परमहंस-८७

परमहंस-८७

रामकृष्णजी के साथ की दो मुलाक़ातों के बाद उनके बारे में नरेंद्र को जो प्रश्‍न सता रहा था, उसका उत्तर जानने की कोशीश वह जी-जान से कर रहा था। उसके बाद उन दोनों की एक और तीसरी मुलाक़ात भी हुई। दक्षिणेश्‍वर के पास ही होनेवाले, विख्यात बंगाली इतिहास संशोधक यदुनाथ सरकारजी के बगीचे में चक्कर […]

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परमहंस-८६

परमहंस-८६

‘उस’ पहली मुलाक़ात के बाद नरेंद्र के मन में रामकृष्णजी के बारे में उल्टे-पुल्टे विचारों का तू़फ़ान उठा था। कभी मन उन्हें ‘पागल’ क़रार देता, तो कभी ‘थोर योगी’। लेकिन मन चाहे उन्हें कुछ भी क़रार क्यों न दें, उनका विचार उसके मन से नहीं जा रहा था, यही सच है। नरेंद्र की रामकृष्णजी से […]

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परमहंस-८५

परमहंस-८५

सुरेंद्रनाथ मित्रा के घर रामकृष्णजी से हुई मुलाक़ात में नरेंद्र पर रामकृष्णजी का कुछ खास प्रभाव नहीं हुआ था। लेकिन रामकृष्णजी और विवेकानंदजी ये दोनों भी जिसे अपनी ‘पहली मुलाक़ात’ कहते थे, वह मुलाक़ात दिसम्बर १८८१ में घटित हुई। उसी दौरान ईश्‍वर की खोज कर रहे नरेंद्र ने कई मार्गदर्शकों से भेंट की थी। ब्राह्मो […]

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परमहंस-८४

परमहंस-८४

कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अँग्रेज़ी साहित्य की क्लास शुरू थी। नियत प्राध्यापक अनुपस्थित होने के कारण मुख्यअध्यापक विल्यम हॅस्टी उस क्लास को पढ़ा रहे थे। उस दिन सुविख्यात ब्रिटीश कवी वर्डस्वर्थ की ‘एक्स्कर्शन’ इस दीर्घकविता की पढ़ाई चल रही थी, जिसे समझना छात्रों के लिए कठिन साबित हो रहा था। पढ़ाते पढ़ाते ‘ट्रान्स’ […]

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परमहंस-८३

परमहंस-८३

आगे चलकर जिनकी गिनती रामकृष्णजी के सर्वोच्च शिष्यों में की जाने लगी, ऐसे उनके शिष्य एक एक करके दक्षिणेश्‍वर आने की शुरुआत हो चुकी थी। केशवचंद्र सेन के पीछे पीछे आये रामचंद्र दत्त और मनमोहन मित्रा इनके ज़रिये भी कई लोग आने शुरू हुए थे। दरअसल रामकृष्णजी के सर्वोच्च बड़े शिष्य जिन्हें माना जाता है, […]

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परमहंस-८२

परमहंस-८२

कामारपुकूर से लौटने के बाद रामकृष्णजी के मन में अलग ही विचारमंथन शुरू हुआ था – अब वे किसी की तो बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। ये ‘कोई’ यानी उनके वे भविष्यकालीन शिष्य थे, जिनके आने का ‘समय हो चुका’ था। इनमें से कई भविष्यकालीन शिष्यों के बारे में देवीमाता ने मेरी विभिन्न उपासनाओं […]

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परमहंस-८१

परमहंस-८१

केशवचंद्र सेनजी के पीछे पीछे ब्राह्मो समाज के तथा उनके समविचारी संप्रदाय के प्रभावशाली व्यक्ति धीरे धीरे रामकृष्णजी के पास आने लगे। तक़रीबन सन १८७९ से १८८१ इस अवधि में रामकृष्णजी के पास आनेवाले लोगों का प्रवाह धीरे धीरे बढ़ गया। इनमें जिस तरह ईशप्राप्ति का प्रखर ध्यास लिये हुए मुमुक्षु साधक, ज्ञानमार्गी, योगी, बैरागी […]

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परमहंस-८०

परमहंस-८०

अपनी विभिन्न उपासनाओं के दौरान हुए अनुभवों के ज़रिये रामकृष्णजी ने अब तक अर्जित किया ज्ञान अब दुनिया को बाँटने का समय आया था। यहाँ से आगे धीरे धीरे उनके शिष्यगणों का ताँता दक्षिणेश्‍वर में लगने लगा, जिनमें से कई लोग आगे चलकर जगन्मान्यता को प्राप्त हुए। इनमें से कुछ लोग पहले से ही सामाजिक […]

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परमहंस-७९

परमहंस-७९

अब रामकृष्णजी ने जो ईसाईधर्म की उपासना शुरू की? थी, उसके पहले ही दिन उन्हें ‘बालक जीझस एवं माता मेरी’ इनके चित्र में से दैवी साक्षात्कार होने के बाद रामकृष्णजी बायबल-अध्ययन में रममाण हो गये। इतने कि उनके दिलोदिमाग में अब केवल जीझस ख्राईस्ट ही था और ख्रिश्‍चन धर्म की सीख के सामने उनके मन […]

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परमहंस-७८

परमहंस-७८

षोडशी पूजा के बाद शारदादेवी रामकृष्णजी के ही कमरे में रहने लगीं। लेकिन कई बार ऐसा होता था कि रामकृष्णजी भावसमाधि को प्राप्त होते थे और वे कब फिर से सभान होंगे यह कहा नहीं जा सकता था। इस कारण बौखला गयीं शारदादेवी उतने समय तक जागती रहती थीं। समाधिअवस्था में होते समय रामकृष्णजी का […]

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