डॉ. सी. एन. आर. राव (चिंतामणि नागेसा रामचंद्र राव)

अमरिका के व्हर्जिनिया प्रांत में लँगले रिसर्च सेंटर है और वहाँ पर उन्नत अंतरिक्ष तकनीकी ज्ञान के संशोधन एवं विकास से संबंधित काम चलता है। इस केन्द्र के स्वागतकक्ष में दो घोड़ों के दौड़ रहे रथ का शिल्प है। एक घोड़ा संधोशन का तो दूसरा तकनीकी ज्ञान की प्रगति को दर्शाता है। संशोधन एवं उसे व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिए की जा रही शास्त्रीय कोशिशें इनमें होनेवाला बेजोड़ संबंध इससे दर्शाया गया है, क्योंकि इनके एकत्रित रुप में होने पर ही प्रगति का रथ आगे ले जाया जा सकता है, यह दर्शानेवाला यह शिल्पकला है। ऐसी ही वैचारिक धारणा रखनेवाले भारतीय संशोधक के रूप में डॉ. सी. एन. आर. राव का उल्लेख भी ज़रूर कर सकते हैं। आज भारत में कार्यरत रहनेवाले प्रसिद्ध शास्त्रज्ञों में से एक प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध संशोधक के रूप में डॉ. राव का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है।

डॉ. चिंतामणि नागेसा रामचंद्र राव को प्रो. सी. एन. आर. राव इस नाम से अधिक जाना-पहचाना जाता है। ३०, जून १९३४ के दिन बेंगलुरु में प्रो. राव का जन्म हुआ। बंगलुरु, मैसूर राज्य से प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करके आगे १९५१ में मैसूर महाविद्यालय से बी.एस.सी. वहीं १९५३ में बनारस हिन्दू महाविद्यालय से उन्होंने स्नातकोत्तर शिक्षा पूर्ण की। अमरीका से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर डॉ. राव भारत लौट आये। १९५९ में उन्होंने ‘इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स’ नामक संस्था में प्राध्यापक के तौर पर अपने कार्य की शुरुआत की। १९६३ में आय. आय. टी. (कानपूर) के रसायनशास्त्र विभाग प्रमुख के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई साथ ही उन्हें वहाँ के संशोधन विभाग के प्रमुखपद का कार्यभार भी सौंप दिया गया।

१९७६ में प्रो. राव पुन: इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स में लौट आए। वहाँ पर सॉलिड स्टेट एवं स्ट्रक्चरल केमिस्ट्रि विभाग और मटेरियल रिसर्च लॅबोरेटरी के लिए मूलभूत कार्य करते हुए १९८४ तक उसका नेतृत्व किया, इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स के संचालक भी वे ही थे। प्रो. राव के ही योगदान के कारण भारत सरकार ने १९८९ में पंडित जवाहरलाल नेहरूजी के जन्मशताब्दी के अवसर पर ‘जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर ऍडव्हान्स सायन्टिफिक रिसर्च की स्थापना की। इस संस्था के वे संस्थापक एवं अध्यक्ष भी हैं।

मोलॅक्युलर स्ट्रक्चर के परीक्षण हेतु आरंभिक में प्रो. राव ने स्पेक्ट्रोस्कोपिक पद्धति का अवलंबन किया था। इसके कार्यक्षत्र के अन्तर्गत ही उन्होंने विभिन्न प्रकार के धातुओं के जैसे सल्फाइड / ऑक्साईड के गुणविशेष की खोज़ कर उनके एकत्रितकरण के मॉडल्स विकसित किए। प्रो. राव एवं उनके सहकारी संशोधको ने ‘हाय टेंपरेचर’ सुपरकण्डक्टिव्हिटी फेज Y Ba 2 Cu 307 इस प्रकार अपनी पह्चान बनाने में सर्वप्रथम यशस्वी हुए।

फिलहाल कुछ वर्षों से प्रो. राव ने ‘नॅनोपार्टिकल्स’ इस क्षेत्र की ओर अपने संशोधन कार्य को मोड़ दिया है। डिपार्टमेन्ट ऑफ सायन्स ऍण्ड टेक्नॉलॉजी की धराहोर पर नॅनो सायन्स ऍण्ड टेक्नॉलॉजी इनिशिएटिव्ह (NSTI) की शुरुआत करने के लिए प्रो. राव प्रयत्नशील हैं।

रॉयल सोसायटी (लंडन), नॅशनल ऍकॅडमी ऑफ सायन्स (अमरिका), रशियन ऍकॅडमी ऑफ सायन्स, फ्रेंच ऍकॅडमी ऑफ सायन्स तथा जपान ऍकॅडमी आदि देशी विदेशी विज्ञान संस्थाओं का सदस्यत्व उन्हें प्राप्त हुआ है।

इंटरनॅशनल युनियन ऑफ प्युअर ऍण्ड ऍप्लाईड केमिस्ट्री (१९५८-८७) ‘द थर्ड वर्ल्ड ऍकॅडमी ऑफ सायन्स (२०००) और ‘द इंडियन ऍकॅडमी ऑफ सायन्स’ (१९८९-९१) नामक इस संस्था के अध्यक्ष पद पर वे विराजमान रहे।

१९७४ में ‘पद्‌मश्री’, १९८५ में ‘पद्‌मविभूषण’ इस प्रकार के नागरी सम्मान से और २००६ में भारतीय विज्ञान पुरस्कार भारत सरकार की ओर से उन्हें प्रदान किया गया। २००० में ‘रॉयल सोसायटी’ (लंडन) की ओर से ह्युजेस पुरस्कार देकर उन्हें गौरवान्वित किया गया एवं कर्नाटक राज्य के ‘कर्नाटकरत्न’ सम्मान से उन्हें विभूषित किया गया है। विविध क्षेत्रों के देशी और विदेशी पुरस्कार प्राप्त करनेवाले इस संशोधक कर्ता ने १५०० रिसर्च प्रसिद्ध किए तथा ४२ पुस्तकों का लेखन एवं संपादन कार्य किया है। २००५ ने प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहगार कमेटी के प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति की गई है।

आज दुनिया में अव्वल दर्जा के सॉलिड स्टेट एवं मटिरिअल रसायनतज्ञ के रूप में प्रो. राव की अपनी पहचान है। पाँच दशकों से अधिक समय तक भारतीय विज्ञान क्षेत्र को उनका बहुमूल्य योगदान प्राप्त हो रहा है।