श्रीसाईसच्चरित : अध्याय-३ (भाग-२६)

यही है गुरुकृपा की महिमा। कि जहाँ पर न हो रत्ती भर भी नमी।
वहाँ पर भी वृक्ष पुष्पित हो उठता है। घना हो उठता है बिना प्रयास के ही॥

हेमाडपंत इस पंक्ति के माध्यम से साई का गुणसंकीर्तन तो कर ही रहे हैं, परन्तु इसके साथ ही वे स्वयं का अनुभव भी दृढ़ विश्‍वास के साथ कह रहे हैं। साथ ही वे सभी से लगन के साथ यह भी कह रहे हैं कि तुम चाहे जैसे भी हो, पर यदि तुम्हारे दिल में प्रकाश के देवयानपथ पर से प्रवास करने की, स्वयं का विकास परमेश्‍वरी मार्ग पर चलकर करने की इच्छा है तो केवल एक ही काम करना है, बस, इस साईनाथ की शरण में आ जाओ। अपनी गलतियाँ, अपराध साईनाथजी के पास क़बूल करने के बाद स्वयं की गलतियों के कारण, अपराधों के कारण, पापों के कारण मन में न्यूनगंड मत बनाये रखो, फिर तुम्हारी सूखी बंजर ज़मीन में नंदनवन उगाने के लिए बाबा समर्थ हैं ही।

हेमाडपंत का यह स्वानुभव है। हेमाडपंत कहते हैं कि मैं जब शिरडी में आया, उस वक्त प्रथम दिवस ही सा़ठेजी के घर में मैंने बहस छेड़ दी। सच में देखा जाए तो मेरे लिए, मुझसे मिलने के लिए, मेरे ये साई स्वयं ही कष्ट उठाकर साठेजी के घर तक आ पहुँचे थे, वहीं पर मुझे उनके चरणों की धूल में लोटांगण करने का परमसौभाग्य भी प्राप्त हो गया, बाबा का दर्शन भी मिल गया। यह सब कुछ मुझे केवल मेरे साईनाथ के अकारण कारुण्य से ही प्राप्त हुआ, पर फिर भी बाबा के प्रति एवं बाबा की कृपा के प्रति विचार करने की बजाय, उनकी लीला जानने की बजाय, उलटे ‘सद्गुरु की आवश्यकता क्या है’ इस बात को लेकर भाटेजी के साथ मैं वाद-विवाद करने लगा।

इस तरह आधे-अधूरे ज्ञान के अहंकार में मत्त, अपने ही आप में उन्मत्त होकर मैं कितनी रूक्षता से पेश आया! पर फिर भी इस साईनाथ की कृपा देखिए! साईनाथ ने फिर भी ‘हेमाडपंत’ नामकरण करके मुझे अत्यन्त उचित मार्गदर्शन किया और मनो उन्होंने मुझे नया जीवन ही प्रदान कर दिया। इतना ही नहीं बल्कि श्रीसाईसच्चरित के लेखन का बीज भी आगे चलकर गेहूँ पीसनेवाली लीला के माध्यम से मेरे मन में पिरो दिया और स्वयं अनुमति प्रदान कर, मुझे सभी प्रकार से सहायता भी करते हुए मुझ से साईसच्चरित लिखवा लिया। कहने का तात्पर्य यह है कि वाद-विवाद में फँसे हुए मेरे रूक्ष मन में, जहाँ पर बिलकुल भी नमी नहीं थी, वहीं पर स्वयं की कृपा से साईसच्चरित रचना का बीज पिरोकर उसका ग्रंथरूपी वृक्ष पुष्पित कर दिया, हराभरा कर दिया।

