५४. ‘झायॉनिझम’ की पार्श्‍वभूमि

हज़ारों साल बदतर हालातों में गुज़ारने के बाद अब इसवी १९ वीं सदी में ज्यूधर्मियों की स्थिति बेहतर होने के आसार दिखायी देने लगे थे, क्योंकि इसी सदी में ‘झायॉनिझम’ के बीज बोये गये|

‘ज्युडाईझम’ और ‘झायॉनिझम’ इनमें फ़र्क़ है| ज्युडाईझम ज्यूधर्मतत्त्वों का पालन करने के बारे में, अर्थात् पूर्णतः धार्मिक स्तर पर ज्यूधर्मियों को मार्गदर्शन करता है, फिर चाहे वे ज्यूधर्मीय दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हों;

वहीं, झायॉनिझम यानी ‘ज्यू-राष्ट्र’वाद| ज्यूधर्मतत्त्वपालन तो हर एक निष्ठावान ज्यूधर्मीय द्वारा किया जाना ही चाहिए; लेकिन उसीके साथ, आद्यपूर्वज अब्राहम को ईश्‍वर ने अभिवचन देकर बहाल की हुई भूमि में, ज्यूधर्मियों की बहुसंख्या होनेवाले राष्ट्र का निर्माण कर, उसमें वे एकसाथ वास्तव्य करने आयें; ऐसे ‘ज्यू-राष्ट्र’ का प्रतिपादन ‘झायॉनिझम’ यह विचारधारा करती है|

आधुनिक स्वतंत्र ‘ज्यू-राष्ट्र’ की संकल्पना को अपनी केंद्रीय संकल्पना के रूप में झायॉनिझम द्वारा ही प्रतिपादित किया गया| आज के ‘इस्रायल’ इस स्वतंत्र ज्यू-राष्ट्र के निर्माण में इस झायॉनिझम का अहम हिस्सा है|

१९वीं सदी के आरंभ तक, ज्यूधर्मियों की समस्या के बारे में हमदर्दी रखनेवाले देशों की संख्या में अच्छीख़ासी वृद्धि हुई थी| इन बदलते हालातों का फ़ायदा उठाकर कई ज्यूधर्मीय विचारकों ने विभिन्न मंचों पर से ज्यूधर्मियों के प्रश्‍न को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की शुरुआत की|

लेकिन यह समस्या दोगली थी| कॅनॉन प्रान्त को ‘ज्यूधर्मियों के राष्ट्र’ के रूप में आन्तर्राष्ट्रीय मान्यता मिलें, यह एक मुद्दा था ही| लेकिन उसी के साथ, जिन्हें दुनिया के अन्य प्रदेशों में स्थायिक होना पड़ा था, ऐसे ज्यूधर्मियों का पुनः जेरुसलेम में लौटना भी आवश्यक था| (डायस्पोरा में होनेवाले ज्यूधर्मियों का पुनः जेरुसलेम में लौटना और वहीं पर स्थायिक होना, इस प्रक्रिया को हिब्रू भाषा में ‘आलिया’ कहा जाता है|) लेकिन जेरुसलेम में रहनेवाले निरन्तर अशान्त वातावरण के कारण, तत्कालीन अनिश्‍चित भविष्य के कारण और अब होली टेंपल भी न होने के कारण, दुनियाभर बिखरे हुए ज्यूधर्मियों में से बहुत बड़ा वर्ग जेरुसलेम में लौटने के लिए कुछ ख़ास उत्सुक नहीं था| उसके लिए ज्यूधर्मियों को प्रेरित करना आवश्यक था| क्योंकि दुनियाभर में ज्यूधर्मियों के प्रश्‍न के बारे में हमदर्दी रखनेवाले देशों में हालॉंकि वृद्धि हो रही थी, सामाजिक स्तर पर कुल मिलाकर उस कालखण्ड में, ख़ासकर युरोप में ज्यूधर्मियों के प्रति विद्वेष की भावना बढ़ती चली जा रही थी|

