आर्थर क्लार्क ‘उपग्रह संदेशवहन के जनक’ (१९१७-२००८)

मानव यह एक ऐसा प्राणि है, जिसकी कल्पना उसके कार्य से काफी आगे की कथाएँ होती हैं, इसी लिए कालानुसार अन्य साहित्य-सामग्रियों की तुलना में वैज्ञानिक ही स्थिर रह सकते हैं।’ यह थी आर्थर क्लार्क की राय।

इंग्लैंड में जन्मे क्लार्क को आर्थिक परेशानियों के कारण महाविद्यालयीन शिक्षा हासिल करना संभव नहीं था। १९४१-४६ की अवधि में उन्होंने रडार प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया। फ्लाईट लेफ्टनंट पद तक अपनी नौकरी के साथ-साथ उन्होंने गणित, भौतिकशास्त्र विषय की उपाधि लंडन के महाविद्यालय से प्राप्त की।

१९४५ में वायरलेस वर्ल्ड श्रृंखला के अन्तर्गत क्लार्क का ‘एक्स्ट्राटेरेस्टियल रिलेज’ नामक लेख प्रसिद्ध हुआ। आर्थर क्लार्क हँसी-मज़ाक में कहते थे ‘इस लेख का पेटंट यदि मैंने ले लिया होता तो घर बैठे-बैठे ही करोड़पति बन गया होता।’ संदेशवाहक उपग्रहों की श्रृंखला को पृथ्वी के चारों ओर यदि घूमते हुए रखा जाये तो रेड़ियो, टि.वी. के कार्यक्रम दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाना संभव हो जाएगा यह कल्पना क्लार्क ने इस लेख में प्रस्तुत की थी। साथ ही भूस्थिर उपग्रहों से कैसे और कौन कौन से काम करवाये जा सकते हैं, यह भी उन्होंने विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया था। इसी लिए आर्थर क्लार्क को ‘उपग्रह संदेशवाहक का जनक’ माना जाता है।

संशोधन की अपेक्षा विज्ञान कथा लेखक के रूप में आर्थर प्रसिद्ध है। बचपन से ही विज्ञान का आकर्षण, वैज्ञानिक कथाओं के प्रति होनेवाली रुचि ही उन्हें इस मार्ग पर आगे ले गई। विज्ञान लोकाभिमुख होने के लिए क्लार्क ने अनेक पुस्तकें एवं लेख लिखे। कुछ वर्षों तक तो वे पूरी तरह से लेखन का ही काम करते रहे। इसके पश्‍चात् छायाचित्रण एवं पानी के नीचे की दुनिया की सनक ने उनके दिलों-दिमाग पर काबू कर लिया और इसी खातिर वे १९५६ में श्रीलंका में जाकर अपने जीवन के अंतिम समय तक वहीं के होकर रह गए। उनके परिवार में स्पुटनिक एवं रेक्स नामक जर्मन शेफर्ड कुत्ते, बेबी नामक बंदर तथा वृद्ध माँ उनके साथ थी।

वैज्ञानिक कथाओं के बारे में उनकी राय यह थी – ‘मानव जाति के बौद्धिक आरोग्य के लिए वैज्ञानिक कथाऍँ आशावादी होने के कारण महत्त्वपूर्ण साबित होती हैं। भविष्य के प्रति आशावाद व्यक्त करनेवालीं वैज्ञानिक कथाएँ यह एक सकारात्मक साहित्य-प्रकार है। इन कथाओं के कारण ही विज्ञान के बारे में बच्चों की रुचि बढ़ति है। विज्ञान कथा पढ़कर आगे चलकर संशोधन क्षेत्र में आनेवाले अनेक नामचीन वैज्ञानिकों को मैं जानता हूँ। अमरीका के कुछ अंतरिक्षवीरों को मेरी पुस्तकों के कारण उनके समान बनने की इच्छा उनके मन में प्रकट हुई। उनकी इस प्रतिक्रिया को उन्होंने ही मुझे बताया है। समाज में वैज्ञानिक जानकारी जितनी अधिक फैलेगी उतना ही अधिक समाज का वैज्ञानिक प्रकल्पों के प्रति समर्थन बढ़ेगा और वैज्ञानिक प्रकल्पों के विरोधक इसी कारण धीरे-धीरे कम होने लगेंगे।’

पृथ्वी-बाह्य सजीवों के साथ मानव का संपर्क में आना यह मानवीय समूहों के लिए क्लार्क की दृष्टि से क्रांतिकारी घटना हो सकती है। ब्रिटीश खगोलशास्त्रज्ञ फ्रेंड हॉईल का आशावाद यह था – ‘अनेक राष्ट्रों को एक-दूसरे के साथ अस्तित्व में आना चाहिए और इसी कारण अपने ज्ञान एवं प्रगति में होनेवाले इस लाभ के कारण अपनी संपूर्ण मानवीय संस्कृति ही बदल जायेगी। आर्थर क्लार्क इस संबंध में कहते हैं कि यदि ऐसा होता है तो अब्राहम लिंकन के समय के लोगों को आज का प्रगत तकनीकी ज्ञान मिलने पर जो खुशी उन्हें प्राप्त होगी वही खुशी हमें भी प्राप्त होगी। ‘ए स्पेस ओडिसी’ नामक इस उपन्यास में आर्थर क्लार्क ने इस प्रश्‍न के बारे में विवरणात्मक लेख लिखा है।

गोरिल्लाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भी आर्थर क्लार्क ने कार्य किया है।

ब्रिटीश इंटर प्लानिटरी सोसायटी के प्रमुख पद पर वे १९४७-१९५० एवं १९५३ इस अवधि में सक्रिय थे। विज्ञान का प्रचार करने के लिए और विज्ञान की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए युनेस्को-कलिंग पुरस्कार उन्हें १९६१ में प्राप्त हुआ। १९९४ में शाति संबंधित दिए जानेवाले नोबेल पुरस्कार के लिए उनका नाम नामांकित किया गया था। २००५ में श्रीलंका का ‘श्रीलंकाभिमान्य’ नामक यह सर्वोच्च सम्मान भी उन्हें प्रदान किया गया।