नेताजी- १४४

उस अ़फ़गाणी सीआयडी पुलीस की बला से छुटकारा पाने के लिए भगतराम ने ठहरने के बारे में अब काबूल में बस चुके अपने पुराने सहकर्मी – उत्तमचन्द मल्होत्रा से दऱख्वास्त करने का तय किया और दूसरे दिन सुबह की वह उत्तमचन्द की दुकान में पहुँच गया। सुबह का समय होने के कारण रास्ते पर कुछ ख़ास चहलपहल नहीं थी। दुकान में भी बीच बीच में जो एकाद-दो ग्राहक आ-जा रहे थे, उनकी ओर उत्तमचन्द का नौकर ध्यान दे रहा था।

उत्तमचन्द सुबह के अख़बार पढ़ने में व्यस्त था। स्थानिक अख़बारों के साथ साथ उसके यहाँ लाहोर से भी कुरियर से अख़बार आते थे। कल रात रेडिओ पर प्रसारित हुई एक ख़बर से वह का़फ़ी परेशान था। इसलिए विभिन्न अख़बारों में ‘उस’ ख़बर के बारे में और क्या जानकारी मिल सकती है, इसे वह टटोल रहा था। ‘सुभाषबाबू को हरिद्वार के पास साधु के भेस में ग़िऱफ़्तार किये जाने की’ ‘ख़बर’ थी वह! लेकिन सुबह की ख़बरों में, उस ख़बर के ग़लत होने का समाचार प्रसारित कर उस ख़बर का खण्डन किया गया था। इन परस्परविरोधी ख़बरों से दुविधा में पड़ जाने के कारण कम से कम अख़बारों में तो कहीं न कहीं उसके बारे में कुछ लिखा होगा, यह ढूँढ़ने में उलझे हुए उत्तमचन्द को भगतराम के दुकाने में आने का पता ही नहीं चला। थोड़ी देर बाद अख़बार पढ़ना ख़त्म होने पर उसने सिसकियाँ छोड़ते हुए ऊपर देखा, तो उसे भगतराम दिखा। लेकिन पठानी भेस पहने भगतराम को उसने नहीं पहचाना। इससे पहले कि वह ‘ग्राहक की ओर ध्यान दो’ ऐसा नौकर से कहे, उतने में भगतराम ने उसे ‘नहीं’ का इशारा किया और उसके साथ स्थानीय पुश्तू भाषा में बात करना शुरू किया। लेकिन फ़ुटकर औपचारिक संभाषण में ही बातचीत अटक गयी और बार बार पूछने पर भी यह पठान आने का प्रयोजन नहीं बता रहा है, यह देखकर, शायद वह नौकर के सामने अपने दिल की बात नहीं कहना चाहता, यह व्यवसाय में माहिर उत्तमचन्द ने जान लिया और तुरन्त ही नौकर को दो चाय लाने के लिए भेजा।

नौकर के जाने के बाद भगतराम खुलकर बात करने लगा। सबसे पहले, मैं पठान नहीं, बल्कि भारतीय हूँ, यह उसने उत्तमचन्द को बताया। पुराने सांकेतिक शब्द (कोडवर्ड्स), पुरानीं पहचानें ताज़ा करने पर उत्तमचन्द उसे पहचान गया। लहू में देशभक्ति ठसाठस भरे हुए ‘तलवार’ घराने के बारे में वह सम्मान की भावना तो रखता ही था। उसीमें इतने सालों बाद अपने पुराने साथी के मिलने पर तो वह खुशी से झूम उठा।

फ़िर और अधिक प्रस्तावना न करते हुए – काम आत्यन्तिक ज़ोखम भरा है, ऐसा कहकर भगतराम ने सुभाषबाबू के वहाँ आने की ख़बर उसे सुनाई।

सुभाषबाबू के काबूल में होने की ख़बर सुनकर उत्तमचन्द भौचक्का-सा रह गया। पहले तो उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था। लेकिन यह ख़बर सच्ची है, इसका यक़ीन दिलाकर भगतराम ने उसे सुभाषबाबू के कोलकाता से निकलने से लेकर अब तक की सारी दास्ताँ सुनाई। अ़फ़गाणी सीआयडी पुलीस द्वारा परेशान किये जाने की बात तक सारी रामकहानी सुनाकर, किस तरह सुभाषबाबू के लिए अब वह सराई ख़तरे से खाली नहीं रही है, यह बताया। हालाँकि जर्मनी ने सुभाषबाबू को पनाह देने का अभिवचन दिया है, लेकिन उसके लिए शायद कुछ दिन और लग सकते हैं; इसलिए सराई में रहने के बजाय किसी के घर में ठहरना अधिक सुरक्षित होगा यह बताकर उसने, वही उम्मीद लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ, यह उत्तमचन्द से तहे दिल से कहा।

