मथुरा भाग-२

मथुरा, इतिहास, अतुलनिय भारत, श्रीकृष्ण, उत्तर प्रदेश, भारत, भाग-२

मानवजीवन में संघर्ष हमेशा ही अटल रहा है। मानव जब आदिम काल में जी रहा था, तब भी जीवन की दैनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तथा स्वयं के अस्तित्व को बचाने के लिए उसे संघर्ष तो करना ही पड़ता था। समय की धारा में आगे बढ़ते हुए वह सभ्यता और नागरी जीवन जीने लगा और इस दैनिक संघर्ष के साथ साथ उसे ‘सत्तासंघर्ष’ इस एक अनोखे ही प्रकार के संघर्ष का सामना करना पड़ा।

नगर, फिर चाहे वह एक साधारण नगर हो या काशी, कांची, मथुरा इनके जैसा पुण्यक्षेत्र हो, हर एक को सत्तासंघर्ष के दौर से गुज़रना पड़ा है और उसके ज़ख़्म भी सहने पड़े हैं। इन सत्तासंघर्षों के कारण ही मथुरा को भी कई आघात सहने पड़े। इन आक्रमकों में से कुछ इसी देश के थे, तो कुछ विदेशी थे।

मथुरा के ज्ञात इतिहास से पता चलता है कि रामायण तथा महाभारत काल में भी इस नगरी ने सत्तापरिवर्तन को देखा है। रामायणकाल में लवणासुर की ज़ुलमी हुकूमत से मथुरा को श्रीराम के भाई शत्रुघ्नजी ने मुक्त किया। उसके बाद महाभारत काल में अनाचारी, दुष्ट, उन्मत्त, क्रूर कंस के कब्ज़े से मथुरावासियों को श्रीकृष्ण ने छुड़ाया। मथुरा का यह इतिहास उसके लिए एवं मथुरावासियों के लिए बहुत सुखदायक ही था, इसमें कोई संदेह नहीं है।

मथुरा के इतिहास में उसपर शासन करनेवालों में मौर्य, शक, कुशाण, शुंग, यवन, नागवंश, गुप्त, हूण, वर्म, गुर्जर, प्रतीहार, गाहडवाल इन विभिन्न राजवंशों का विभिन्न कालखण्ड में शासन रहा है।

ऊपरोक्त राजवंशों के शासनकाल में ही मथुरा पर विदेशी आक्रमण भी हुए। ‘पुण्यक्षेत्र तथा वैभवशाली नगरी’ यह मथुरा का बोलबाला विदेशों में भी फैला हुआ था और कई विदेशी सैलानी भी यहाँ आये थे, यहाँ रहे थे और इस नगरी की सुन्दरता, समृद्धि, वैभव और ऐश्‍वर्य इनके बारे में भी उन्होंने लिखा था।

रामायण, महाभारत काल के बाद ‘शूरसेन महाजनपद की राजधानी’ के रूप में मथुरा का उल्लेख मिलता है। उसके बाद साधारणत: इसा पूर्व चौथी सदी से लेकर दूसरी सदी तक यहाँ पर मौर्य शासन रहा। उसके बाद इसा पूर्व दूसरी सदी तक शुंग राजवंश ने यहाँ पर राज किया।

अंदाजन् इसा पूर्व पहली सदी में मथुरा ने कुशाणों का राज देखा। कुशाणों का शासनकाल यह मथुरा के सांस्कृतिक इतिहास का एक स्वर्णिम पन्ना है। इसी कालावधि में मथुरा में शिल्पकला और मूर्तिकला ने मानों आसमान ही छू लिया था। उस समय बनीं शिल्पाकृतियाँ तथा मूर्तियाँ यह इतिहास का एक अनमोल खज़ाना ही है।

मथुरा में की गयी खुदाई में कई मूर्तियाँ एवं शिल्पाकृतियाँ पायी गयी हैं। साथ ही कुछ शिलालेख भी पाये गये हैं, जिन पर उस समय की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं के उल्लेख और मुख्य रूप से उन्हें लिखवानेवालों के नाम पाये जाते हैं। इन्हें लिखवानेवाले उस उस ज़माने के मथुरा के शासक ही थे।

मथुरा, इतिहास, अतुलनिय भारत, श्रीकृष्ण, उत्तर प्रदेश, भारत, भाग-२; कुशाणों के बाद मथुरा पर शुरू हो गया, शकों का राज। शकों ने उस समय के मथुरा के शासकों को हराकर उसपर सत्ता स्थापित की थी, ऐसा इतिहास कहता है। यह कालावधि भी इसापूर्व की ही है।

इतिहास में कुछ शक शासकों के नाम मिलते हैं, जिनमें से कुछ नाम रानियों के भी हैं। इन राजाओं में से ठोस रूप में दो नाम हमारे सामने आते हैं- ‘राजुवुल’ और ‘शोडास’। इनमें से राजुवुल का उल्लेख कुछ स्थानों पर ‘राजुल’ भी किया गया है। साथ ही ‘नदासि कासा’ इस रानी का भी उल्लेख मिलता है।

इसा पूर्व से लेकर इसा की पहली सदी तक शकों का मथुरा पर शासन रहा होगा, ऐसा इतिहास से ज्ञात होता है।

इन राजुवुल/राजुल, शोडास अथवा ऊपरोक्त रानी का उल्लेख करने का महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि मथुरा में की गयी खुदाई में प्राप्त हुए शिलालेखों एवं स्तंभलेखों में से इनकी जानकारी मिलती है। इसी उत्खनन कार्य में एक सिंह का शीर्ष (सिर) अर्थात् सिंहशीर्ष रहनेवाला स्तंभ भी पाया गया। इस स्तंभ पर लिखे गये लेख में ही इन सबका नामोल्लेख किया गया है।

