अरुणाचल प्रदेश की चीन सीमा के पास निर्माण किए जाने वाली रेल परियोजनाओं को गति

नई दिल्ली – चीन सीमा के पास स्थित अरुणाचल प्रदेश में तवांग तक जाने वाले व्यूहरचानात्मक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं पर तेजी से काम करने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश की अन्य परियोजनाओं को भी गति दी जाने वाली है।

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चीन ने भारतीय सीमा के पास स्थित अपनी सीमा में बड़े पैमाने पर लष्करी बुनियादी ढांचा विकसित किया है। कुछ दिनों पहले ही चीन ने तिब्बत तक नए रेल मार्ग का निर्माण कार्य पूरा किया है। उस वजह से युद्ध के समय चीन को भारतीय सीमा तक युद्ध सामग्री तेजी से लाने में आसानी होने वाली है। इस पृष्ठभूमि पर भारत ने भी सीमा के पास की योजनाओं को गति दी है। पिछले हफ्ते रेलवे राज्य मंत्री आर. गोहेन की अध्यक्षता में नॉर्थईस्टर्न फ्रंटीअर रेलवे (एनएफआर) की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस समय अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी उपस्थित थे। इस दौरान अरुणाचल प्रदेश की नई रेल परियोजनाओं का मुआइना किया गया।

अरुणाचल प्रदेश में कुछ रेल मार्ग निर्माण करने का निर्णय इसके पहले ही लिया गया था। उसके अनुसार ११ रेल परियोजनाओं के लिए सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया है। दो परियोजनाओं के सर्वेक्षण का कार्य पूरा हो गया है। इसमें ‘भालूकपांग-तेंगा-तवांग’, ‘पासिघाट-तेझू-परशुरामकुंड-रुपाई’ और ‘सिलापथूर-बामे-आलो’ इन रेलमार्गों का प्रस्ताव ‘नेशनल सिक्यूरिटी कौंसिल सेक्रेटरिएट’ (एनएससीएस) ने दिया था। रेलवे राज्यमंत्री की बैठक में व्यूहरचनात्मक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण साबित होने वाली इस परियोजनाओं का कार्य तेजी से पूरा करने का निर्णय लिए जाने की खबर है।

इसमें से ‘भालूकपांग-तेंगा-तवांग’ यह मार्ग लष्करी दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मार्ग समुद्री सतह से काफ़ी उंचाई पर निर्माण किया जाने वाला है। यह मार्ग युद्ध के समय लश्करी सामग्री और जवानों का परिवहन करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। भालूकपांग से तवांग यह अंतर सड़क मार्ग से २८५ किलोमीटर है।

यह रेलमार्ग १६६ किलोमीटर का है और ८० प्रतिशत मार्ग भूमिगत रहने वाला है। इसमें २९.४८ किलोमीटर के अब तक के सबसे लंबी सुरंग के प्रस्ताव का भी समावेश है।

यह परियोजना जल्द से जल्द पूरी करने के लिए सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाने वाली है। परियोजना के सर्वेक्षण का काम पूरा होने पर छः से सात सालों में यह मार्ग पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।