१८वीं सदी के अन्त में और १९वीं सदी में, जेरुसलेम लौटने के लिए डायस्पोरा में होनेवाले ज्यूधर्मियों को प्रेरित करने की दिशा में जिन्होंने ठोस कार्य किया, उनमें ‘ज्युडाह बिबास’ (इसवीसन १७८९-१८५२), ‘झ्वी हर्श कॅलिशर’ (इसवीसन १७९५-१८७४) और बिबास के छात्र रहे ‘ज्युडाह अल्कालाई’ (इसवीसन १७९८-१८७८) ऐसे तीन प्रमुख ज्यूधर्मीय विचारक माने जाते हैं|

विभिन्न मंचों पर से ज्यूधर्मियों के प्रश्‍न का आंतर्राष्ट्रीयीकरण करने के साथ ही; विभिन्न स्थानों की ज्यूइश बस्तियों में जाकर, ‘ज्यूधर्मीय पुनः अपनी हक़ की भूमि में – जेरुसलेम में जाकर स्थायिक हुए बिना, उनके साथ बतौर ‘दुय्यम दर्ज़े के नागरिक’ हो रहा सुलूक़ बन्द नहीं होगा’ ऐसा उनके दिल पर अंकित कर जनमानस तैयार करने में इन तीनों का अहम सहभाग है| ‘झायॉनिझम’ का एक संकल्पना के रूप में जन्म होने से पहली उसकी नींव बनाने का काम इन तीनों ने किया|
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जिब्राल्टर में सेफार्डिक ज्यू (स्पॅनिश ज्यू) घर में जन्मे रब्बी बिबास ने इसवीसन १८३९-४० में युरोप का दौरा किया| इस दौरे में उन्होंने कई ज्यू-बस्तियों की भेंट की| व्यवसाय से डॉक्टर होनेवाले बिबास का अँग्रेज़ी, इटालियन, स्पॅनिश और हिब्रू इतनी भाषाओं पर प्रभुत्व होने के कारण, वे सामनेवाले से प्रभावी रूप में संवाद कर सकते थे| ‘दुनियाभर में बिखरे हुए सब ज्यूधर्मीय अपनी मूलभूमि जेरुसलेम में लौटें और उस समय जेरुसलेम यह ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा होने के कारण, ऑटोमन्स के साथ चर्चा करके, ज़रूरत पड़ने पर संघर्ष करके भी इस पवित्र भूमि को जीत लें और वहॉं पर ज्यूधर्मियों के अपने खुद के राष्ट्र का निर्माण करें’ ऐसी बिबास की योजना थी|

