परमहंस-१०२

एक बार रामकृष्णजी के निकटवर्ती शिष्य आधारचंद्र सेन के घर सत्संग आयोजित किया गया था। कोलकाता में डेप्युटी मॅजिस्ट्रेट (उप-दंडाधिकारी) होनेवाले आधारचंद्रजी ने हमेशा के लोगों के साथ ही कई नये लोगों को भी आमंत्रित किया था, ताकि उनका भी रामकृष्णजी से परिचय हों। उनमें से कई लोग महज़ कौतुहल से, तो कोई रामकृष्णजी को परखने की इच्छा से वहाँ आये थे। उनमें तत्कालीन सुविख्यात बंगाली कवी-लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय भी थे। वे विख्यात देशभक्त माने जाते थे और उनकी कथा-उपन्यासों ने बंगाली समाजजीवन को मोहित किया था। लेकिन उनकी शिक्षा मूलतः, अँग्रेज़ों ने भारत पर जानबूझकर थोंपी तत्कालीन अँग्रेज़परस्त शिक्षापद्धति में हुई थी। हर बात वैज्ञानिक कसौटियों पर, तर्कशुद्ध विचारप्रणाली पर खरी उतरनी चाहिए, ऐसी विचारधारा को यह शिक्षापद्धति उत्तेजना देती होने के कारण, ज़ाहिर है, उसमें शिक्षा प्राप्त किये हुए लोगों का भगवान-धर्म पर, व्रत आदि बातों पर, मंदिर में जाने पर विश्‍वास कम ही रहता था। क्योंकि ईश्‍वर यह ‘साबित’ कर दिखानेवाली बात न होने के कारण, इन नवशिक्षितों में से कई लोगों ने भक्तिमार्ग की ओर अपनी पीठ फेर दी होती थी। इसलिए इतने बड़े लेखक होने के बावजूद भी और देशभक्ति, समाजसेवा आदि उनके स्वभावविशेष होने के बावजूद भी, बंकिमबाबू को भक्तिमार्ग में कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं थी।

आधारबाबू ने उनका रामकृष्णजी से परिचय कराया। उनका ‘बंकिम’ नाम सुनते ही रामकृष्णजी ने मज़ाकिया स्वर में पूछा, ‘तुम किस कारण से झुके हो?’ (‘बंकिम’ का एक सरलार्थ ‘झुका हुआ’ ऐसा होता है।)

रामकृष्ण परमहंस, इतिहास, अतुलनिय भारत, आध्यात्मिक, भारत, रामकृष्णउसपर बंकिमबाबू ने भी मज़ाकिया अन्दाज़ में उन्हें – ‘अँग्रेज़ों की लात से से’ ऐसा जवाब दिया।

उसपर रामकृष्णजी ने उन्हें ‘मेरे पूछने का मतलब यह नहीं था’ ऐसा कहकर, ङ्गिर राधा-कृष्ण का उदाहरण देकर उसपर इस आशय का विवेचन किया –

‘ईश्‍वर जैसे भक्ति से झुकते हैं, क्या तुम वैसे झुके हो? हम राधाजी-श्रीकृष्ण के चित्र देखते हैं और उन्हें मानवीय मापदंड लगाकर उसके विभिन्न अर्थ लगा देते हैं। लेकिन कृष्ण और राधा यानी ‘ईश्‍वर’ और ‘भक्ति’, ‘पुरुष’ और ‘प्रकृती’, जो भले ही अलग दिखायी दे रहे हैं, मग़र वास्तविक रूप में अभिन्न ही हैं। लेकिन हम उसे मानवीय मापदंड लगाते हैं, क्योंकि हम उसकी ओर दूर से देख रहे होने के कारण वह हमें ‘छोटा’, ‘मानव’ प्रतीत होता है। लेकिन (मन से) उसके अधिक से अधिक नज़दीक जाने पर उसके वास्तविक स्वरूप का आँकलन होना शुरू होता है, जो अनन्त है।

जिस प्रकार हम सूर्य की ओर देखते हैं तब वह हमें चुटकी जितने आकार का प्रतीत होता है; लेकिन दरअसल हम उसके सामने तिनके जितने भी नहीं हैं, यह उसके नज़दीक जाने पर ही हमारी समझ में आ सकता है; या फिर कोई नदी दूर से नीले रंग की दिखायी देती है, लेकिन पास जाकर उसका पानी हाथ में लेने पर हमें पता चलता है कि वह नीला न होकर पारदर्शी ही है।

लेकिन यह ध्यान में आने के लिए उस उस बात के नज़दीक जाना पड़ता है, उसका नज़दीक से अवलोकन करना पड़ता है – भौतिक दृष्टि से या मानसिक दृष्टि से; उसी प्रकार ईश्‍वर के वास्तविक रूप का आँकलन होने के लिए उसके नज़दीक, अधिक नज़दीक जाना पड़ता है। नदी के क़िनारे पर लेटकर तुम चाहे कितने भी हाथपैर मारो, क्या तुम तैर सकोगे? नहीं ना! उसके लिए तुम्हें नदी में डुबकी लगानी ही होगी। उसी तरह ईश्‍वर का वास्तविक रूप ध्यान में आने के लिए और उससे आनन्द प्राप्त करने के लिए तुम्हें उसकी भक्ति में ही डूब जाना होगा।

जीव को उसके उत्पत्तिकर्ता का – ईश्‍वर का एहसास-परिचय हों, इसलिए उसे मानवी जन्म प्राप्त हुआ है, इस बात को उसे कभी भी नहीं भूलना चाहिए। लेकिन हम इसी बात को भीलकर अन्य सुखोपभोगों में निमग्न रहते हुए ईश्‍वर को आख़िरी प्राथमिकता दे देते हैं या फिर इस विश्‍व की उत्पत्ति आदि के बारे में चिकित्सा करते रहते हैं। तुम ज्ञानमार्गीय कहते हो कि ‘पहले इस विश्‍व का तो ठीक से परिचय होने दो, ईश्‍वर वगैरा बाद में देखेंगे।’ लेकिन ‘पहले ईश्‍वर, बाद में उसने निर्माण किया हुआ विश्‍व’ यह तुम कैसे भूल जाते हो? और इस तुम्हारी पद्धति से तुम ईश्‍वर को जान ही नहीं पाओगे, क्योंकि यह विश्‍व ही मूलतः इतना अनन्त है कि उसके बारे में पूरी तरह जान लेना यह मानव के बस की बात ही नहीं है, फिर उससे परे होनेवाले यानी इस विश्‍व को पूरी तरह व्याप्त कर भी शेष रहनेवाले ईश्‍वर को तुम क्या खाक जानोगे? मूलतः ईश्‍वर यह जानने की बात न होकर अनुभूत करने की बात है और इसी बात को भक्तिमार्ग प्रतिपादित करता है; इस कारण ईश्‍वर की अनुभूति दे सकनेवाला भक्तिमार्ग ही सर्वश्रेष्ठ, मग़र फिर भी अत्यधिक आसान, सरल है….’

इस विवेचन के दौरान बंकिमचंद्र तथा अन्य भक्त बीच बीच में प्रश्‍न पूछ रहे थे, जिनके उत्तर रामकृष्णजी दे रहे थे। उससे बंकिमचंद्रजी का हालाँकि पूरा समाधान नहीं हो रहा था, उपस्थितों के लिए तो वह दावत ही थी!