नेताजी- १३९

आख़िर काबूल की रशियन एम्बसी की इमारत से रूबरू हो जाने के बाद उस रात सुभाषबाबू चैन की नीन्द सोये। लेकिन उससे पहले उन्होंने अपने मक़सद एवं अगली योजना के बारे में सुस्पष्ट जानकारी देनेवाला एक खत रशियन उच्चायुक्त को देने के लिए रात को ही लिखकर तैयार रख दिया था।

सुबह जल्दी उठकर वे दोनों एम्बसी के पास पहुँच गये। लेकिन एम्बसी में दाख़िल होने से उद्भवित हो सकनेवाले सम्भावित ख़तरे को देखकर वे काबूल नदी पर वहीं पास ही बने हुए एक पूल को पार कर तट पर जा खड़े हो गये। वहाँ से उन्हें रशियन एम्बसी की इमारत सा़फ़ सा़फ़ दिखायी दे रही थी और उनपर कोई शक़ करें, इसकी गुंजाइश भी नहीं थी।

अब था इन्तज़ार! इन्तज़ार!! और बस इन्तज़ार ही!!!

कितने दिन तक….?

….पता नहीं! वैसे तो वह सबकुछ ही अन्धेरे में तीर चलाने जैसा ही था।

यूँ तो दिनभर एम्बसी में लोग आ-जा रहे थे। उसमें केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि निजी काम के लिए आनेवाले लोग भी थे। युनिफ़ॉर्म द्वारा एम्बसी के कर्मचारी को पहचाना जा सकता था। लेकिन रशियन गार्ड्स, अफ़गाणी पुलीस और ब्रिटीश गुप्तचर इन सबसे छिपकर एम्बसी के उन कर्मचारियों को बीच राह रोकना भी मुमक़िन नहीं था। एम्बसी में से किसी काम के लिए बाहर निकले हुए कर्मचारी को ही कुछ दूरी पर जाने के बाद रोका तो जा सकता था; लेकिन इस तरह का मौक़ा उस दिन न मिलने के कारण वह दिन वैसे तो फ़िज़ूल ही गया।

दूसरे दिन एक कर्मचारी से मुलाक़ात करने का अवसर मिल तो गया। हम उच्चायुक्त से मिलकर उन्हें एक ख़त देना चाहते हैं, यह उसे बताने की उन्होंने कोशिश भी की। लेकिन उसने उनकी एक नहीं सुनी। फ़िर दो दिन बाद एम्बसी की दो महिला कर्मचारी कुछ खरीदने के लिए बाजार जाते हुए उन्हें दिखायी दीं और उन्हें रोकने में वे क़ामयाब भी हुए। लेकिन उन दोनों के हुलिये को देखकर वे उन्हें वहाँ के स्थानीय निवासी समझ बैठीं और उस समय की विश्‍वयुद्धकालीन परिस्थिति के कारण एम्बसी के बाहर के किसी अपरिचित स्थानीय लोगों के साथ बातचीत न करने की स़ख्त सूचना उन्हें दी गयी थी और इसीलिए वे उन दोनों से मुँह ङ्गेरकर सीधे रास्ते निकल गयीं।

बीत रहे हर दिन के साथ सुभाषबाबू का मन तड़प रहा था। साथ ही, काबूल में जाड़ों का कहर ढ़ाने के कारण रास्ते भी ब़र्फ़ से भर गये थे। इसीलिए उनके चमड़े के जूतों के भीतर पानी घुसकर वे गीले एवं भारी हो जाते थे। साथ ही, पैर की ऊँगलियाँ भी ब़र्फ़ से सिकुड़कर लकड़ी जैसी स़ख्त हो जाती थीं। मग़र तब भी बिना हारे वे एक अनोखी हिम्मत के साथ पैर ओढ़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।

