समय की करवट (भाग ७०) – क्युबन रिव्हॉल्युशन

‘समय की करवट’ बदलने पर क्या स्थित्यंतर होते हैं, इसका अध्ययन करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं।

इसमें फिलहाल हम, १९९० के दशक के, पूर्व एवं पश्चिम जर्मनियों के एकत्रीकरण के बाद, बुज़ुर्ग अमरिकी राजनयिक हेन्री किसिंजर ने जो यह निम्नलिखित वक्तव्य किया था, उसके आधार पर दुनिया की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
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‘यह दोनों जर्मनियों का पुनः एक हो जाना, यह युरोपीय महासंघ के माध्यम से युरोप एक होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। सोव्हिएत युनियन के टुकड़े होना यह जर्मनी के एकत्रीकरण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है; वहीं, भारत तथा चीन का, महासत्ता बनने की दिशा में मार्गक्रमण यह सोव्हिएत युनियन के टुकड़ें होने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।’
– हेन्री किसिंजर
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इसमें फिलहाल हम पूर्व एवं पश्चिम ऐसी दोनों जर्मनियों के विभाजन का तथा एकत्रीकरण का अध्ययन कर रहे हैं।

यह अध्ययन करते करते ही सोव्हिएत युनियन के विघटन का अध्ययन भी शुरू हो चुका है। क्योंकि सोव्हिएत युनियन के विघटन की प्रक्रिया में ही जर्मनी के एकीकरण के बीज छिपे हुए हैं, अतः उन दोनों का अलग से अध्ययन नहीं किया जा सकता।

सोविएत युनियन का उदयास्त-३०

क्युबा में क्रांति कराके, क्युबन बाग़ी नेता फिडेल कॅस्ट्रो ने क्युबा के तत्कालीन तानाशाह बॅटिस्टा को देश से निकाल बाहर कर दिया। इससे क्युबा में एक के बाद एक अमेरिकापरस्त राष्ट्रप्रमुख लादे जाने की परंपरा तो खंडित हुई, लेकिन अमरीका ने इस बात को सीधीसादी बात मानकर छोड़ नहीं दिया था। ख़ासकर, कॅस्ट्रो पर कम्युनिस्ट संस्कार हुए होने के कारण अमरीका अधिक ही बेचैं हुई थी और कॅस्ट्रो को कैसे नेस्तनाबूद किया जा सकता है, इसका मौका ढूँढ़ रही थी।

कॅस्ट्रो ने जिस बॅप्टिस्टा की ज़ुल्मी शासनयंत्रणा के विरोध में क्रांति करायी, उसके कई शासनाधिकारी, सेनाधिकारी, सैनिक क्रांति के दौरान क्युबा से बाहर भाग गये थे और अमरीका में राजाश्रय लेकर रह रहे थे। ज़ाहिर है, वे कॅस्ट्रो का बदला लेने का मौका ढूँढ़ ही रहे थे। वहीं, कॅस्ट्रो की, धीरे धीरे बायीं ओर मुड़ रही विचारधारा के कारण अमरीका की बेचैनी बढ़ती ही चली जा रही थी।

आख़िरकार जनवरी १९६१ में अमरीका के तत्कालीन (पदावरोही) राष्ट्राध्यक्ष आयसेनहॉवर ने ़फैसला करके क्युबा के साथ होनेवाले राजनैतिक संबंध तोड़ दिये। लेकिन उससे पहले कॅस्ट्रो की सत्ता का त़ख्ता पलट देने के लिए अमरिकी गुप्तचरयंत्रणा सीआयए ने बनायी विशेष योजना को आयसेनहॉवर ने अनुमति दे दी थी। उसका अनुसरण करके सीआयए ने, क्युबा से अमेरिका में राजाश्रय के लिए आये इन असंतुष्टों का इस्तेमाल कर उन्हें आधुनिक सैनिकी प्रशिक्षण देने की शुरुआत की थी और इन असंतुष्टों को क्युबा में घुसाने का मौका सीआयए ढूँढ़ रही थी। इन बाग़ियों का इस्तेमाल करके हम क्युबा में होनेवाली कॅस्ट्रो की सत्ता का त़ख्ता पलट सकते हैं, ऐसा विश्‍वास सीआयए के संचालक अ‍ॅलन डल्लास को लग रहा था। अमरीका के तत्कालीन नवनिर्वाचित अध्यक्ष जॉन केनेडी ने इस योजना को प्रत्यक्ष रूप में अनुमति दी।

दमनतन्त्र के कारण क्युबन जनता के गुस्से का कारण बने बॅटिस्टा प्रशासन के इन असंतुष्टों को ‘बे ऑफ पिग्ज’ ऑपरेशन में क्युबन जनता का समर्थन न मिलने के कारण वह नाक़ाम हुआ।

