परमहंस-९५

परमहंस-९५

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी अपने शिष्यों को हमेशा ही ईश्‍वरप्राप्ति हेतु प्रयास करने के लिए कहते थे, ‘‘जब तक तुम ईश्‍वरप्राप्ति के लिए प्रयास शुरू नहीं करते, तब तक तुम इस भौतिक विश्‍व में, उसके सुखोपभोगों में मश्गूल होकर रहते हो। तुम्हारी वास्तविक पहचान के बारे में, मानवजन्म लेने के बाद तुम्हारा क्या […]

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परमहंस-९४

परमहंस-९४

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी के पास आनेवाले कुछ शिष्य कई बार भक्ति की भोली-भोली कल्पनाओं को दिल में समेतकर आते थे….मेरी अब शादी हो चुकी है, अब मैं कहाँ अध्यात्म कर पाऊँगा? या फिर….जग कैसा भी क्यों न बर्ताव करें, मैं अच्छा बर्ताव कर रहा हूँ यह काफ़ी है; ऐसे कुछ विचार उनके […]

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परमहंस-९३

परमहंस-९३

तत्कालीन भारतीय समाजजीवन में, ख़ासकर बंगाल के समाजजीवन में नवविचारों की कई हवाएँ उस समय बहने लगी थीं। ज्ञानमार्ग-ध्यानधारणा इन मार्गों का अनुसरण करनेवाले कई नवसंप्रदायों ने, ईश्‍वर के सगुण साकार रूपों को अमान्य कर और उनके निर्गुण निराकार स्वरूप को ही सच मानकर, उसपर ही ध्यान केंद्रित करने की सीख देना शुरू किया था। […]

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परमहंस-९२

परमहंस-९२

रामकृष्णजी के साथ हुई पहलीं दो-तीन मुलाक़ातों में भी गिरीशचंद्रजी पर उनका कुछ ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा था। वैसे हर मुलाक़ात के साथ गिरीशचंद्रजी का रामकृष्णजी के बारे में होनेवाला मत बदलता जा रहा था, अधिक से अधिक अच्छा ही बनता जा रहा था; लेकिन अभी तक ‘वह’ पल आया नहीं था। लेकिन इन छोटी-छोटी […]

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परमहंस-९१

परमहंस-९१

रामकृष्णजी के हाथ को आयी चोट धीरे धीरे ठीक हो रही थी। इसी दौरान रामकृष्णजी ने कोलकाता के तत्कालीन विख्यात ‘स्टार थिएटर’ की – ‘लाईफ ऑफ श्रीचैतन्य’ और ‘लाईफ ऑफ प्रह्लाद’ ये दो नाटक देखने के लिए दो बार भेंट की। उस थिएटर के मॅनेजर गिरीशचंद्रजी घोष ने ही ये दो नाटक लिखे थे। गिरीशचंद्र […]

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परमहंस-९०

परमहंस-९०

रामकृष्णजी का शिष्यपरिवार बढ़ता ही जा रहा था और बाद के समय में प्रमुख माने गये उनके शिष्यगण उनके अधिक से अधिक क़रीब आने की प्रक्रिया इसी दौर में शुरू थी। उनके कुछ शिष्य तो हररोज़ ही आकर उनसे मिलते थे। इसी दौरान जनवरी १८८४ में एक दुखदायी घटना घटित हुई। एक दिन रामकृष्णजी हररोज़ […]

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परमहंस-८९

परमहंस-८९

पश्‍चात्समय में जिन्होंने रामकृष्णजी के विचारों का प्रसार किया और रामकृष्णजी के कार्य को आगे बढ़ाया, ऐसे भक्त अब रामकृष्णजी के पास बड़ी संख्या में आने लगे थे। रामकृष्णजी हालाँकि आनेवाले लोगों में भेदभाव नहीं करते थे, आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की मुमुक्षु वृत्ति से आनेवाले साधकों की ओर उनका अधिक रूझान रहता था। इनमें […]

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परमहंस-८८

परमहंस-८८

इसी दौरान इसवी १८८१ के मध्य में दक्षिणेश्‍वर में एक अनिष्ट घटना घटित हुई….रामकृष्णजी का भाँजा एवं भक्त हृदय को दक्षिणेश्‍वर से निकाल बाहर कर दिया गया! लेकिन उसके लिए कारण भी हृदय का आचरण ही था। यह कोई एक दिन में हुई घटना नहीं थी। रामकृष्णजी की ख्याति जैसे जैसे बढ़ने लगी, वैसे वैसे […]

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परमहंस-८७

परमहंस-८७

रामकृष्णजी के साथ की दो मुलाक़ातों के बाद उनके बारे में नरेंद्र को जो प्रश्‍न सता रहा था, उसका उत्तर जानने की कोशीश वह जी-जान से कर रहा था। उसके बाद उन दोनों की एक और तीसरी मुलाक़ात भी हुई। दक्षिणेश्‍वर के पास ही होनेवाले, विख्यात बंगाली इतिहास संशोधक यदुनाथ सरकारजी के बगीचे में चक्कर […]

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परमहंस-८६

परमहंस-८६

‘उस’ पहली मुलाक़ात के बाद नरेंद्र के मन में रामकृष्णजी के बारे में उल्टे-पुल्टे विचारों का तू़फ़ान उठा था। कभी मन उन्हें ‘पागल’ क़रार देता, तो कभी ‘थोर योगी’। लेकिन मन चाहे उन्हें कुछ भी क़रार क्यों न दें, उनका विचार उसके मन से नहीं जा रहा था, यही सच है। नरेंद्र की रामकृष्णजी से […]

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