नेताजी- १३१

इस तरह पहरा देनेवाले गुप्तचरों को चकमा देकर १६ जनवरी १९४१ की देर रात घर से निकले सुभाषबाबू की गाड़ी १७ तारीख़ की सुबह साढ़े-आठ बजे बराड़ी पहुँच गयी। इस मुहिम के पहले पड़ाव को यशस्वी रूप में पार करने के बाद अब सुभाषबाबू का मन इस मुहिम के दूसरे पड़ाव के बारे में सोच रहा था, जो अब बराड़ी में अशोकनाथ के बंगले पर पूरा होनेवाला था। अब इसके बाद वे सुभाषबाबू नहीं, बल्कि एक इन्श्युरन्स कंपनी के मोबाईल एजन्ट ‘महंमद झियाउद्दिन’ बननेवाले थे।

गुप्तचर

शिशिर ने अशोकनाथ के बंगले से का़फ़ी दूरी पर गाड़ी रोक दी और वहीं से सुभाषबाबू को वह बंगला दिखाया। योजना के अनुसार सुभाषबाबू गाड़ी से उतर गये और शिशिर गाड़ी लेकर बंगले में गया। सुभाषबाबू धीरे धीरे बंगले की दिशा में चलने लगे।

बंगले में शिशिर की मुलाक़ात अशोकनाथ से हुई। अशोकनाथ कचहरी जाने की तैयारी कर रहा था। हालाँकि अशोकनाथ इस योजना के बारे में जानता था और वह उसी योजना का एक हिस्सा था, मग़र तब भी इस तर अचानक से पधारे शिशिर को देखकर उसे ताज्जुब हुआ। शिशिर ने फ़ौरन उसे योजना की अबतक की कार्यवाही एवं अगली रूपरेखा के बारे में बताया। फ़िर वे दोनों कुछ देर तक भीतरी कमरे में बातें कर रहे थे। इतने में नौकर यह सन्देश लेकर आया था कि अशोकनाथ से मिलने कोई मुसलमान व्यक्ति आये हैं। अशोकनाथ ने परेशानी की मुद्रा से ‘अरे, अब मेरे कचहरी जाने के वक़्त यह भला कौन टपक पड़ा?’ यह पूछा। तब नौकर ने उस व्यक्ति का व्हिजिटिंग कार्ड लाकर दिया। अशोकनाथ ने देखा तो कोई ‘महंमद झियाउद्दिन’ नाम के इन्श्युरन्स एजन्ट उसके घर आये थे। अशोकनाथ ने उन्हें बाहर के कमरे में बिठाकर उनकी मेहमाननवाज़ी करने के लिए कहा और स्वयं शिशिर के साथ भीतरी कक्ष में ही चाय पीते हुए बातें करने लगा।

थोड़ी देर बाद अशोकनाथ जब कचहरी जाने निकला, तब बाहरी कक्ष में उसका इन्तज़ार कर रहे ‘मेहमान’ से उसका ‘परिचय’हुआ। फ़िर अशोकनाथ ने डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे अपने भाई – शिशिर से उन्हें परिचित कराया। फ़िर झियाउद्दिन ने अपने काम का स्वरूप एवं आने की वजह प्रतिपादित की। अशोकनाथ की कचहरी के अ़फ़सरों का बीमा उतारने के सन्दर्भ में उन्होंने अशोकनाथ से दऱख्वास्त की। तब ‘फ़ीलहाल तो मेरे पास वक़्त नहीं है, इसलिए शाम को कचहरी से लौटने के बाद आराम से बातचीत करेंगे’ यह ‘मेहमान’ से कहा और उन्हें अन्यत्र कोई काम न होने के कारण, अपने ही घर के ‘गेस्ट रूम’ में मेहमान के रुकने का इन्तज़ाम करने तथा वहीं पर उनके दोपहर के खाने की व्यवस्था करने के लिए उसने अपने नौकर से कहा।

दोपहर में अशोकनाथ खाना खाने घर आया और उसने शिशिर के साथ भोजन किया। मेहमान को गेस्ट रूम में ही खाना भेजा गया, ताकि नौकर को शक़ न हो। इसके बाद शाम को अशोकनाथ के घर लौटने के बाद चाय के समय उसकी और शिशिर की मेहमान के साथ बातचीत हुई। उस समय नौकर को कुछ खरीदने के लिए बज़ार भेजा गया, ताकि उसे इस बातचीत के किसी अंश का पता न चले। फ़िर तीनों ने चर्चा की। पहले रात की ‘दिल्ली-कालका मेल’ में असनसोल या धनबाद में से किसी एक स्टेशन से सवार होने की बात तय हुई थी। लेकिन वे दोनों भी रेल के प्रमुख स्टेशन होने के कारण वहाँ पर दिनरात लोगों का ताँता लगा रहता है और साथ ही रेल पुलीसकर्मियों का भी पहरा रहता है; इसलिए यहाँ से गाड़ी न पकड़ते हुए धनबाद के पास के ‘गोमोह’ स्टेशन से गाड़ी पकड़ना बेहतर है, क्योंकि उस छोटे से स्टेशन में गाड़ी रात के साढ़े-बारह बजे आती है, उस समय वहाँ पर लोगों की आवाजाही भी बहुत कम रहती है और इसलिए वह स्थान अधिक सुरक्षित है, यह अशोकनाथ ने कहा। उसे सुभाषबाबू ने मान लिया। लेकिन गोमोह का रास्ता शिशिर नहीं जानता था, इसलिए अशोकनाथ का भी उनके साथ आना तय हुआ। लेकिन उसकी पत्नी सुनसान-सी रात में कम आबादी वाले इला़के में स्थित इस घर में अकेली कैसे रहेगी, यह सवाल उपस्थित हो गया। तब उसे भी हमारे साथ लेने में कोई हर्ज़ नहीं है, यह सुभाषबाबू ने कहा। उसे भी इस नाटक में शामिल करने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़नेवाला था।