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इसीलिए हेमाडपंत इस पंक्ति के माध्यम से हमें साईनाथ की अगाध महिमा बता रहे हैं कि ये साईनाथ कुछ भी कर सकते हैं। असंभव को संभव करने में इन्हें जरा सी भी देर नहीं लगती है और वे यह सब तो चुटकी बजाकर कर दिखाते हैं। फिर मेरी ज़मीन अर्थात मेरा रूक्ष मन है, मुझसे भक्ति नहीं होगी, मैं जीवन में कभी प्रगति कर ही नहीं सकूँगा, मैं इतने अधिक पापों में डूब चुका हूँ फिर बाबा की कृपा मुझ पर होगी या नहीं, आदि बातों के झमले में न पड़कर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्‍वासपूर्वक साईनाथ की शरण में जाना चाहिए, बाबा ज़रूर ही तुम्हारा उद्धार करेंगे, इसी बात का विश्‍वास हेमाडपंतजी इस पंक्ति के माध्यम से जता रहे हैं। हम देखते हैं कि साईसच्चरित में भी इस प्रकार के अनेक भक्त दिखायी देते हैं, जिनके रूक्ष जीवन में बाबा ने नंदनवन विकसित किया है। गलती करनेवाले भक्तों को भी बाबा ने दुत्कारा नहीं बल्कि जिन लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ, पश्‍चात्ताप हुआ उन सभी को बाबा ने उनके संकट से बाहर निकाला ही और साथ ही प्रगतिपथ के मार्ग पर भी आगे ले आए।

बाबा की आज्ञा का पालन न करनेवाला अमीर शक्कर हो अथवा बाबा पर अविश्‍वास करके बाबा की परीक्षा लेने हेतु आये काका महाजनी के सेठ हो, मन्नत पूरी करने का वादा करके उसे भूल चुका गोमन्तकस्थ गृहस्थ हो या बाबा दक्षिणा बाँट रहे हैं इसी लिए धन के लोभ में शिरडी आनेवाला मद्रासी गृहस्थ हो, इस परमात्मा ने ही मेरे बच्चे को मार डाला ऐसा आरोप लगानेवाले सपटणेकर हो अथवा द्वारकामाई पर का निशान देखकर बाबा के प्रति विकल्प रखनेवाले स्वामीदेवजी हो इस प्रकार के अनेक भक्तों की कथाओं में हम देखते हैं कि साई भक्ति का बीज बोकर, उसके विकास की किसी भी प्रकार की संभावना बिलकुल भी न होने के बावजूद भी, उलटे पूर्वग्रहदूषित मनोवृत्ति के कारण, जो कुछ भी अच्छा है वह भी व्यर्थ साबित होनेवाला है ऐसी परिस्थिती होते हुए भी साई ने कृपा करके इन सभी को उचित मार्ग पर तो लाया ही, साथ ही उनकी बंजर ज़मीन में भी परमात्मा की भक्ति का बीज अंकुरित कर उसे वृक्ष बनाया।

अकसर जीवन में हम कई बार हताश हो चुके होते हैं। हमें ऐसा लगता है कि अब मैं कुछ भी नहीं कर सकूँगा। मेरा जीवन इसी प्रकार दुखमय-कष्टमय बना रहेगा। मेरे जीवन में अब कुछ अच्छा हो ही नहीं सकेगा, अब मैं आगे नहीं बढ़ सकूँगा इस प्रकार के न्यूनगंड की भावना से हम ग्रसित हो चुके होते हैं। कभी-कभी तो जीवन में एक के बाद एक संकटों की श्रृंखला इस कदर शुरू रहती है कि हमारा मन बौखला उठता है। मानों चारों दिशाओं से उठनेवाले अंधकार में मैं हमेशा के लिए घिर चुका हूँ। ऐसे में मैं इतना परेशान हो जाता हूँ कि क्या करूँ और क्या नहीं, कुछ भी समझ में नहीं आता है। पैरों में मानों आगे बढ़ने की शक्ति ही नहीं रही, ना ही आगे कोई मार्ग भी दिखायी पड़ता है। मानो अंधकार ने सभी कुछ निगल रखा हो। घने काले प्रारब्ध ने इतना अधिक विकराल रूप धारण कर लिया होता है कि अब इस संकट से बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं दिखायी देता है। कहीं से भी प्रकाश की किरण दिखायी नहीं देती।

परन्तु हेमाडपंत की यह पंक्ति हम से कह रही है कि बिलकुल भी स्निग्धता, नमी न होने के कारण जहाँ पर वृक्ष की तो बात ही छोड़ दीजिए सामान्य घास तक नहीं उग सकती ऐसी परिस्थिति में भी जरा सा भी घबराना नहीं, सबूरी का दामन थामे रहना और स्थिति चाहे जैसी भी हो उसी स्थिति में इस साईनाथ को पुकारीये और फिर देखना और अनुभव भी करना कि ये साईनाथ जहाँ पर सादी घास का उगना भी संभव नहीं होता वहीं पर वे हराभरा घना वृक्ष खिला देंगे, एक ही नहीं बल्कि अनेक तरह की पूरी की पूरी बंजर हो चुकी ज़मीन का रूपांतरण भी नंदनवन में हो उठेगा।

