परमहंस-११२

परमहंस-११२

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख हालाँकि दया, करुणा ये रामकृष्णजी के स्वभावविशेष थे और जनसामान्यों के प्रति उनके दिल में अनुकंपा भरभरकर बह रही थी, लेकिन उनके पास आनेवाले लोग जब ईश्‍वर को न मानते हुए ‘समाजसेवा’, ‘दीनदुर्बलों की सेवा ही असली धर्म है’ आदि बातें करने लगते थे, तब वे खौल उठते थे; फिर […]

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परमहंस-१११

परमहंस-१११

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख रामकृष्णजी की ख्याति सुनकर दक्षिणेश्‍वर आनेवाले जनसामान्य उन्हें देखकर तो मंत्रमुग्ध हो ही जाते थे; लेकिन उनमें से कुछ लोग, जिन्हें रामकृष्णजी के साथ थोड़ा अधिक समय बीताने का अवसर मिल जाता था, वे एक और बात से आश्‍चर्यचकित होते थे – ‘इतने महान योगी, ‘परमहंस’ के रूप में सर्वत्र […]

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परमहंस-११०

परमहंस-११०

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख एक बार रामकृष्णजी से मिलने कुछ व्यापारी लोग आये थे। वे रामकृष्णजी के लिए फल, क़ीमती मिठाइयाँ आदि चीज़ें ले आये थे। लेकिन रामकृष्णजी ने उनमें से किसी चीज़ को नहीं खाया। कुछ देर बाद उन व्यापारियों के चले जाने के बाद रामकृष्ण ने अपने शिष्यों से कहा कि ‘ये […]

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परमहंस-१०९

परमहंस-१०९

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख सांसारिक इन्सानों को होनेवाली भौतिक बातों की आसक्ति के बारे में बात करते हुए रामकृष्णजी ने निम्न आशय का विवेचन किया – ‘जिस तरह कोई साप किसी बड़े चूहे को निगलना चाहता है। लेकिन वह चूहा उसके जबड़े में जाने के बाद, वह साँप उस चूहे के बड़े आकार के […]

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परमहंस-१०८

परमहंस-१०८

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इन्सान प्रायः चार प्रकार के होते हैं – १) हमेशा गृहस्थी में ही आकंठ डुबे हुए और उसके अलावा और कोई भी सोच न होनेवाले; २) मोक्ष की आकांक्षा रखनेवाले; ३) इस सांसारिक आसक्ति से मुक्त हो चुके; और ४) नित्य जीवन्मुक्त। इस बात को स्पष्ट करते […]

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परमहंस-१०७

परमहंस-१०७

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख जब एक भक्त ने ऐसा सवाल पूछा कि ‘सभी में ईश्‍वर हैं, फिर यदि कोई मनुष्य किसी भक्तिमार्ग चलनेवाले श्रद्धावान के साथ बुरा बर्ताव कर रहा है, तो फिर वह श्रद्धावान क्या करें’; तब, श्रद्धावानों को इस व्यवहारिक दुनिया में जीते समय, दुनिया के बुरे लोगों से खुद की रक्षा करते […]

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परमहंस-१०६

परमहंस-१०६

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख : ‘जिस तरह कोई सांसारिक मनुष्य धनसंपत्ति से, कोई पतिव्रता पत्नी अपने पति से, कोई माता अपनी संतान से प्रेम करती है, वह प्रेम ईश्‍वर से करना सिखो। दरअसल इन तीनों आकर्षणों का (लालच-मोह, प्रेम और वत्सलता) रूख़ एकत्रित रूप में उसी आर्तता के साथ ईश्‍वर की दिशा में मोड़ना […]

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परमहंस-१०५

परमहंस-१०५

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख : एक बार रामकृष्णजी उनके एक शिष्य बेणीमाधव पाल के निमंत्रण पर सत्संग के लिए उनके फार्महाऊस पर गये थे। बेणीमाधवजी पहले ब्राह्मो समाज से संलग्न होने के कारण ब्राह्मो समाज के कई साधक भी इस समय उपस्थित थे। हमेशा की तरह ही सत्संग के दौरान साधक रामकृष्णजी को जिज्ञासु […]

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परमहंस-१०४

परमहंस-१०४

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख एक बार रामकृष्णजी दोपहर के खाने के बाद, दक्षिणेश्‍वरस्थित अपने कमरे में इकट्ठा हुए भक्तगणों से बातें कर रहे थे। विषय था – ‘ईश्‍वरप्राप्ति’। उनसे मिलने विभिन्न स्तरों में से और पार्श्‍वभूमियों में से लोग चले आते थे। उस दिन बंगाल के सुविख्यात ‘बौल’ इस आध्यात्मिक लोकसंगीत के कुछ गायक-वादक […]

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परमहंस-१०३

परमहंस-१०३

रामकृष्णजी की शिष्यों को सीख आधारचंद्रजी सेन के घर आयोजित किये सत्संग में रामकृष्णजी बात कर रहे थे और इस विवेचन के दौरान बंकिमचंद्रजी द्वारा और अन्य भक्तों द्वारा पूछे जानेवाले प्रश्‍नों के अनुसार भक्तिमार्ग का श्रेष्ठत्व, साथ ही मानवी जीवन में होनेवाली ईश्‍वर की अपरिमित आवश्यकता इनके बारे में निम्न आशय का विवेचन कर […]

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