तब तक नौकर बाज़ार से लौट आया। उसी समय, मेहमान रात की गाड़ी से वापस जा रहे हैं और इसीलिए उनके रात के खाने का इन्तज़ाम भी थोड़ा जल्दी ही करने के लिए अशोकनाथ ने नौकर से कहा। साथ ही ‘शिशिर भी बहुत दिनों बाद आया है, इसलिए मेहमान के रवाना होने के बाद हम तीनों भी ज़रा टहलने बाहर निकलेंगे’ यह उसने जानबूझकर नौकर से कहा। उसके अनुसार नौकर ने जल्द से जल्द खाना बना दिया। साथ ही, उसे शक़ न हो, इसलिए मेहमान को उनके कक्ष में ही खाना देने के लिए उसे कहा गया। शिशिर, अशोकनाथ और उसकी पत्नी ने भोजन कर लिया। शिशिर वाँडरर में पेट्रोल भरकर लौट आया।

खाने के बाद आठ बजे के आसपास मेहमान ने विदा ली। उसके बाद नौकर भी अपने काम करके घर लौट गया। साढ़े-आठ के आसपास शिशिर, अशोकनाथ और उसकी पत्नी वाँडरर में बैठकर निकले। पहले से ही मुक़र्रर किये गये नियोजित स्थल पर सुभाषबाबू उनकी राह देख रहे थे। उन तीनों ने उन्हें गाड़ी में बिठा लिया। दूध-सी स़फ़ेद चाँदनी बिखरी हुई थी और ठण्डी हवा का झोंका भी बह रहा था। बराडी से गोमोह की दूरी लगभग तीस किलोमीटर की थी और इसलिए पर्याप्त समय होने के कारण गाड़ी बड़े आराम से, बीच बीच में रोककर कुदरती नज़ारों का लु़फ़्त उठाते हुए गोमोह की दिशा में आगे बढ़ रही थी। रास्ते में सुभाषबाबू बहुत सारी बातें भी कर रहे थे और अगली योजना के बारे में भी बता रहे थे।

घड़ी की सुई बस्स अब कुछ ही देर में बारह इस अंक को छूने ही वाली थी कि उसी वक़्त वाँडरर गोमोह स्टेशन में दाखिल हो गयी। सुभाषबाबू के साथ शिशिर और अशोकनाथ भी गाड़ी से उतर गये। ‘रंगाकाकाबाबू’ एक महान ईश्वरीय कार्य की उड़ान भरने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, इस बात का उन्हें यक़ीन था और उस महान कार्य में हमें तिनका उठाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, यह सोचकर वे धन्यता महसूस कर रहे थे।

कूली के पास सामान देकर सुभाषबाबू सामनेवाले प्लॅटफ़ॉर्म की ओर रवाना हुए। अब घर छोड़कर लगभग २४ घण्टें बीत चुके थे। घर से रवाना होने के बाद कम से कम शिशिर, अशोकनाथ ये ‘आप्त’ तो साथ में थे। लेकिन अब उस गाँठ को भी छुड़ाने का समय क़रीब आ रहा था। फ़िर मुलाक़ात होगी भी या नहीं यह तो प्रभु ही जानें, यह सोचकर सुभाषबाबू का हृदय पिघल रहा था। लेकिन आख़िर मन पर पत्थर रखकर सुभाषबाबू ने उन्हें वापस लौटने के लिए कहा – ‘मैं तो चला, तुम भी लौट जाना।’

….और सुभाषबाबू की पठानी भेस पहनी हुई वह आकृति धीरे धीरे अँधेरे में ओझल हो गयी। लगभग साढ़े-बारह बजे ‘दिल्ली-कालका मेल’ आ गयी और दो-तीन मिनट के बाद रवाना भी हुई। अब प्लॅटफ़ॉर्म पर सन्नाटा-सा फ़ैल गया था। शिशिर, अशोकनाथ और उसकी पत्नी अब वापस लौटने के लिए मुड़ रहे थे। ‘रंगाकाकाबाबू’ से अब फ़िर मुलाक़ात होगी भी या नहीं, यह सोचकर व्याकुल हुए शिशिर और अशोकनाथ के मन में सुभाषबाबू द्वारा कहे गये वे आख़िरी लब्ज़ बार बार गूँज रहे थे – ‘मैं तो चला, तुम भी लौट जाना।’