाँ कहाँ ले जा रहे हैं’ इस तरह के प्रश्‍न पूछना सर्वथा गलत ही है। किसी को कीर्तन की राह पर, किसी को सेवा की राह पर, किसी को उपासना की राह पर तो किसी को किसी अन्य मार्ग के अनुसार ये साई ले जाते रहते हैं। कौन सा किरदार कौन अदा कर सकता है, कौन से मार्ग से आसानी से चल सकता है, यह साईनाथ ही जानते हैं और इसी कारण वे उस सेवा, उस साधना को उसी के अनुसार भक्तों को देते रहते हैं।

बाबा के पीछे-पीछे चलते रहना ही मेरा काम है। ‘मुझे किस राह से ले जाना है यह तय करना और उस राह से ले जाना’ यह काम मेरे साईनाथ का है। लाठी के पीछे-पीछे चलते रहना यही सफलता की निशानी है। लाठी का पिछा न छोड़ना तथा लाठी को पीठ न दिखाना इस बारे में मुझे सदैव सावधान रहना चाहिए।

९) सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ये साईनाथ जिस राह पर मेरे साथ चल रहे हैं, वह राह बिकट हो ही नहीं सकती, वह राह सदैव आसान राह ही होती है, यह विश्‍वास हमारे मन में होना ही चाहिए। फिर यदि कोई हमसे यह कहता है कि जिस राह पर तुम चल रहे हो, वह राह बड़ी ही कठिन है तो उस व्यक्ति को हमें यह कहने आना चाहिए कि जिस राह पर मेरे साईनाथ हैं, मेरे पिता हैं और जिस राह पर से वे मुझे ले जा रहे हैं, वही राह आसान है।

चाहे कितना भी रास्ता कठिन प्रतीत क्यों न हो रहा हो, मग़र फिर भी इस साईनाथ के चरण पड़ते ही वह राह बिलकुल आसान हो जाती हैं। वह राह सरल राह बन जाती है। ‘साईनाथ के पीछे-पीछे चलना यही हकीकत में आसान राह होती है’ इस सच्चाई को हमें अपने अंत:करण में अंकित कर लेना चाहिए।

जिस पर से हमें चलकर जाना है वह राह कैसी होगी इससे हमें कुछ भी लेना-देना नहीं है। वह राह चाहे जैसी भी हो साईनाथ के पीछे पीछे विश्‍वास के साथ चलते रहने से वह राह सरल एवं आसान बनती ही है। जिस राह पर साईनाथ हमारे साथ चलेंगे उस राह पर आँखें बंद कर साईनाथ के पीछे-पीछे चलते रहने में ही मेरी भलाई है।

साईनाथ ने मेरे लिए जो राह चुनी है, जिस पर से वे मुझे ले जा रहे हैं, वही मेरे लिए सही रहने वाली राह है, जो राह हमें श्रेयस् की ओर ले जाती है।

कल को यदि कोई कहता है मैं तुम्हें आसान मार्ग से ले चलता हूँ, तब भी हमें अपनी लाठी को यानी अपने सद्गुरु को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि सद्गुरुतत्त्व के अलावा अन्य कोई भी हमारा श्रेयस्, हमारा हित किसमें है, यह नहीं जानता। हमें गुमराह करना चाहनेवाले को हमें पूरे विश्‍वास के साथ छाती ठोककर कहना है कि चाहे जो भी हो मुझे अपने साईनाथ के साथ ही चलना है। मैं अपने साईनाथ को अपने से बिलकुल भी दूर नहीं होने दूँगा, तुम्हें यदि किसी और राह से चलना है तो तुम जाओ, मेरे साईनाथ के पीछे-पीछे चलते रहना यही मेरे लिए मेरी आसान राह है और मैं इसे कभी नहीं छोडूँगा।