७३. १९४० के दशक में….

इसके पश्‍चात् के सन १९३९ से १९४५ के छः साल दूसरे विश्‍वयुद्ध के थे। इस दौरान युरोप में, ख़ासकर नाझी जर्मनी में ज्यूधर्मियों को अनन्वित यातनाएँ भुगतनी पड़ीं; लेकिन खुद पॅलेस्टाईन प्रान्त में बहुत मन्थन होकर, ज्यूधर्मियों को स्वतन्त्रता की ओर ले जानेवालीं कई बातें घटित होने लगी थीं।

१ सितम्बर १९३९ को पोलंड पर हमला कर हिटलर के जर्मनी ने दूसरे विश्‍वयुद्ध का बिगुल बजाया। पहले दो दिन जर्मन बाँबर विमानों ने पोलंड पर बम बरसाये। इन हमलों में, पोलंड के निवासी होनेवाले हज़ारो ज्यूधर्मीय भी मारे गये। उसके बाद ३ सितम्बर को ब्रिटन एवं फ्रान्स ने जर्मनी के खिलाफ़ युद्ध घोषित किया। अब ब्रिटन भी युद्ध में खींचा गया था।

लेकिन युद्ध में इतने व्यस्त होने के बावजूद भी, पॅलेस्टाईन के ज्यूधर्मियों के प्रति ब्रिटिशों ने अपनाया स़ख्त रवैया अंशमात्र भी नर्म नहीं हुआ था। विभिन्न स्थानों से बोट में से पॅलेस्टाईन ‘अवैध रूप में’ (बिना परवानापत्र के) आनेवाले ज्यूधर्मीय स्थलांतरितों को रोककर उनकी बारिक़ी से जाँच करने का और उन्हें हिरासत में लेने का सत्र अभी भी क़ायम था। ‘कोटा’ पद्धति होने के कारण, केवल परवानाप्राप्त ज्यूधर्मियों को ही पॅलेस्टाईनप्रवेश की अनुमति मिलती थी। अतः पॅलेस्टाईन में स्थलांतरित होने के लिए ‘ज्युईश एजन्सी’ का बाक़ायदा परवानापत्र न होनेवाले ज्यूधर्मीय ‘अवैध’ माने जाते थे। ऐसे ज्यूधर्मियों को गिरफ़्तार कर, उन्हें युद्ध ख़त्म होने के बाद पुनः, वे जिस देश से आये हों, उसी देश में वापस छोड़ आने का ़फैसला किया गया था।

लेकिन इसमें से भी तरक़ीब सोचकर मार्ग निकाला गया था। पॅलेस्टाईनस्थित ज्यूधर्मियों ने प्रगल्भता दिखाकर इस विश्‍वयुद्ध में ब्रिटन और दोस्तराष्ट्रों की सहायता करने का ़फैसला किया था। इस कारण ब्रिटीश सेना में पॅलेस्टाईनस्थित ज्यूधर्मियों की भर्ती शुरू हुई थी। लेकिन यहाँ सेना में भर्ती करते समय, वे ‘वैध’ हैं या ‘अवैध’, इस बात को हेतुपुरस्सर नज़रअन्दाज़ किया जा रहा था। इस कारण, स्थलांतरण का परवानापत्र न होनेवाले ज्यूधर्मियों को भी धीरे धीरे पॅलेस्टाईन में प्रविष्ट कराने के उद्देश्य से ज्यूधर्मीय इस सेनाभर्ती उपक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागी हुए थे।

साथ ही, ज्यूधर्मियों ने स्वसुरक्षा के लिए गठन किये हुए ‘हॅगाना’ इस निमलष्करी दल ने, इस विश्‍वयुद्ध का मौका साधकर अपने आधुनिकीकरण की – अर्थात् एक सशस्त्र आधुनिक सेने बनने की भी शुरुआत की थी। यहाँ तक कि फ़सलों पर जंतुनाशक-स्प्रे करनेवाले विमानों का भी इस्तेमाल कर भावी हवाईदल की नींव बनाने की शुरुआत की थी।

विन्स्टन चर्चिल जैसे कुछ ब्रिटीश नेता ये तो – ‘ज्यूधर्मियों को स्वसुरक्षा के लिए आधुनिक शस्त्रास्त्र दिये जाने चाहिए’ इस मत के थे। ‘ऐसा करने से हाल का विश्‍वयुद्धसमय में ब्रिटिशों की जो ११ बड़ीं सेनाटुकड़ियाँ (बटालियन्स) पॅलेस्टाईन में शांति क़ायम रखने के लिए ही उलझी हुई हैं, उनका इस्तेमाल हम विश्‍वयुद्ध के लिए अन्यत्र कर सकेंगे। साथ ही, ज्यूधर्मियों को पॅलेस्टाईन प्रांत में ज़मीनें ख़रीदने के लिए प्रतिबंध करना यानी पॅलेस्टाईन का कृषि-विकास रोकने जैसा ही है’ ऐसा चर्चिल का युक्तिवाद था। लेकिन तत्कालीन ब्रिटीश प्रधानमन्त्री चेंबरलेन के मंत्रिमंडल के कई नेताओं का उसे विरोध होने के कारण, ‘ज्यूधर्मियों को यदि शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति की, तो उल्टा पॅलेस्टाईन प्रांत में सिरदर्द बढ़ जायेगा और हम अरबविश्‍व को नाराज़ कर बैठेंगे’ ऐसा विरोधी युक्तिवाद किया जाकर, चर्चिल का यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका और ज्यूधर्मियों को अधिकृत रूप से शस्त्रास्त्र मिलने का मार्ग बंद हो गया।