हमें इस बात को सचमुच ध्यान में रखना चाहिए। हमारे जीवन में अंधकार की चाहे किसी भी परिस्थिति निर्माण हो चुकी हो। दृढ़ प्रारब्ध काल के जबड़े की तरह मुँह खोले हमारे सामने क्यों न खड़ा हो, उसकी जकड़ से मेरे बचने की बिलकुल भी आस न रह गयी हो, फिर भी ऐसी परिस्थिति से भी मुझे बाहर निकालने के लिए मेरे साईनाथ पूर्णत: समर्थ हैं। केवल मुझे उन्हें दिल से पुकारना है, बस्।

यदि कोई कहता है कि संकट के आरंभ से ही मैंने उन्हें पुकारा था और अब भी पुकार ही रहा हूँ, पर फिर भी अब तक संकट से मेरी मुक्ति क्यों नहीं हुई? इसका अर्थ एक ही है, इसका कारण तो केवल एक ही है और वह यह कि इस साईनाथ की कृपा, जो प्रारब्धभोग का, भोग का, संकटों का नाश कर सकती है, उसे अपने जीवन में प्रवाहित होने के लिए कहीं न कहीं मैं ही उसके मार्ग में रुकावटों को खड़ा कर रहा हूँ। जिस पल मुझ पर संकटों का पहाड़ टूट पडा, उससे पहले ही बाबा ने अपनी कृपा मेरे जीवन में प्रवाहित करके, संकटों पर मात करके, आगे बढ़ने का रास्ता निर्माण कर ही दिया था, यह मुझे ध्यान में रखना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि मुझे संकट निगल ले इससे पहले मैं बाबा को आवाज दूँ, उससे भी पहले वे साईनाथ जो सबकुछ जानते हैं, वे अपने भक्तों के ही प्रेमवश, अकारण कारूण्य के कारण संकट आने से पहले ही उससे अपने भक्तों को बचाने के लिए और संकटों का रूपांतरण अवसर में करके विकास की योजना बनाकर ही रखते हैं। मेरे पुकारने से पहले ही मेरे ये रखवाले मेरे लिए अपार परिश्रम करके मेरी हर प्रकार से सहकार्य करते रहते हैं। परन्तु इनकी कृपा मेरे जीवन में प्रवेश कर सके, प्रवाहित हो सके इसके लिए मुझे ही उनकी कृपा के प्रवाह को अपने जीवन में प्रवेश करने के लिए रूकावटें निर्माण नहीं करनी चाहिए।

‘मैंने किसी का बुरा नहीं किया है। फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? साईनाथ का ध्यान भी मुझ पर है भी अथवा नहीं? यह नहीं सोचना चाहिए। यह सोचना ही रुकावटें पैदा करना है।

मेरे पास जो है वह तसवीर, उस तसवीर के समक्ष खड़े रहकर की गयी विनति बाबा ने सुनी होगी क्या? मैं तो अपने साईनाथ से प्रत्यक्ष नहीं मिल सकता हूँ। फिर क्या बाबा को मेरी पीडा का अहसास होगा? जो दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, उनके साथ सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों?’ इन कारणों से शंका, अविश्‍वास, विकल्प होनेवाली अनुचित वृत्ति ही साईनाथ की कृपा को मेरे जीवन में प्रवाहित होने में रूकावटें उत्पन्न करती रहती है। इसके साथ ही सबसे बड़ी रुकावट बनती है, वह यह है कि ‘हम साईनाथ का गुणसंकीर्तन नहीं करते’ यह बात। हमें केवल हमारी मन्नतें पूरी करने वाले देवता की ज़रूरत होती है। फिर ऐसा लेन-देन का व्यवहार करनेवाला व्यक्ति भला बाबा की कृपा कैसे प्राप्त कर सकता है। साईनाथ की कृपा सदैव जीवन में प्रवाहित होने के लिए, सारी रूकावटों को दूर करने के लिए सहज आसान मार्ग है साईनाथ का गुणसंकीर्तन।

साईनाथ का गुणसंकीर्तन करते रहना मेरा काम है। जो श्रद्धावान सदैव साईनाथ का गुणसंकीर्तन करते रहता है, बाबा के पवाड़े (यशगान) गाते रहता है, उसके समक्ष कोई भी संकट कभी आ ही नहीं सकता है।