मथुरा, इतिहास, अतुलनिय भारत, श्रीकृष्ण, उत्तर प्रदेश, भारत, भाग-२; मथुरा के बारे में यह भी जानकारी मिली कि इन शकों के, जिन्हें ‘महाक्षत्रप’ भी कहा जाता था, उनके शासनकाल में मथुरा में रेत से बने स्तंभ/कॅपिटल की स्थापना की गयी, जिसका नाम था- ‘मथुरा लायन कॅपिटल’। शायद यही वह ऊपरोक्त सिंह के शीर्ष के आकार का स्तंभ होगा, जिसका निर्माण किसी राजा की याद में किया गया था।

राजुवुल/राजुल वंश के शासनकाल में यहाँ पर बौद्ध धर्म की जड़ें मज़बूत हुई, यह बात इस स्तंभ पर लिखे वर्णन से ज्ञात होती है; वहीं शोडास के शासनकाल में यहाँ के नागरिकों के लिए की गयीं सुविधाओं का लेखाजोखा भी मिलता है। इतिहास से यह भी ज्ञात होता है कि इन राजुवुल एवं शोडास राजवंशों के शासनकाल में उनकी मुद्राओं का भी निर्माण किया गया था।

मथुरा के अब तक के इतिहास के अध्ययन में हमने सत्तासंघर्ष के कारण मथुरा में हुए परिवर्तनों को देखा; लेकिन इन सबके बावजूद भी एक पुण्यक्षेत्र की दृष्टि से रहनेवाला मथुरा का महत्त्व अबाधित ही रहा और साथ ही मथुरा का वैभव भी। दर असल इन विभिन्न शासकों के शासनकाल में मथुरा का विकास हुआ और उसकी शोहरत बढ़ती ही रही।

इसके बाद जिन राजवंशों ने मथुरा पर राज किया उनकी संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करते हैं। शायद आपको यह इतिहास थोड़ा बहुत जटिल भी लग सकता है, लेकिन वह एक वैभवशाली नगरी का सफ़र है।

नागवंश की सत्ता मथुरा में प्रस्थापित होने के सबूत वहाँ की खुदाई में मिली मुद्राओं से प्राप्त हुए हैं। मथुरा के इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करने में सबसे अधिक योगदान है, वहाँ किये गये उत्खनन कार्य का।

आगे चलकर गुप्त राजवंश का मथुरा पर शासन रहा और उनके बाद हूणों की हुकूमत यहाँ पर थी। दर असल गुप्त राजवंश ने उनके शासनकाल में इन हूणों को सीमापार कर दिया था। लेकिन गुप्त राजवंश का र्‍हास होने के पश्‍चात् फिरसे इन हूणों ने दखलअंदाज़ी करना शुरू कर दिया और अन्त में स्वयं की सत्ता स्थापित कर ही दी। इस मथुरा का ही आधारभूमि के रूप में उपयोग करके उन्होंने आसपास के इलाके पर, यहाँ तक की मध्य भारत पर भी आक्रमण किये। संक्षेप में, हूणों के आक्रमण की चपेट में मथुरा भी आयी थी और यहाँ पर उन्होंने काफ़ी विध्वंस भी किया था।

वर्धन राजाओं के शासनकाल में मथुरा का वर्णन एक शांत एवं वैभवशाली नगरी के रूप में किया गया है। इसका अर्थ यह है कि उनके शासनकाल में शायद सत्ता स्थिर रही होगी और और संघर्ष, आक्रमण इनका भी डर नहीं रहा होगा।

राजपूतों के शासनकाल में हालाँकि मथुरा को राजधानी का दर्जा तो नहीं था; मग़र फिरभी उस समय में धार्मिक दृष्टि से उसका महत्त्व अबाधित था।

गज़नी का महमूद जब भारत आया, तब उसकी नज़र मथुरा की तरफ़ भी गयी। यही है वह गज़नी का महमूद, जिसने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था और बेतहाशा लूटपाट की थी।

उसने जब मथुरा पर धावा बोला तब मथुरा के शासक ने मथुरा को बचाने के फ़र्ज़ को निभाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी, लेकिन वह उसमें कामयाब नहीं रहा। लगभग बीस दिनों तक वह मथुरा को लूट रहा था। अनगिनत धनसंपत्ति को उसने लूट लिया और यहाँ के प्रार्थनास्थलों को भी ध्वस्त कर दिया।

मथुरा के वैभव पर, उसकी सुन्दरता पर और धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहनेवाले वहाँ पर स्थित स्थानों पर किया गया यह एक भयानक हमला था। गज़नी के महमूद के हमले के बाद भी कई बार इस नगरी को आघात सहने पड़े। लेकिन हर बार इन आघातों को पचाकर यह नगरी पुन: विकास के पथ पर चलती रही। मग़र फिर भी इन आक्रमणों के कारण उसके गतवैभव की काफ़ी हानि हुई, कई बातें तो नष्ट हो गयीं। एक राजधानी की समृद्धि, शान ख़त्म हो गयी।

इसके बाद मथुरा पर कई राजाओं का राज रहा। हालाँकि इतिहास उनके अस्तित्व को बयान तो करता है; लेकिन यह बात सच है कि इस मथुरा का ठाट पहले की मथुरा जैसा नहीं रहा। भारत के आज़ाद होने के पूर्व मथुरा पर शासन करनेवाले आख़िरी शासक थे, विदेशी अँग्रेज़।

समय के साथ साथ यमुना में से काफ़ी सारा जल बह गया। मग़र आज भी मौजूद हैं, मथुरा के इतिहास के दो गवाह, मथुरा नगरी की मिट्टी और यमुना नदी का पात्र।