लेकिन आनेवाले समय का अँदाज़ा होने के कारण हॅगाना ने अपनी आधुनिक शस्त्रास्त्रों की राशि गुप्त रूप में बढ़ाने पर ज़ोर दिया था। दुनियाभर के ज्यूधर्मियों से या ज्यूधर्मियों के हितैषियों से विभिन्न मार्गों से ये शस्त्र कम-अधिक संख्या में हॅगाना को प्राप्त होते थे, जिनका सुनियंत्रित रूप में विभिन्न गाँवों में वितरण किया जाता था। प्रत्येक गाँव स्थित हॅगाना के युनिट की शस्त्रराशियाँ किसी के घर में या तत्सम स्थान में छिपाये जाते थे। लेकिन इसकी भनक लगते ही कई बार ब्रिटीश अफ़सर गाँवों में इन ग़ैरक़ानूनी शस्त्रराशियों के लिए छापे मारते थे। लेकिन इसे भी चतुराई से मात देने की कोशिशें हॅगाना द्वारा की जाती थीं।

ऐसा ही एक वाक़या इस्रायल के दिवंगत ज्येष्ठ नेता शिमॉन पेरेस ने बताया था। वे जब छात्रावस्था में थे, तब एक बार उनके गाँव में ब्रिटीश पुलीस छापा मारने के लिए आ रहे होने की ख़बर वहाँ के ज्यूधर्मीय नेताओं को लगी। तब उन्होंने तत्परता से गाँव के सब ज्यूधर्मीय बच्चों को इकट्ठा कर एक विशिष्ट स्थान में पढ़ाई करने के लिए लाकर बिठाया और वहाँ स्कूल के क्लासेस शुरू हैं ऐसा दिखावा निर्माण किया। यह ब्रिटीश पुलीसपार्टी घर-घर मेें और अन्य स्थानों की तलाशी लेते हुए यहाँ पर भी आयी; लेकिन उन स्कूली बच्चों ने पहले बतायेनुसार पढ़ाई में दंग होने का ज़ोरदार नाटक किया। वह नज़ारा देखकर, वहाँ कुछ भी ‘संदेहास्पद न मिलने के कारण’, वहाँ की तलाशी न लेते हुए ही पुलीस अगले स्थान पर चली गयी। दरअसल उसी जगह के नीचे होनेवाले एक तहखाने में वहाँ के हॅगाना युनिट की एक बड़ी शस्त्रराशि छुपायी गयी थी। गाँव के ज्युईश नेताओं के प्रसंगावधान के कारण और उन बच्चों के साहस से हॅगाना की यह बड़ी ही शस्त्रराशि बच गयी थी।

इसीके साथ, ब्रिटीश मँडेटरी पॅलेस्टाईन प्रान्त में सलग ज्युइश बस्तियों की व्याप्ति बढ़ाने का काम भी नये नये किब्बुत्झ के माध्यम से धीरे धीरे शुरू ही था।

सन १९३९ के अक्तूबर महीने में जर्मनी तथा मध्य युरोप से आये युवा ज्यूधर्मीय स्थलांतरितों ने एकसाथ होकर ‘मृत समुद्र’ (‘डेड सी’) से सटकर ‘बैत हा-अरावाह’ इस किब्बुत्झ का निर्माण किया। यह किब्बुत्झ खेती के प्रयोगों के लिए आगे चलकर विख्यात हुआ। ‘डेड सी’ की अतिक्षारता पुरातन समय (‘बिब्लिकल टाईम्स’) से ज़ाहिर ही है। स्वाभाविकतः उसके आसपास की ज़मीन नमकीन क्षारमिश्रित थी और वह पुरातन समय से ही अनुपजाऊ मानी गयी होने के कारण बंजर ही पड़ी थी। यहाँ पर किब्बुत्झ शुरू करते समय इन स्थलांतरितों ने वहाँ की ज़मीन की सबसे ऊपरी नमकीन क्षारमिश्रित सतह, बाजू में से बहनेवाली जॉर्डन नदी के पानी से धो-धोकर पूर्णतः निकाल दी और उसके नीचे होनेवाली ज़मीन की सतह पर विभिन्न प्रयोग कर उस ज़मीन को ऊपजाऊ बनाया। वहाँ सब्ज़ियाँ और फलों के पेड़ उगाये जाने लगे।

इसी प्रकार के और भी कुछ किब्बुत्झ इस दौरान शुरू किये गये थे। सन १९४० में जर्मनी से स्थलांतरित हुए उच्चशिक्षित ज्यूधर्मियों ने एकसाथ आकर भूमध्यसमुद्र के किनारी भाग में ‘बैत यित्झॅक’ यह किब्बुत्झ (निम्बुवर्गीय फल उगाना यह प्रमुख व्यवसाय); साथ ही, जर्मनी से ही स्थलांतरित हुए कुछ ज्यूधर्मियों ने किनारी भाग में शुरू किया ‘स्दोत याम’ यह संकुल (मच्छिमारी यह प्रमुख व्यवसाय) ये प्रमुख उदाहरण हैं। ‘स्दोत याम’ का उपयोग बहुत ही ख़ूबी से, परवानापत्र न होनेवाले युरोपियन स्थलांतरित ज्यूधर्मियों को पॅलेस्टाईन प्रांत में घुसाने के लिए भी किया जाता था।

इस प्रकार, इस द्वितीय विश्‍वयुद्धकाल में ब्रिटिशों का पॅलेस्टाईनविषयक रवैया हालाँकि ज्यूधर्मियों के विरोध में था, ज्यूधर्मीय उसके कारण न रुकते हुए उसमें से जैसे तैसे मार्ग निकाल रहे थे।(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर

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