सीआयए को वह मौका मिला अप्रैल १९६१ में और ऐसे तक़रीबन १३०० असंतुष्ट क्युबन सैनिकों को अत्याधुनिक हथियार देकर सीआयए ने क्युबा के नज़दीक के ‘बे ऑफ पिग’ सामुद्री भाग से क्युबा के दक्षिणी किनारे पर उतार दिया। स्थानिक लोगों से हमें समर्थन प्राप्त होगा, ऐसा इन असंतुष्टों को लग रहा था। लेकिन हुआ उल्टा ही! बॅप्टिस्टा की ज़ुल्मी शासनव्यवस्था से ऊब चुकी जनता के मन में इन असंतुष्टों के प्रति हमदर्दी तो दूर की बात, बल्कि नफ़रत ही थी। इस कारण उन्हें स्थानिकों से कतई समर्थन नहीं मिला। उनमें से लगभग ९०-९५ जनों को मार देने के बाद और बचे हुए लोगों को गिरफ़्तार करने के बाद यह ‘बे ऑफ पिग’ ऑपरेशन ख़त्म तो हुआ, लेकिन इस घटना से फिडेल कॅस्ट्रो अमरीका से नफ़रत करने लगा; इतना ही नहीं, बल्कि वह अमरीका को अपना दुश्मन नं. १ मानने लगा।

इस ऑपरेशन की नाक़ामयाबी का दोष जिनके माथे पर थोंपा गया, वे अमरिकी राष्ट्राध्यक्ष जॉन केनेडी

वहाँ अमरीका में सत्ता में आते ही केनेडी को, यह ऑपरेशन नाक़ाम होने के कारण मज़ाक और आलोचना का सामना करना पड़ा। पहली बात, यह फ़ालतू का झंझट मोल लेने के लिए किसने कहा था, और अगर झंझट मोल लिया भी, तो भी वह ठीक से प्लॅनिंग किये बिना क्यों मोल लिया, ऐसी आलोचना की बौछार अमरिकी जनता से केनेडी प्रशासन पर होने लगी।

हालाँकि संकट फिलहाल तो टल गया, लेकिन कॅस्ट्रो चौकन्ना हो गया। अमरीका कब अपना घात करेगी बोल नहीं सकते, यह जानकर, इस ‘बे ऑफ पिग’ वाक़ये की पुनरावृत्ति न हों इसलिए वह क्युबा की रक्षाव्यवस्था मज़बूत करने के पीछे लग गया। कॅस्ट्रो कम्युनिस्ट विचारधारा का अनुसरण कर रहा होने के कारण, सोव्हिएत रशिया उससे दोस्ती करने का मौक़ा ढूँढ़ ही रहा था, जो उसे इसके ज़रिये मिल गया। सोव्हिएत रशिया को भी अमरीका के क़रीब होनेवाले किसी देश के साथ दोस्ती करनी ही थी और इसके लिए एक वैसा ही तात्कालिक कारण था!

दूसरा विश्‍वयुद्ध दुनिया पर थोंपकर पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन गये हिटलर को धूल चटायी सोव्हिएत रशिया ने; इस कारण दूसरा विश्‍वयुद्ध ख़त्म होने तक सोव्हिएत रशिया की गिनती अमरीका के तुल्यबल देश के तौर पर होने लगी थी….यहाँ तक कि अमरीकासहित दोस्त राष्ट्रों को अपनी शर्तों पर नचाने जितना मुक़ाम सोव्हिएत रशिया ने हासिल किया था। लेकिन आगे चलकर ग़लत एकाधिकारशाही की नीतियों के कारण और अन्य भी कई कारणों की वजह से सोव्हिएत रशिया शस्त्र-प्रतिस्पर्धा में, ख़ासकर मिसाईल्स के क्षेत्र में धीरे धीरे अमरीका से पीछडा जा रहा था।

विशेषतः अमरीका ने रशिया से सटे युरोपस्थित जितने स्वयं के परस्त राष्ट्र थे, उन राष्ट्रों में मध्यम तथा दीर्घ टापू के क्षेपणास्त्र सुसज्जित रखे थे। इस कारण, अब यदि अमरीका-सोव्हिएत युद्ध हो जाता, तो समूचा सोव्हिएत रशिया अमरीका के क्षेपणास्त्रों की पहुँच में आ गया था।
लेकिन सोव्हिएत रशिया के पास तब तक दीर्घ टापू के क्षेपणास्त्र नहीं थे। उनके पास होनेवाले मध्यम टापू के क्षेपणास्त्रों के दायरे में मुश्किल से युरोप ही आ सकता था।

….इसी कारण ख्रुश्‍चेव्ह को इस क्युबा प्रकरण में मज़बूत मौका दिखायी दिया। क्युबा भौगोलिक दृष्टि से अमरीका के एकदम क़रीब था और उसे सुरक्षा की ज़रूरत भी थी!

….‘क्युबा की विनति पर’ ‘क्युबा की रक्षा के लिए’ क्युबा में क्षेपणास्त्र तैनात कर दिये जायें, ताकि समूची अमरीका उनके दायरे में आ सकें; जिससे कि युरोपीय देशों में रखे क्षेपणास्त्रों का सोव्हिएत के खिलाफ़ इस्तेमाल करने से पहले अमरीका दस बार सोचेगी, ऐसा यक़ीन ख्रुश्‍चेव्ह को होने लगा।

….और फिर शुरू हुआ ‘वह’ घटनाक्रम, जिसके कारण कहीं सारी दुनिया ही प्रत्यक्ष परमाणुयुद्ध के दावानल में फँस तो नहीं जायेगी, ऐसा सार्थक डर सबको लग रहा था।

समूचे विश्‍व को ही ख़तरे में डालनेवाला यह महानाट्य चल रहा था महज़ तेरह दिन….लेकिन दुनिया को ख़त्म करने की क्षमता उस छोटेसे महानाट्य में थी!