श्‍वसनसंस्था – १२

हमारे फेफड़े हवा से किस तरह भरे होते हैं और पूरी तरह क्यों नहीं सिकुडते, इसकी जानकारी हम प्राप्त कर रहे हैं। पिछले लेख में हमने हवा के प्रवाह को नियंत्रित करनेवाले घटकों का अध्ययन किया। आज हम फेफड़ों के दो गुणधर्मों का अध्ययन करेंगे।

फेफड़ों का काँपलायन्स :
पिछले लेख में हमनें ट्रान्सपलमनरी दबाव के बारे में जानकारी ली। यह दाब फेफड़ों के आकुंचन-प्रसरण पर नियंत्रण रखता है। इस दबाव में वृद्धि होने पर फेफड़ों में प्रसरण होता है और दबाव कम होने पर आकुंचन होता है। इस बाद में प्रति युनिट बदलाव के साथ फेफड़ों में जितना आकुंचन और प्रसरण होता है उसे फेफड़ों का काँपलायन्स कहते हैं। ट्रान्सपलमनरी दाब १ सेमी से बढ़ने पर फेफड़ों की क्षमता अथवा वॉल्युम २०० मिली से बढ़ जाता है। अर्थात उतनी ज्यादा हवा फेफड़ों में आ जाती हैं।
फेफड़ों का काँपलायन्स दो बातों पर निर्भर करता है।

१)फेफड़ों का इलॅस्टिक फोर्स
२)अलविलोय में द्राव का सरफेस टेन्शन का इलॅस्टिक फोर्स

इन दोनों के बारे में अच्छी तरह समझते हैं –
१) फेफड़ों में इलॅस्टिक फोर्स :
फेफड़ों में इलॅस्टिक और कोलॅजन दो प्रकार के तंतु होते हैं। हवा बाहर निकलने के बाद फेफड़ों में (deflated lung) नामक तंतु आकुंचित होते हैं तथा घुंघराले अथवा kinked होते हैं। फेफड़ों के हवा अंदर आने पर ये तंतु प्रसरित होते हैं तथा सीधे हो जाते हैं। इस स्थिति में ये तंतु तने होते हैं। उनकी नैसर्गिक स्थिति आकुंचन की होती है। इस नैसर्गिक स्थिति में वापस आने के लिये उनका प्रयत्न होता है। उनका यह प्रयत्न फेफड़ों के प्रसरण का विरोध करता है। फेफड़ों के प्रसरण होने में इस विरोध के विरोध में कार्य करना पड़ता है।

२) सरफेस टेन्शन के कारण निर्माण होनेवाला इलॅस्टिक फोर्स :
हमारे अलविलोस के अंदरुनी स्तर पर द्रव की एक पतली सतह होती है। फेफड़ों की हवा और इस द्राव का संबंध जहाँ पर होता है वहाँ यह पृष्ठीय तनाव या सरफेस टेन्शन निर्माण होता है। जब हमारे फेफड़े हवा के अलावा अन्य किसी द्राव से भर जाते हैं तो यह तनाव नगण्य अथवा कम हो जाता है।

हवा से भरे हुए फेफड़ों के और द्रव से भरे हुए फेफड़ों के प्रसरण में क्या अंतर होता है? हाँ, अवश्य अंतर होता है। द्रव से भरे हुए फेफड़ों के प्रसरण में जितना प्लुरल दबाव का उपयोग करना पड़ता है उससे तीन गुना प्लुरल दबाव हवा से भरे हुये फेफड़ों के प्रसरण में खर्चा करना पड़ता है। इसका कारण है सरफेस टेन्शन।

उपरोक्त दोनों इलॅस्टिक फोर्स फेफड़ों के प्रसरण का विरोध करते हैं। यानी फेफड़ों का काँपलायन्स कम करते हैं। इस विरोध का दो-तिहाई विरोध सिर्फ इस पृष्ठीय तनाव के कारण निर्माण होता है। बचा हुआ १/३ विरोध इलॅस्टिन और कोलॅजन तंतु के कारण होता है। अलविलोस के द्रव में यदि सरफॅक्टंट ना हो तो यह विरोध और भी बढ़ जाता है। सरफॅक्टंट एक रासायनिक पदार्थ है जो अलविलोर द्राव में होता है, यह हमने पहले ही पढ़ा है। सरफॅक्टंट के कारण पृष्ठीय तनाव कम होता है और काँपलायन्स बढ़ता है।

