परमहंस-१२०

परमहंस-१२०

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख श्रद्धावान के मन में ईश्‍वर के प्रति, अपने सद्गुरु के प्रति होनेवाली उत्कटता में कितनी आर्तता होनी चाहिए, इसके बारे में बताते हुए रामकृष्णजी ने कुछ उदाहरण दिये – ‘एक बार हमारे यहाँ आनेवाले एक भक्त को कहीं पर तो बबूल का एक पेड़ दिखायी दिया। उस बबूल के पेड़ […]

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परमहंस-११९

परमहंस-११९

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख ‘जैसे जैसे श्रद्धावान भक्तिमार्ग प्रगति करता जाता है, वैसे वैसे – ‘ईश्‍वर श्रद्धावान के नज़दीक ही होते हैं और वह भी सक्रिय रूप में’ यह एहसास उस श्रद्धावान के दिल में जागृत होता रहें ऐसे अधिक से अधिक संकेत उसे प्राप्त होते रहते हैं। उसके जीवन में ईश्‍वर की विभिन्न […]

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परमहंस-११८

परमहंस-११८

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख सांसारिक इन्सानों के लिए रामकृष्णजी के उपदेश अत्यधिक सीधेसादे-सरल हुआ करते थे – ‘यह गृहस्थी भी उस ईश्‍वर ने ही उन्हें प्रदान की है, इस बात का एहसास सांसारिक लोग रखें और इस कारण विश्‍वस्तबुद्धि से (‘ट्रस्टीशिप’), लेकिन प्यार से गृहस्थी निभायें। अपने परिजनों के प्रति रहनेवाले अपने कर्तव्य प्रेमपूर्वक […]

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परमहंस-११७

परमहंस-११७

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी के दौर में प्रायः भक्तिमार्गी समाज में होनेवाला प्रमुख विवाद था – निर्गुण निराकार ईश्‍वर सत्य है या सगुण साकार? इनमें से किसी भी एक संकल्पना को माननेवाले कई बार रामकृष्णजी के पास आते थे और रामकृष्णजी अपने तरी़के से, विभिन्न उदाहरण देकर उन्हें समझाते थे। ईश्‍वर मूलतः निर्गुण […]

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परमहंस-११६

परमहंस-११६

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख एक बार रामकृष्णजी से मिलने आये एक बैरागी से उन्होंने – ‘तुम कैसे भक्ति करते हो’ ऐसा पूछा। उसपर उसने – ‘मैं केवल नामस्मरण करता हूँ, क्योंकि हमारे शास्त्रों द्वारा कलियुग में ईश्‍वरप्राप्ति का वही प्रमुख साधन बताया गया है’ यह जवाब दिया। ‘सच कहा तुमने’ रामकृष्णजी ने कहा, ‘लेकिन […]

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परमहंस-११५

परमहंस-११५

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख ईश्‍वरप्राप्ति के लिए श्रद्धावान को चाहिए कि वह शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आदि भावों से ईश्‍वर को देखना सीखें; इन भावों की उत्कटता को बढ़ाएँ। ‘शांत’ भाव – ईश्‍वरप्राप्ति के लिए तपस्या करनेवाले हमारे प्राचीन ऋषि ईश्‍वर के प्रति शांत, निष्काम भाव रखते थे। वे किसी भौतिक सुखोपभोगों के […]

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परमहंस-११४

परमहंस-११४

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी यह कभी नहीं चाहते थे कि उनके शिष्यगण सूखे ज्ञानी – क़िताबी क़ीड़ें बनें। इस कारण – महज़ धार्मिक ग्रंथों के एक के बाद एक पाठ करने की अपेक्षा, उन ग्रन्थों में जो प्रतिपादित किया है उसे जीवन में, अपनी दिनचर्या में उतारने के प्रयास वे करें, ऐसा रामकृष्णजी […]

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परमहंस-११३

परमहंस-११३

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीखसद्गुरुतत्त्व की, उस ईश्‍वरी तत्त्व की करनी अगाध होती है, कई बार वह अतर्क्य, विपरित प्रतीत हो सकती है। इसलिए उसका अर्थ लगाने के पीछे मत पड़ जाना, यह बात अंकित करने के लिए रामकृष्णजी ने एकत्रित शिष्यगणों को एक कथा सुनायी – ‘एक मनुष्य घने जंगल में जाकर नित्यनियमपूर्वक कालीमाता […]

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परमहंस-११२

परमहंस-११२

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख हालाँकि दया, करुणा ये रामकृष्णजी के स्वभावविशेष थे और जनसामान्यों के प्रति उनके दिल में अनुकंपा भरभरकर बह रही थी, लेकिन उनके पास आनेवाले लोग जब ईश्‍वर को न मानते हुए ‘समाजसेवा’, ‘दीनदुर्बलों की सेवा ही असली धर्म है’ आदि बातें करने लगते थे, तब वे खौल उठते थे; फिर […]

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परमहंस-१११

परमहंस-१११

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी की ख्याति सुनकर दक्षिणेश्‍वर आनेवाले जनसामान्य उन्हें देखकर तो मंत्रमुग्ध हो ही जाते थे; लेकिन उनमें से कुछ लोग, जिन्हें रामकृष्णजी के साथ थोड़ा अधिक समय बीताने का अवसर मिल जाता था, वे एक और बात से आश्‍चर्यचकित होते थे – ‘इतने महान योगी, ‘परमहंस’ के रूप में सर्वत्र […]

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