रक्त एवं रक्तघटक – ६३

हम हमारे शरीर के रक्त जमनें की प्रक्रिया की जानकारी ले रहे हैं। हमने रक्त के ना जमने के कारणों तथा उसके विकारों के बारे में जानकारी ली। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि रक्त गलत स्थान पर अथवा अचानक जम जाता है। यदि किसी रक्तवाहिनी में ऐसा हो जाता है तो उसमें होनेवाला रक्त-प्रवाह रुक जाता है। रक्तप्रवाह के रुक जाने से अनेकों समस्याओं का निर्माण हो सकता है। अब हम देखेंगें कि ऐसा क्यों होता है और ऐसा होने पर कौन-कौन सी समस्यायें उत्पन्न हो सकती हैं।

रक्त-प्रवाह, प्रक्रिया, थ्रोंब्रोसिस, हार्ट-अटैक, क्लॉट्स, रक्तस्राव, देह, Disseminated Intravascular coagulation थ्रोंबोएम्बाँलिझम :
जब अचानक किसी रक्तवाहिनी में रक्त जम जाता है तो इसे ‘थ्रोंब्रोसिस’ कहा जाता है। रक्त का जो ‘क्लॉट’ तैयार होता है, उसे ‘थ्रोंबस’ कहा जाता है। यह थ्रोंबस रक्तवाहिनी के अंदरूनी आवरण पर बनता है। जब तक रक्तप्रवाह शुरु रहता है तब तक यह थ्रोंबस वहॉं पर चिपका नहीं रह सकता। रक्तप्रवाह के वेग से वो आवरण से छूट जाता है और रक्तप्रवाह के साथ-साथ आगे बढ़ता रहता है। इस प्रकार रक्त के साथ बहते जा रहे ‘थ्रोंबस’ को अब ‘एम्बोलस’ कहते हैं। इसी लिए इस पूरी प्रक्रिया को थ्रोंबोएम्बोलिझम कहा जाता हैं।

हृदय के बायें हिस्से में अथवा बड़ी आरटरीज़ में तैयार होनेवाला एम्बोलस शरीर की रक्तवाहनियों में प्रवास करता है। यह एम्बोलस, मेंदू (मस्तिष्क), मूत्रपिंड, हृदय में से किसी भी अवयव की छोटी रक्तवाहनियों में होनेवाले रक्तप्रवाह को रोक सकता है। हृदय के दाहिने हिस्से में अथवा वेन्स में तैयार होनेवाला एम्बोलस फ़ेफ़डों की छोटी आरटरीज में होनेवाले रक्तप्रवाह को रोक सकता है। इसे पलमनरी आरटरी एम्बोलिझम कहते हैं।

थ्रोंबोएम्बॉलिझम के कारण :-
मुख्यत: दो कारणों से ऐसा होता हैं –
१) जब रक्तवाहिनी का अंदरूनी स्तर खुरदरा अथवा रफ हो जाता है तभी उस स्थान पर रक्त का क्लॉट बन जाता है। रक्तवाहिनी को लगी हुयी चोट, जीवाणुबाधा और आरटिरिओ स्क्लेरोसिस (Arteriosclerosis) ये तीन बातें इसके लिए कारणीभूत होती हैं।

२)किसी रक्तवाहिनी में रक्त के प्रवाह की गति जब कम होती है, तब वहॉं पर रक्त जम जाता है और थ्रोंबस तैयार हो जाता है। इससे पहले हमने देखा है कि रक्त में थ्रोंबिन और अन्य प्रोको आग्युलॅट्स होते हैं। रक्त के प्रवाह के कारण वे एक ही स्थान पर स्थिर नहीं रह सकते। रक्तप्रवाह जब यकृत में पहुँचता है तो वहाँ की ‘कुफ़्फ़र’ नामक पेशी प्रोकोआग्युलंट्स को नष्ट कर देती है। जब रक्तप्रवाह की गति कम हो जाती है तब इनके नष्ट होने की मात्रा घट जाती है। इसी के साथ इन्हें एक ही स्थान पर स्थिर होने का अवसर मिल जाता है और वहाँ पर थ्रोंबस बन जाता है।

पहले कारण में भी आरटिरिओ स्क्लेरोसिस के कारण थ्रोंबस तैयार होने का उत्तम उदाहरण है, करोनरी आरटरीज़ (हृदय की आरटरीज) में तैयार होनेवाला थ्रोंबस। जब यह थ्रोंबस अथवा एम्बोलस हृदय की किसी रक्तवाहिनी को बंद कर देता है, तभी उस व्यक्ति को हार्ट-अटैक (Myocaradial Infarction) होता है।

पैरों की फ़िमोरल व्हेन में तैयार होनेवाले थ्रोंबस, दूसरे प्रकार का उत्तम उदाहरण है। जब कोई व्यक्ति किसी बीमारी के कारण बिस्तर पकड़ लेता है तो उसकी हलचल एकदम रुक जाती है। ऐसी स्थिति में पैरों में रक्तप्रवाह धीमा हो जाता है जिससे पैरों की वेन्स में थ्रोंबस तैयार हो जाता है। यदि यह थ्रोंबस वहाँ से छूट जाये तो यह हृदय में पहुँच जाता है। हृदय से यह फ़ेफ़ड़ों की आरटरी में प्रवेश करता है और वहाँ का रक्त प्रवाह कुंठित कर देता है। इसे पलमनरी एम्बॉलिझम कहते हैं। उपरोक्त दोनों बातें व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती हैं। ऐसी अवस्था में स्ट्रेप्टोकायनेज अथवा तत्सम दवा का इंजेक्शन देकर व्यक्ति को बचाया जा सकता है। ये दवा रक्त की प्लाझमिन को कार्यरत करती है। प्लाझमिन थ्रोंबस पर कार्य करती है और थ्रोबस को पिघलाकर पुन: रक्तप्रवाह व्यवस्थित कर देती है।

रक्त के जमने के कारण प्राणों के लिए घातक साबित होनेवाला और एक विकार है जिसे डिससेमिनेटेड इंट्रा वॅसक्युलर कोआग्युलेशन (Disseminated Intravascular coagulation) कहते हैं। इस लम्बे-चौड़े नाम का सीधा अर्थ है कि रक्तवाहनियों में शरीर के विभिन्न भागों में एक ही साथ रक्त जम जाता है और क्लॉट्स तैयार हो जाते हैं। सर्वसाधारणत: यह घटना ‘सेप्टीसिमिक शॉक’ में होती है। इस विकार में रक्त में घूमनेवाले जीवाणुओं के संघ अथवा उनके द्वारा स्रावित विषारी पदार्थ, रक्ते के जमने के लिए कारणीभूत होते हैं। जगह-जगह रक्तप्रवाह में रूकावटें निर्माण होने के कारण वहाँ के अवयवों को होनेवाली प्राणवायु और अन्न की आपूर्ति बंद हो जाती है। इस विकार में रक्त के प्रोकोआग्युलंट्स क्लॉट तैयार करने के लिए, उपयोग में लाए जाने के कारण रक्त आवश्यकता से ज्यादा पतला हो जाता है। यदि यह परिस्थिति ऐसी ही बनी रही तो शरीर में जगह-जगह पर आंतरिक रक्तस्राव शुरु हो जाता है। अवयवों को होनेवाली प्राणवायु की कमी और अंदरुनी रक्तस्राव के कारण व्यक्ति की मौत हो जाती है।(क्रमश:-)