उनका लगभग समकालीन ही होनेवाले ‘झ्वी हर्श कॅलिशर’ ने भी यही प्रतिपादन किया था| जर्मनी (तत्कालीन प्रशिया प्रान्त में) ‘रब्बी’ होनेवाले कॅलिशर ने मध्ययुगीन और तत्कालीन ज्युईश एवं ख्रिस्ती धार्मिक साहित्य का तौलनिक अध्ययन किया था और यह अध्ययन करते करते वे भी इसी निष्कर्ष तक आ पहुँचे थे कि ज्यूधर्मियों का आत्मसन्मान क़ायम रखने के लिए ज्यूधर्मियों के स्वतंत्र राष्ट्र का होना आवश्यक है| ‘इसके लिए आवश्यक प्रचंड निधि को विभिन्न देशों में स्थायिक हुए ज्यूधर्मियों से इकट्ठा किया जाये; कॅनान प्रान्त की जितनी ज़मीन ख़रीद सकते है, उतनी ख़रीदकर वहॉं पर ख़ेती की शुरुआत की जाये; वहॉं के ज्यूधर्मियों को ख़ेतीविषयक ज्ञान प्रदान करनेवाली प्रशाला कॅनान में शुरू की जाये; और इन सारी ज्युइश बस्तियों की रक्षा के लिए ज्यूधर्मियों की स्वतंत्र सेना का निर्माण किया जाये’ ऐसी कॅलिशर की योजना थी|
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कॅलिशर ने अपने इस ध्येय की ख़ातिर अथक प्रवास किया| अनेक जर्मन शहरों में उन्होंने कई सभाएँ आयोजित कीं और इस ध्येय के लिए पूरक कार्य करनेवालीं कई संस्थाओं का निर्माण उन्होंने इन शहरों में किया| कॅलिशर ज्यू-राष्ट्रनिर्माण के इस कार्य को पूरी तरह समर्पित थे| यह कार्य करने के वे पैसे भी नहीं लेते थे| उनकी पत्नी ही छोटे-बड़े काम करके उन दोनों का गुज़ारा करती थी|
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इस दिशा में ठोस कार्य करनेवाला तीसरा व्यक्ति था – ज्युडाह अल्कालाई| उस समय ऑटोमन साम्राज्य का भाग होनेवाले बोस्निया के साराजेवो शहर में जन्मे अल्कालाई युवावस्था के दौरान ज्युडाह बिबास के संपर्क में आये और बिबास की विचारधारा से भारित होकर वे बिबास के छात्र बन गये| ज्यूधर्मीय पुनः अपनी मूलभूमि जेरुसलेम में लौटें, ऐसा प्रतिपादन करते हुए अल्कालाई ने – ‘हिब्रू भाषा को ज्यूधर्मियों की राष्ट्रभाषा बनायी जाये; दुनियाभर के ज्यूधर्मियों से प्राप्त हुई निधि का कॅनानप्रान्त में ज़मीनें ख़रीदने के लिए इस्तेमाल करें; प्रभावशाली एवं उच्चशिक्षित ज्यूधर्मियों की एक ऐसी समिती बनायी जाये, जो इस नये राष्ट्र को जागतिक मान्यता दिलाने के लिए प्रयास करें’ ऐसे व्यवहारिक सुझाव भी दिये थे| इनमें से अधिकांश सुझावों को आगे चलकर ‘झायॉनिझम’ की पहली कॉंग्रेस के अधिकृत प्रस्ताव में स्वीकारा गया|

जेरुसलेम प्रान्त ज्यूधर्मियों को बहाल करने के लिए ऑटोमन सुलतान के साथ कैसी और क्या चर्चा की जायें, इसके बारे में भी उन्होंने अपने लेखन में व्यवहारिक दृष्टिकोण से चर्चा की है|

उस दौर में डायस्पोरा में स्थित कई निष्ठावान ज्यूधर्मियों की ऐसी धारणा थी कि यदि – ‘ज्यूधर्मियों का प्रेषित आयेगा, जो दुनियाभर के ज्यूधर्मियों को एकत्रित करेगा और ‘होली लँड’ में ले जायेगा’ ऐसी भविष्यवाणी ज्यूधर्मग्रंथों में है, तो फिर हमें उस समय तक सब्र रखें तो बेहतर होगा| खुद जाकर समय से पहले जेरुसलेम जाकर इस ईश्‍वरी योजना में दख़लअन्दाज़ी क्यों करें?

लेकिन कॅलिशर और अल्कालाई ने इस धारणा का विरोध किया और ‘इस मामले में उस ईश्‍वरी योजना को मानवी प्रयासों का साथ देना अर्थात् स्वावलंबन (‘सेल्फ-हेल्प’) ज्यूधर्मियों के लिए बहुत ही ज़रूरी है’ ऐसा दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन उन्होंने किया|

अल्कालाई की विचारधारा से बहुत ही प्रभावित हुए ज्यूधर्मियों में से एक थे – ‘थिओडोर हर्ट्झ्ल्’ – जिन्हें ‘झायॉनिझम’ का जनक माना जाता है!(क्रमश:)

– शुलमिथ पेणकर-निगरेकर

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