सुभाषबाबू की हताश स्थिति देखकर भगतराम का दिल दहल जाता था। मग़र तब भी वह उनका हौसला बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकता था? ऐसे वक़्त वह उनके साथ एक ख़ास मज़ेदार संवाद करता था। इस प्रवास की शुरुआत होते हुए जब ऐसे निराशाजनक प्रसंगों का सामना करते हुए मायूस हो चुके भगतराम को देखकर सुभाषबाबू ने ही उसमें जोश जगाने के लिए मज़े से ‘रहमतखान, अब क्या होगा?’ ऐसा पूछा था। उसपर उसने ‘बाबूजी, सब ठीक होगा’ यह कहकर उनका हौसला बढ़ाया था। तब ‘कब?’ यह पूछने पर उसने ‘आज नहीं तो कल’ ऐसा जवाब दिया था और फ़िर दोनों भी हँस पड़े थे। उसके बाद यह संवाद ही उनका, एक-दूसरे को हताश मनःस्थिति में से बाहर निकालने के लिए संकेतात्मक संवाद बन चुका था। किसी परेशानी के के सामने आ जाने पर उनमें से एक दूसरे के साथ ये सवाल-जवाब करता था। उससे इन दोनों को हँसी आ जाती थी और मन की मायूसी दूर होकर वे तरोताज़ा हो जाते थे।

आज भी बिलकुल वैसा ही हुआ। इस संवाद के होने के बाद सुभाषबाबू का मुरझाया हुआ मन फ़िर एक बार सँवर गया। इसी दौरान एम्बसी की वाणिज्य शाखा शाही बाज़ार इला़के में रहने की जानकारी भगतराम ने प्राप्त की थी। कई रूसी व्यापारियों की दुकानें भी वहाँ पर थीं। वहाँ जाकर कोशीश करते हैं, यह सोचकर वे शाही मण्ड़ी में जा पहुँचे। वहाँ के वाणिज्य एम्बसी शाखाप्रमुख तक पहुँचने के लिए उन्होंने वहाँ के कई रूसी व्यापारियों से दऱख्वास्त की। लेकिन उन्होंने ‘फ़िलहाल हमपर सरकार की कड़ी नज़र है’ यह कहकर इस मामले में उनकी किसी भी प्रकार की सहायता करने में असमर्थता ज़ाहिर की। उतने में वाणिज्य दूतावास का प्रमुख ही तेज़ी से अपनी कचहरी में से निकलकर गाड़ी की दिशा में आगे बढ़ रहा था, जिसे दिखाकर एक व्यापारी ने उनसे कहा कि ‘यदि आपकी कोई सहायता कर सकता है, तो वह यही है’ और फ़ौरन उससे वहीं पर मिलने के लिए सूचित भी किया। तब वे दोनों भी दौड़ते दौड़ते उसतक गये। उसने उनकी बात सुन तो ली, लेकिन ‘हम व्यापारी वीज़ा देते हैं, प्रवासी वीज़ा पाने के लिए आपको एम्बसी में ही जाना पड़ेगा’ यह घीसापीटा जवाब देकर, अगली एक बात तक न सुनते हुए वह फ़ौरन गाड़ी में बैठकर चला गया।

अब इस आख़िरी रास्ते के भी बन्द हो जाने के कारण सुभाषबाबू का़फ़ी परेशान से हो गये। इसी तरह वक़्त बरबाद करने से अच्छा है कि फ़िलहाल रशिया जाने की योजना स्थगित करके जर्मन एम्बसी के ज़रिये कोशिश की जाये, यह उन्होंने तय किया। यह जर्मन एम्बसी रशियन एम्बसी के रास्ते पर से कुछ ही दूरी तय करने के बाद लगनेवाली जापानी एम्बसी के बाद विद्यमान है, यह जानकारी भगतराम ने एक दुकानदार से प्राप्त की थी।

अगले दिन जर्मन एम्बसी की ओर आगे बढ़ते हुए अचानक उन्हें रास्ते में ही ब़र्फ़ में बन्द पड़ी हुई एक बड़ीभारी मोटर दिखायी दी। ड्रायवर उसे शुरू करने की बेतहाशा कोशीश कर रहा था। गाड़ी पर ङ्गड़कते हुए राष्ट्रध्वज को का़फ़ी दूर से ही पहचानकर, जिनसे मिलने के लिए तीनचार दिन से लगातार हम इतनी कोशिशें कर रहे हैं, उन रूसी राजदूत की ही यह मोटर है, यह उन्होंने जान लिया और वे दोनों पूरा ज़ोर लगाकर दौड़ते हुए उस गाड़ी के पास पहुँच गये। गाड़ी के अचानक बन्द पड़ने की मुसीबत से वह राजदूत थोड़ाबहुत परेशान ही था। भगतराम आगे बढ़कर उससे बात करने लगा। सुभाषबाबू ज़रा दूरी पर ही खड़े रहे।

भगतराम ने टूटी-फ़ूटी स्थानीय भाषा में उसे अपनी रामकहानी सुनाना शुरू कर दिया।