क्रान्तिगाथा-५६

कई भारतीय क्रांतिवीरों के चरित्र को देखने के बाद एक प्रमुख बात हमारी समझ में आती है कि ‘भारत की स्वतंत्रता’ यह इन क्रांतिवीरों की सांस बन चुकी थी और फिर चाहे वे क्रांतिवीर इस विश्‍व में कहीं भी हो, उनके आसपास की परिस्थिती कैसी भी हो, ये क्रांतिवीर उनकी ‘इस सांस’ के लिए उनकी आखिरी सांस तक और खून की आखिरी बूंद तक लडनेवाले ही थे।

इसीलिए जापान जाने के बाद भी रासबिहारी बोस निष्क्रिय नहीं हुए। जापान में कई बार उन्हें भेंस बदलकर और नाम बदलकर, तो कभी भूमिगत होकर रहना पडा क्योंकि उन्हें अँग्रेज़ सरकार से पिछा छुडाना था।

जापान में एक लेखक और पत्रकार के रूप में उनकी पहचान हुई। भारत की स्वतंत्रता के लिए चल रहे प्रयासों को जापान में स्थित कईयों का समर्थन और सहकार्य प्राप्त होने के पीछे रासबिहारी बोस का महत्त्वपूर्ण योगदान था।

जापान में ही उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नामक समाचारपत्र की शुरुआत की। साथ ही जापानी भाषा सीखकर उस भाषा में किताबें भी लिखी।

टोकियो में रासबिहारी बोस द्वारा २८ मार्च से लेकर ३० मार्च १९४२ तक एक कॉन्फरन्स का आयोजन किया गया था। इसमें ‘इंडियन इंडिपेन्डन्स लीग’ की स्थापना करने का निर्णय लिया गया। इस इंडियन इंडिपेन्डन्स लीग के अंतर्गत भारतीय सैनिकों की एक सेना बनायी जानेवाली थी और यह सेना भारत की आजादी के लिए लडनेवाली थी।

२२ जून १९४२ में इस लीग की दूसरी कॉन्फरन्स बुलायी गयी और इसके अध्यक्ष के रूप में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आमंत्रित करने का तय किया गया।

दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान अँग्रेज़ों के पक्ष से लडनेवाले भारतीय सैनिकों को जापान द्वारा पकडकर युद्धबंदी बनाया गया था। उन्हीं सैनिकों में से एक आर्मी का गठन करने की योजना बनायी गयी और यह ‘इंडियन नॅशनल आर्मी’ अब भारत की आजादी के लिए लडनेवाली थी।

क्रान्तिगाथा, इतिहास, ग़िरफ्तार, मुक़दमे, क़ानून, भारत, अँग्रेज़लेकिन यह योजना प्रत्यक्ष में उतरने के बाद भी कार्यान्वित न हो सकी। इसी आधार पर आगे चलकर सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद सेना’ की स्थापना की।

निस्सीम देशभक्त रहनेवाले रासबिहारी बोस के जीवन का एक ही उद्देश था और वह था भारत की आजादी और इसी उद्देश को पूरा करने के लिए जापान से ही उनका कार्य जारी था। जापानी अधिकारियों के साथ रहनेवाले उनके मित्रतापूर्ण संबंधों के कारण भारत की आजादी के लिए की जानेवाली कोशिशों में जापान में उन्हें सहकार्य प्राप्त हो रहा था।

इस प्रकार अथक परिश्रम करनेवाले रासबिहारी बोस भारत की आजादी की भोर देख नहीं पाये। भारत की आजादी के केवल २ वर्ष पूर्व ही २१ जनवरी १९४५ में टोकियों में उनका देहान्त हो गया।

सन १९१४ में शुरू हो चुके प्रथम विश्‍वयुद्ध (फर्स्ट वर्ल्ड वॉर) के दौरान भारतीय सैनिक अँग्रेज़ों के पक्ष में से विश्‍व के अन्य देशों के खिलाफ यानी विश्‍वयुद्ध में अँग्रेज़ों के शत्रुओं के खिलाफ लडे। भले ही भारत में इस प्रथम विश्‍वयुद्ध की घटना से स्वतंत्रता संग्राम को कुछ खास ङ्गायदा न हुआ हो, मगर भारत के बाहरी देशों में रहनेवाले भारतीयों द्वारा इस घटना की पार्श्‍वभूमि पर फिर एक बार कोशिशें शुरू हो गयी।

जर्मनी में पढने गये भारतीय छात्र और नौकरी-व्यवसाय हेतु गये भारतीयों द्वारा सन १९१४ में एक संगठन की स्थापना की गयी। इसका उद्देश एक ही था – भारत को आजाद करने की कोशिश करना।

इस संगठन का नाम रखा गया – ‘बर्लिन-इंडिया कमिटी’। इस संगठन की स्थापना के पीछे इंडिया हाऊस का ही बीज था।

जैसे जैसे इंडिया हाऊस की गतिविधियाँ तेजी से शुरू हो गयी वैसे वैसे उसके कार्य पर अँग्रेज़ों द्वारा पाबंदी लगायी जाने लगी और आगे चलकर उन्हें कार्य करना मुश्किल कर दिया। इससे इंडिया हाऊस से जुडे अग्रणी व्यक्तित्वों में से कई लोग जर्मनी गये। इनमें से एक थे-वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय। जो इस बर्लिन-इंडिया कमिटी के मुख्य सदस्यों में से एक थे।

सन १९१५ के बाद यह कमिटी ‘इंडियन इंडिपेन्डन्स कमिटी’ इस नाम से जानी जाने लगी और इसी कमिटी ने हिंदु-जर्मन कॉन्स्पिरसी की योजना बनायी।

जर्मनी स्थित भारतीयों को अब भारत के क्रांतिवीरों से सहायता प्राप्त होने लगी थी। अब शस्त्र-अस्त्रों की उपलब्धि, निर्मिती, उन्हें चलाने का प्रशिक्षण इन विषयों पर कमिटी के सदस्यों का ध्यान केंद्रीत हुआ था। क्योंकि ब्रिटन १९१४ में जब प्रथम विश्‍वयुद्ध में व्यस्त था, तब इस कमिटी के सदस्य अँग्रेज़ों के खिलाफ कुछ गतिविधियाँ करके भारत को आजाद करना चाहते थे।