अब हम यह देखेंगे कि सरफेस टेन्शन अथवा पृष्ठीय तनाव वास्तव में क्या है? पानी और हवा जब एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं तो हवा के सीधे संपर्क में आनेवाले पानी के अणुओं में एक (bonding) शक्ति का निर्माण हो जाता है। फलस्वरुप पानी के कण एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और एक दूसरे को मजबूती से पकड़ लेते हैं। पानी के अणुओं की इसी शक्ति के कारण पानी की ‘बूँद’ तैयार होती है। पानी के अणुओं को जकड़कर रखनेवाली यह शक्ति है, पृष्ठीय तनाव। यह पृष्ठीय तनाव वहाँ पर सर्वाधिक होता है, जहाँ पर पानी और हवा के अणु सीधे संपर्क में होते हैं। यह पृष्ठीय तनाव अलविलोस की हवा को बाहर निकालने का प्रयास करता है। सरफॅक्टंट पृष्ठीय तनाव कम करता है और अलविलोस में हवा आने तथा हवा भरे रहने में मदत करता है। तात्पर्य यह है कि सरफॅक्टंट के फलस्वरूप फेफड़ों का काँपलायन्स बढ़ता है।

सरफॅक्टंट में उपस्थित रसायनों में फॉस्फोलिपिड नामक रासायनिक घटक होता है। फॉस्फोलिपिड़ का कुछ भाग पानी में घुलनशील होता है और शेष भाग पानी में नहीं घुलता। पानी में ना घुलनेवाला भाग अलविलोस में हवा के संपर्क में रहता है। पानी में ना घुलनेवाले इस भाग इस भाग का पृष्ठीय तनाव कम हो जाता है। इस प्रकार से अलविलोस में होनेवाला पृष्ठीय तनाव कम हो जाता है।

अलविलोस का पृष्ठीय तनाव यह अलविलोस की त्रिज्या (रेडिअस) पर यानी अलविलोस के आकार पर निर्भर करता है। अलविलोस की त्रिज्या जितनी कम होती है उतना ही तनाव ज्यादा होता है। सामान्यत: प्रौढ़ व्यक्तियों में यह त्रिज्या १०० मायक्रोमीटर होती है। यदि यह त्रिज्या ५० मायक्रो मीटर हो जाये तो पृष्ठीय तनाव दो गुना बढ़ जाता है। पिछले एक लेख में हमने देखा कि प्रिमॅच्युअर अर्भकों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम नामक विकार होता है। इस विकार में श्‍वसन क्रिया का विरोध होता है क्योंकि अलविओलाय हवा से भरता नहीं है। ऐसा क्यों होता है।

इसके दो कारण हैं –

१)प्रिमॅच्युअर बच्चों में अलविलोस का आकार छोटा होता है। लगभग २५ मायक्रोमीटर इसकी त्रिज्या होती है। फलस्वरुप पृष्ठीय तनाव चार गुना बढ़ जाता है।

२)गर्भ की वृद्धि के ७ वें और ८ वें महीने तक अलविलोर द्रव में सरफॅक्टंट की पर्याप्त मात्रा में नहीं होती है। इन दोनों कारणों से पृष्ठीय तनाव के फलस्वरुप इलॅस्टिक फोर्स बढ़ जाता है, जो फेफड़ों के प्रसरण का विरोध करता है।

छाती का पिंजरा, फेफड़ों की पेशियाँ, श्‍वसनमार्ग इत्यादि सभी चीज़े हवा के प्रवाह का कुछ मात्रा में विरोध करती हैं। नॉर्मल श्‍वसन में यह विरोध कष्टकरी नहीं होता। परन्तु फेफड़ों और श्‍वसन मार्ग की विविध बीमारियों में यह विरोध कष्टकारी साबित होता है। उदा. दमा अथवा अस्थमा। इस विकार में श्‍वसन मार्ग का विरोध बढ़ जाता है और फेफड़ों में हवा भरने के लिए व्यक्ति को ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है अथवा ज्यादा शक्ती खर्च करनी पड़ती है।

आज हमने फेफड़ों में आनेवाली तथा उससे बाहर जानेवाली हवा के प्रवाह का विरोध करनेवाली शक्ति की जानकारी प्राप्त की। फेफड़ों में कुल कितनी हवा आती है, कितनी जाती है इत्यादि जानकारी हम अगले लेख में प्राप्त करेंगे।