परमहंस-९७

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख

उस दौर में कोलकाता और परिसर में, निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का प्रतिपादन करनेवाले विभिन्न संप्रदाय बढ़ने लगे थे। लेकिन रामकृष्णजी, कम से कम भक्तिमार्ग के प्राथमिक पड़ाव पर तो ईश्‍वर के सगुण साकार रूपों को ही भजने के लिए कहते थे। ‘ये ईश्‍वर ज्ञानमार्ग से समझ पाने में, कम से कम प्राथमिक अवस्था में तो, बहुत ही कठिन हैं। इसलिए उनकी ओर पहुँचने के लिए ईश्‍वर के सगुण साकार रूपों से प्रेम करने का सरल एवं आसान भक्तिमार्ग ही अच्छा है’ ऐसा वे प्रतिपादित करते थे।

जब वे उस दौर के विख्यात दार्शनिक एवं समाजसेवक ईश्‍वरचंद्र विद्यासागरजी से मिलने गये थे, तब उस मुद्दे को प्रतिपादित करते हुए उन्होंने एक चींटी और शक्कर के दाने का उदाहरण दिया – ‘शक्कर के दानों की एक पहाड़ी थी। वहाँ पर एक चींटी जा पहुँची। उसने एक दाना वहाँ पर खाया और दूसरा एक दाना वह अपने घर ले आयी, क्योंकि उसे अपने आकारमान के अनुसार और ताकत के अनुसार एक समय में एक ही दाना लाना मुमक़िन था। लेकिन आते समय वह सोच रही थी कि ‘अगली बार मैं वह शक्कर की पूरी पहाड़ी ही उठाकर ले आऊँगी।’

इतनी कथा सुनाकर रामकृष्णजी ने कहा कि ‘ईश्‍वर को ज्ञानमार्ग से ‘जानना चाहनेवाले’ ज्ञानमार्गियों की बात इस चींटी की तरह होती है। चींटी की क्षमता और उस पहाड़ी का आकारमान इनमें इतना ज़मीन-आसमान का विरोधाभास होकर भी यह चींटी जो कहती है कि ‘अगली बार आते समय पूरी की पूरी पहाड़ी ही ले आऊँगी’, वह उसके अज्ञान का ही प्रदर्शक है। उसी प्रकार, जो निर्गुण निराकार के उपासक इस ब्रह्म को जानने की बातें करते हैं, वह उनके अज्ञान का मूलक है। वेद भी जहाँ पर केवल ‘नेति नेति’ यानी ‘वह’ ऐसा भी नहीं है और वैसा भी नहीं है’ इतना ही उसका वर्णन कर सके, ‘वह कैसा है’ यह वे बता न सके, उस ईश्‍वर को ज्ञानमार्ग से जानना आसान नहीं है।

रामकृष्ण परमहंस, इतिहास, अतुलनिय भारत, आध्यात्मिक, भारत, रामकृष्णकई जन्मों की कठोर साधना के अंतिम चरण में पहुँचे हुए लोग शायद ‘उसे’ जान भी सकते हैं, लेकिन फिर ‘वह’ कैसा है यह बताने के लिए वे बाक़ी ही नहीं रहते, मोक्ष प्राप्त करके वे ‘ब्रह्म ही’ बन जाते हैं। जैसे नमक की कोई गुड़िया बनायी जाये और फिर उस गुड़िया द्वारा ऐसा बताया जाये कि समुद्र की गहराई कितनी है, यह मैं तुम्हें स्वयं समुद्र के तल तक जाकर बताऊँगी। लेकिन यह हो नहीं सकता, क्योंकि एक बार जब उसे पानी का स्पर्श हो जाता है, तो वह पिघलकर पानी में घुलमिल जायेगी, समुद्र की गहराई बताने के लिए वापस ही नहीं आ जायेगी, वैसा ही यह है।’

इसपर जब ईश्‍वरचंद्रजी ने पूछा कि ‘क्या ईश्‍वर को जाना हुआ इन्सान पुनः जीवन में कुछ बोलता ही नहीं है?’; तब रामकृष्णजी ने उत्तर दिया – ‘‘‘उसे’ संपूर्ण रूप से जानने के बावजूद भी, उसमें पिघलकर घुलमिल न जाते हुए, अर्थात् मोक्ष का स्वीकार न करते हुए, केवल आम लोगों के कल्याण हेतु पीछे रहना, यानी ‘तू ईश्‍वर मैं भक्त’ ऐसा द्वैत कायम रखना केवल आदिशंकराचार्यजी जैसे सर्वोच्च स्तर पर के साधकों एवं सन्तों के लिए ही संभव है, आम लोगों के लिए नहीं।

ये निर्गुण निराकार की उपासना के प्रतिपादक – ‘ईश्‍वरप्राप्ति करनी हो, तो बाक़ी सब भूल जाओ और उस एक ब्रह्म पर ध्यान केंद्रित करो। भक्तिनदी में डुबकी लगाओगे, फिर ठेंठ उस सच्चिदानंद-सागर में पहुँचोगे’ ऐसी बातें बताते हैं, जो आम लोगों के लिए भला कहाँ से संभव होंगी? इसका कारण, ईश्‍वरप्राप्ति के लिए जो ईश्‍वर का एकलदिमागी, एकमात्र ध्यास ज़रूरी है, वह अधिकांश बार आम लोगों के पास नहीं होता। सर्वसाधारण जन गृहस्थी में डूबे रहते हैं। वे अधिक समय अपनी चिन्ताओं को भूलकर ईश्‍वर के स्मरण में लीन नहीं रह सकते। पूँछ को पत्थर बाँधे नेवले की तरह उनकी हालत होती है। ऐसा नेवला चाहे कहीं भी जाये, वह कितना भी ऊपर चढ़ने की कोशिश करें, वह एक मर्यादा से परे नहीं जा सकता, क्योंकि वह पत्थर उसे पुनः पुनः पीछे खींचता रहता है।

इस कारण, ऐसे सर्वसाधारण गृहस्थाश्रमियों को चाहिए कि वे अपने गृहस्थाश्रमी कर्तव्य करते समय, ध्यान ईश्‍वर पर केंद्रित करने का धीरे धीरे प्रयास करें। एक हाथ से वह गृहस्थाश्रम के कर्तव्य करें, तो दूसरा हाथ भगवान के चरणों पर रखें। अपने प्रापंचिक कर्तव्यों में से जब जब समय मिलें तब तब, कम से कम उतना समय तो दोनों हाथ भगवान के चरणों पर रखें।’’

ऐसे छोटे छोटे तथा व्यवहारिक उदाहरणों के ज़रिये रामकृष्णजी अपने शिष्यों की भक्ति को आकार देते रहते थे।