उतने में चाय लेकर नौकर लौटा। इसके बाद भगतराम ने उर्दू में बात करना शुरू कर दिया।

इस अचानक ही उद्घटित हो रहे घटनाक्रम से उत्तमचन्द स्तम्भित ही हो गया था। सुभाषबाबू तो उसके लिए देवतासमान थे। उनके कार्य में उनकी सहायता करने का सौभाग्य प्राप्त हो, इससे सुखकारी बात उसके लिए अन्य कोई नहीं थी। लेकिन वह ‘घरगृहस्थी’वाला आदमी था। यह इतना जोख़म भरा काम क्या मुझसे बन पायेगा, कल को यदि सरकार को इसके बारे में पता चला, तो मेरा घरबार, दुकान ज़ब्त किया जायेगा और बीवी-बच्चे सड़क पर आ जायेंगे, इस बात का डर उसे सता रहा था। साथ ही, वह जिस दो-मंज़िला मक़ान में रहता था, उसकी नीचली मंज़िल उसने किराये पर एक परिवार को रहने के लिए दी थी और वह खुद ऊपरि मंज़िल पर रहता था। अतः उसके घर में किसी के आने-जाने का पता उस किरायेदार को चल ही जाता था। उस किरायेदार की पत्नी की, उत्तमचन्द की पत्नी के साथ दिन में किसी न किसी बहाने कई बार मुलाक़ात हो ही जाती थी। ऐसी स्थिति में सुभाषबाबू को घर में ले जायें तो भी कैसे, ऐसे सवाल उसे सताने लगे।

कुल मिलाकर यह अपने बस की बात नहीं है, यह ध्यान में आने पर वह उसी समय भगतराम से ‘मुमक़िन नहीं’ यह कहनेवाला था, लेकिन इतने सालों बाद मिले भगतराम को तुरन्त ही मायूस बनाकर वापस भेज देना उसे अच्छा नहीं लगा। इसलिए उसने ‘सोचकर बताता हूँ’ यह कहकर भगतराम से शाम को आने का अनुरोध किया।

भगतराम के जाने के बाद उसके दिमाग़ में विचारचक्र शुरू हो गया। दोपहर को दुकान बन्द करके खाना खाने घर जाते समय, उसने इस सन्दर्भ में अपने एक विश्‍वसनीय देशभक्त मित्र की सलाह लेने का तय किया। वह मित्र भी सुभाषबाबू के प्रति सम्मान की भावना दिल में रखता था और उसकी बातों से हमेशा देशप्रेम छलकता था और उनकी बातचीत भी हमेशा ‘भारतीय स्वतन्त्रता’ इस एक ही बात की ओर मुड़ जाती थी। इसके बावजूद भी – ‘क्रान्तिकारियों की सहायता वगैरा ये सब काम हम जैसे साधारण गृहस्थाश्रमी लोगों के बस की बात है ही नहीं। ‘सुभाषबाबू’ यह फ़िलहाल सरकार की दृष्टि से बहुत ही ज्वालाग्राही विषय बन गया है। ज़रा अपने परिवार के बारे में भी सोचो। यदि सरकार को पता चला कि तुमने अपने घर में सुभाषबाबू को पनाह दी है, तो उसका नतीजा क्या हो सकता है, क्या इसके बारे में तुम जानते नहीं हो?’ यह कहकर उस ‘देशभक्त’ मित्र ने उत्तमचन्द को इस विचार से परावृत्त करने का प्रयास किया।

उत्तमचन्द के मन में विचारों का मानो सैलाब आ गया। एक मन कहता था कि यही सर्वोच्च अवसर है देशसेवा में हिस्सा लेने का, उसे मत गँवाना; वहीं, दूसरा सामान्य गृहस्थाश्रमी चिन्ताओं से ग्रस्त मन उसे इस विचार से परावृत्त कर रहा था। क्या करूँ, यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

यहाँ उत्तमचन्द ने सुभाषबाबू को पनाह देने की बात तुरन्त ही न मानकर शाम को आने के लिए कहा, इसलिए भगतराम का दिल भी इस दुविधा से भर गया था कि क्या मैंने यह ठीक किया? अब सुभाषबाबू के काबूल में होने की बात एक और शक़्स जान गया है। यदि इस ख़बर को गुप्त रखने का महत्त्व न जानते हुए उत्तमचन्द ने जोश में आकर कहीं किसी के पास इस बात का ज़िक्र किया, तो गई भैंस पानी में!

इस विचार में व्यस्त भगतराम शाम का इन्तज़ार करने लगा।